एबीसी नेशनल न्यूज | 31 जनवरी 2026
मुंबई/दिल्ली। महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिख रही है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के विलय को लेकर पार्टी संस्थापक शरद पवार के ताज़ा बयान ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। शरद पवार ने सार्वजनिक रूप से बताया कि एनसीपी के दोनों गुटों का एकीकरण 12 फरवरी 2026 को तय था और बातचीत लगभग अंतिम चरण में पहुंच चुकी थी, लेकिन परिस्थितियां बदलने से फैसला टल गया।
इस खुलासे के साथ ही घटनाक्रम ने तब और गंभीर रूप ले लिया, जब अजित पवार की प्लेन क्रैश में हुई दुखद मौत के बाद विलय की चर्चा अचानक तेज हो गई। सूत्रों के अनुसार, अजित पवार खुद इस एकीकरण के पक्षधर थे और शरद पवार के साथ कई दौर की बैठकों में संगठनात्मक ढांचे और नेतृत्व के सवाल पर सहमति बन चुकी थी। दिसंबर में शरद पवार के जन्मदिन पर इसे औपचारिक रूप देने की योजना थी, जो स्थानीय निकाय चुनावों के कारण आगे खिसक गई।
अब सवाल यह है कि अगर विलय होता है, तो कमान किसके हाथ में जाएगी। पार्टी के भीतर सुनेत्रा पवार के नाम पर गंभीर मंथन चल रहा है। संगठन और विधायकों के बीच उनकी स्वीकार्यता को देखते हुए कुछ नेता उन्हें आगे लाने के पक्ष में हैं। वहीं सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल जैसे वरिष्ठ नाम भी नेतृत्व की दौड़ में बताए जा रहे हैं। हालांकि, अजित पवार गुट के कुछ नेताओं का मानना है कि भावनात्मक माहौल में जल्दबाज़ी राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकती है।
विलय के राजनीतिक असर दूरगामी हो सकते हैं। राज्य स्तर पर यदि एकीकृत एनसीपी सत्तारूढ़ खेमे में जाती है, तो विपक्ष में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) ही प्रमुख ताकतें बचेंगी। वहीं केंद्र में तस्वीर और भी बदलेगी—अजित पवार गुट के सांसद पहले से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के साथ हैं। विलय की स्थिति में एनसीपी के सभी सांसद एनडीए में शामिल हो सकते हैं, जिससे भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन की ताकत और मजबूत होगी।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इसका सबसे बड़ा असर कांग्रेस पर पड़ेगा। दशकों से रणनीतिक सहयोगी रही एनसीपी के साथ दूरी बढ़ने से राहुल गांधी को विपक्षी मोर्चे पर नए सिरे से रणनीति बनानी पड़ सकती है। हाल के महीनों में अडानी मुद्दे और ‘वोट चोरी’ जैसे सवालों पर एनसीपी-एसपी की अलग लाइन पहले ही संकेत दे चुकी थी कि समीकरण बदल रहे हैं।
कुल मिलाकर, यह संभावित विलय सिर्फ एक पार्टी का फैसला नहीं, बल्कि महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक सत्ता संतुलन को नए सिरे से गढ़ने वाला कदम साबित हो सकता है। शरद पवार के खुलासे और अजित पवार की मौत के बाद उभरे हालात ने एनसीपी के भविष्य को इतिहास के सबसे अहम मोड़ पर ला खड़ा किया है। आने वाले हफ्तों में लिया गया फैसला तय करेगा कि पार्टी भावनाओं के साथ आगे बढ़ती है या दीर्घकालीन राजनीतिक धैर्य को प्राथमिकता देती है।




