एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 9 फरवरी 2026
जुमला-युग की शुरुआत: ‘अच्छे दिन’ से ‘2047’ तक
देश पिछले एक दशक से जुमलों के बोझ तले जी रहा है। 2014 में “अच्छे दिन आएंगे” का नारा उछाला गया—उम्मीदें बंधीं, वोट पड़े, सत्ता मिली। इसके बाद काले धन का वादा आया, 15-15 लाख रुपये हर खाते में डालने की बात हुई। न काला धन लौटा, न खाते भरे। उलटे, न्यूनतम बैलेंस के नाम पर आम आदमी के खातों से पैसे कटे और बैंकों ने जनता की जेब से हज़ारों करोड़ समेट लिए। सत्ता में आते ही ज़मीनी हकीकत सुधारने के बजाय हर चुनाव में नया सपना बेचने की नीति अपनाई गई।
नोटबंदी और GST: तमाशे से यू-टर्न तक
नोटबंदी को राष्ट्रहित का महायज्ञ बताया गया, लेकिन नतीजे सामने हैं—अर्थव्यवस्था हिली, असंगठित क्षेत्र टूटा, रोज़गार गया, नक़दी संकट गहराया। फिर GST—आधी रात संसद में तमाशा, बड़े-बड़े दावे और सालों बाद वही सुधारों पर यू-टर्न। जब नतीजे सवालों के घेरे में आए, तो जवाब बदले—कभी “धैर्य रखिए”, कभी “लंबी प्रक्रिया”। गलत फैसलों की जिम्मेदारी लेने के बजाय कहानी बदलना ही सत्ता की आदत बन गई।
हर सवाल पर नया शिगूफ़ा
2017 में पूछा गया—कामकाज कहां है? जवाब मिला—2022 तक इंतज़ार। 2024 में फिर सवाल उठा—महंगाई, बेरोज़गारी, असमानता क्यों बढ़ रही है? नया शिगूफ़ा आया—‘विकसित भारत 2047’। यानी आज की तकलीफ़ पर बात मत कीजिए, 23 साल बाद का सपना देखिए। यही रणनीति है—वर्तमान से ध्यान हटाओ, भविष्य का पोस्टर दिखाओ।
अर्थव्यवस्था की सच्चाई बनाम भाषण
आज महंगाई और बेरोज़गारी आम आदमी की सांस पर भारी हैं। MSME दबाव में हैं, खपत सुस्त है, अमीरी-गरीबी की खाई बढ़ रही है। बावजूद इसके, मंचों से दावे आसमान छूते हैं। वैश्विक मंचों पर तस्वीरें चमकती हैं, लेकिन घरेलू बाज़ार में भरोसा डगमगाता है। विदेश नीति और वैश्विक सौदों पर भी सवाल उठते हैं—आलोचकों के मुताबिक बड़े हितों के आगे राष्ट्रीय हितों से समझौते की आहट सुनाई देती है। कई गंभीर आरोपों पर सरकार की स्पष्ट और पारदर्शी सफ़ाई न आना अविश्वास को और गहरा करता है।
अब बैंकिंग का नया जुमला
अब ताज़ा जुमला बैंकिंग सेक्टर पर है—दावा कि भारतीय बैंक दुनिया के बड़े बैंकों को टक्कर देंगे। यह बात केंद्रीय वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman कह रही हैं। लक्ष्य बुरा नहीं, लेकिन सवाल यह है कि पिछले वादों का हिसाब कहां है? एनपीए संकट, बढ़ते बैंक शुल्क, छोटे कारोबार तक सस्ते कर्ज़ की कमी—इन सब पर जवाब कौन देगा? शब्दों की चमक बहुत देखी, ज़मीनी राहत बेहद कम।
समिति, सुधार और हकीकत
उच्चस्तरीय समितियां बनती रहीं, रिपोर्टें आती रहीं—लागू कितना हुआ? विलय से बैंक बड़े तो हुए, लेकिन क्या वे मज़बूत हुए या सिर्फ़ और बोझिल? वित्तीय समावेशन के दावे हैं, मगर ग्रामीण इलाकों और छोटे उद्यमों तक सस्ती क्रेडिट आज भी सपना है। सुधार काग़ज़ों में नहीं, नतीजों में दिखते हैं—और नतीजों पर सरकार अक्सर मौन रहती है।
जुमलों का गणित: वोट बनाम वादा
यह शासन सपनों का कारोबार करता है—वोट आज, जवाब कल (या 2047)। हर विफलता पर नया नैरेटिव, हर सवाल पर नया पोस्टर। जनता की याददाश्त को छोटा मानकर लंबी समय-सीमा थमा दी जाती है। मगर लोकतंत्र में हिसाब अभी और यहीं मांगा जाता है—रोज़गार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, क्रेडिट—सबका।
11 साल का हिसाब: वादों की फेहरिस्त, नतीजे नदारद
प्रधानमंत्री Narendra Modi के सत्ता में 11 साल पूरे हो चुके हैं। सोशल मीडिया पर वायरल पोस्टरों में 2022 तक किए गए वादों की लंबी सूची है—सबको पक्का घर, हर गांव में शौचालय, 24 घंटे बिजली, ट्रेन दुर्घटनाओं में मौत शून्य, सिंगल यूज़ प्लास्टिक पर पूरी तरह रोक, 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था। 2022 कब का निकल गया, लेकिन इन लक्ष्यों का बड़ा हिस्सा आज भी अधूरा है।
सपनों से नहीं, सच से देश चलता है
देश को जुमलों की नहीं, ईमानदार नीतियों और जवाबदेही की ज़रूरत है। सपने तभी अर्थ रखते हैं जब वर्तमान सुधरे। जब तक सरकार अपने वादों का स्पष्ट लेखा-जोखा नहीं देगी—अच्छे दिन, काला धन, नोटबंदी, GST और अब बैंकिंग—तब तक हर नया दावा सिर्फ़ एक और जुमला ही माना जाएगा। भारत को 2047 नहीं, आज जवाब चाहिए।




