एबीसी नेशनल न्यूज | 13 जनवरी 2026
हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मीडिया में एक बड़ी खबर तीसरे पक्ष की जानकारी के आधार पर सामने आई है कि तुर्की (Turkey) अब उस रक्षा समझौते में शामिल होने की बातचीत के उन्नत चरण में है, जो पहले से पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच है। यह रक्षा समझौता 2025 में सऊदी राजधानी रियाद में हुआ था जिसमें दोनों देशों ने यह तय किया था कि अगर किसी एक देश पर हमला होगा तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा — यानि सामूहिक रक्षा (collective defence) का सिद्धांत। यह तरीका नाटो (NATO) जैसा है, इसलिए कुछ विशेषज्ञ इसे “मुस्लिम नाटो” भी कह रहे हैं।
तुर्की खुद एक नाटो सदस्य देश है और उसकी सेना यूरोप–एशिया क्षेत्र में सबसे बड़ी में से एक मानी जाती है। अब अगर तुर्की इस पाक–सऊदी रक्षा समझौते का हिस्सा बन जाता है, तो इसका मतलब होगा कि तुर्की की ताकत, पाकिस्तान की परमाणु क्षमता और सऊदी अरब की आर्थिक शक्ति इस नए सैन्य गठजोड़ के हिस्से बन जाएगी। इससे यह नाटो जैसी संस्था और मजबूत हो सकती है और मध्य पूर्व तथा दक्षिण एशिया में सुरक्षा समीकरण काफी बदल सकते हैं।
भारत के लिए यह ध्यान देने वाली बात है कि पाकिस्तान और तुर्की दोनों ने 2025 में भारत–पाकिस्तान के बीच चार दिनों तक चली सैन्य टकराव (Operation Sindoor) में पाकिस्तान का समर्थन किया था। तुर्की ने उस दौरान पाकिस्तान को सैकड़ों सैन्य ड्रोन सहित तकनीकी सहायता दी थी, जिससे भारत के लिए तनाव पैदा हुआ था। ऐसे पृष्ठभूमि में अब तुर्की का इस नए रक्षा गठबंधन की तरफ बढना नई चुनौतियों को जन्म दे सकता है।
भारत को चुनौती इसलिए महसूस हो सकती है कि यह नया त्रिपक्षीय सैन्य संयोजन सीधे तौर पर भारत के खिलाफ घोषित नहीं है, लेकिन यह दक्षिण एशिया और उससे सटे क्षेत्रों में सामरिक संतुलन को बदल सकता है। पाकिस्तान के पास पहले से ही परमाणु हथियार और बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, सऊदी अरब के पास भारी धन है, और तुर्की की सेना को आधुनिक तकनीक तथा रणनीतिक अनुभव के लिए जाना जाता है। इन तीनों के साथ मिलकर यदि कोई बड़ा सुरक्षा गठबंधन बनता है, तो भारत को रक्षा, कूटनीति और क्षेत्रीय सहयोग के लिहाज़ से सतर्क रहना पड़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल यह मामला सीधे युद्ध जैसा मामला नहीं बन रहा है, लेकिन यह पाकिस्तान को अपनी स्थिति मजबूत करने और भारत के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन पाने के लिए इस्तेमाल हो सकता है। ऐसे में भारत को अपने रणनीतिक साझेदारों, सुरक्षा नीतियों और बाहरी कूटनीति में यह नया विकास ध्यान में रखना होगा ताकि किसी भी अप्रत्याशित स्थिति से निपटा जा सके और पूरे क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे।




