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बांग्लादेश में बदला सियासी मंजर: शेख़ हसीना के दौर में हाशिये पर रहा विपक्ष, अब सड़कों पर

एबीसी नेशनल न्यूज | ढाका | 9 फरवरी 2026

बांग्लादेश की राजनीति में इन दिनों बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। वर्षों तक पूर्व प्रधानमंत्री Sheikh Hasina के शासनकाल में विपक्ष सड़कों पर लगभग नदारद रहा। चुनावों के दौरान या तो विपक्षी दलों ने मतदान का बहिष्कार किया, या फिर उनके वरिष्ठ नेताओं को बड़े पैमाने पर गिरफ्तार कर राजनीतिक रूप से हाशिये पर धकेल दिया गया। लेकिन अब, 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव से पहले हालात पूरी तरह बदलते नज़र आ रहे हैं।

इस बार सत्ता और विपक्ष की भूमिकाएं मानो उलट गई हैं। पहले जहां सत्ताधारी दल का दबदबा सड़कों पर दिखाई देता था, वहीं अब विपक्षी दल खुलकर रैलियां, मार्च और विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं और चुनावी माहौल में अपनी मज़बूत मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।

हसीना के दौर में विपक्ष पर शिकंजा

शेख़ हसीना के लंबे शासनकाल के दौरान विपक्ष पर लगातार दमन के आरोप लगते रहे। कई चुनावों में विपक्षी दलों ने यह कहते हुए हिस्सा नहीं लिया कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं हैं। विरोध-प्रदर्शन करने पर विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी आम बात हो गई थी। इसका नतीजा यह हुआ कि चुनावी प्रक्रिया में वास्तविक मुकाबला कमजोर पड़ता गया और लोकतांत्रिक स्पेस सिमटता चला गया।

अब सड़कों पर विपक्ष, बदला चुनावी माहौल

इस बार तस्वीर अलग दिखाई दे रही है। 12 फरवरी के चुनाव से पहले विपक्षी दल सड़कों पर उतरकर खुलकर शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह बदलाव बांग्लादेश की राजनीति में एक नए चरण की ओर इशारा करता है, जहां सत्ता के खिलाफ खुला विरोध फिर से उभरता दिख रहा है और विपक्ष खुद को दबा हुआ महसूस नहीं कर रहा।

चुनाव की निष्पक्षता पर बनी हुई है नज़र

हालांकि, विपक्ष की सक्रियता के बावजूद चुनाव की निष्पक्षता को लेकर सवाल अब भी कायम हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि उन्हें अभी भी बराबरी का मैदान नहीं मिल रहा, जबकि सत्ताधारी खेमे का दावा है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत किया जा रहा है और सभी दलों को चुनाव में हिस्सा लेने का पूरा अवसर दिया जा रहा है।

क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय निगाहें

बांग्लादेश के इस चुनाव पर केवल देश के भीतर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कड़ी निगाह रखी जा रही है। राजनीतिक स्थिरता, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिहाज़ से यह चुनाव बेहद अहम माना जा रहा है। कई क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियां इस बात पर नज़र बनाए हुए हैं कि चुनावी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और शांतिपूर्ण रहती है। लंबे समय तक दबे रहने के बाद विपक्ष का सड़कों पर लौटना यह संकेत देता है कि बांग्लादेश की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। अब 12 फरवरी का चुनाव यह तय करेगा कि यह बदलाव सिर्फ़ चुनावी शोर तक सीमित रहता है या फिर देश की राजनीति में वास्तव में किसी नए संतुलन और लोकतांत्रिक पुनर्स्थापना की शुरुआत करता है।

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