Home » Health » राष्ट्रीय युवा दिवस और योग: विवेकानंद का संदेश, आज के युवाओं के लिए जीवन-दिशा

राष्ट्रीय युवा दिवस और योग: विवेकानंद का संदेश, आज के युवाओं के लिए जीवन-दिशा

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

विमला कुमारी, योगिनी संगठन, दिल्ली उपाध्यक्ष, आद्या कौशलम ट्रस्ट

नई दिल्ली 12 दिसंबर 2025

स्वामी विवेकानंद जी का जन्म जिसे हम राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाते हैं, केवल एक ऐतिहासिक स्मरण नहीं है बल्कि यह आत्ममंथन का अवसर है। आज का युवा किस दिशा में खड़ा है और उसे किस ओर बढ़ना चाहिए। स्वामी विवेकानंद की जयंती को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। विवेकानंद ऐसे युग पुरुष थे जिन्होंने भारत की आत्मा को विश्व मंच पर आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत किया और युवाओं को यह विश्वास दिलाया कि उनके भीतर असीम शक्ति निहित है। उनका एक वक्तव्य है— “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो।”

उनके अनमोल विचार हमेशा से युवाओं के जीवन को बेहतर और देश की प्रगति में योगदान देने के लिए प्रेरित करते रहे हैं। युवा देश के भविष्य हैं और आगे चलकर देश को संभालेंगे। किसी भी देश के विकास में युवाओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन विकसित और विकासशील दोनों देशों में युवाओं को मानसिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

आज के समय में जब युवा भौतिक सफलता, प्रतिस्पर्धा, सोशल मीडिया और उपलब्धियों के दबाव में मानसिक असंतुलन, तनाव और दिशाहीनता का अनुभव कर रहा है, विवेकानंद के नैतिक मूल्य एक प्रकाश स्तंभ की तरह मार्ग दिखाते हैं। वे एक प्रखर द्रष्टा थे। उन्होंने एक ऐसे समाज की कल्पना की थी जिसमें धर्म या जाति के आधार पर मनुष्य-मनुष्य में कोई भेद न रहे।

अध्यात्मवाद बनाम भौतिकवाद के विवाद में पड़े बिना भी यह कहा जा सकता है कि समता के सिद्धांत का जो आधार विवेकानंद जी ने दिया, उसे सफल बौद्धिक आधार शायद ही कोई दे सका। विवेकानंद जी को युवाओं से बड़ी आशाएँ थीं। आज के युवकों के लिए उनका ओजस्वी संन्यासी का जीवन एक आदर्श है।

39 वर्ष के जीवनकाल में स्वामी विवेकानंद जी जो कार्य कर गए, वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे। उनका संदेश था कि सच्ची शिक्षा वह है जो चरित्र का निर्माण कर सके। उनके लिए ज्ञान, शक्ति और करुणा अलग-अलग नहीं थे, बल्कि एक ही चेतना के विभिन्न रूप थे।

“कमजोर होना पाप है” — यह कथन शारीरिक शक्ति से अधिक मानसिक और नैतिक दृढ़ता की ओर संकेत करता है। विवेकानंद जी का नैतिक दर्शन आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और कर्तव्यबोध पर आधारित था। वे युवकों को यह सीख देते थे कि अपने भीतर झाँकना सीखो, क्योंकि जब व्यक्ति स्वयं पर विश्वास करने लगता है तभी समाज और राष्ट्र का निर्माण कर सकता है।

आज जब नैतिक मूल्यों का क्षरण दिखाई देता है, स्वार्थ सेवा पर भारी पड़ता है और संवेदनशीलता कम होती जा रही है, विवेकानंद जी का मानवतावादी दृष्टिकोण हमें यह स्मरण कराता है कि हर मनुष्य में देवत्व निहित है और उसी का सम्मान ही सच्चा धर्म है।

30 वर्ष की आयु में स्वामी विवेकानंद ने शिकागो (अमेरिका) के विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया और सार्वभौमिक पहचान दिलाई। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था— “यदि भारत को जानना चाहते हो तो विवेकानंद जी को पढ़िए, उनमें आपको सब कुछ सकारात्मक पाएँगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।”

11 सितंबर 1893 को अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में उन्होंने भारतीय संस्कृति, दर्शन और अध्यात्मवाद का परिचय दिया। उस भाषण को ऐतिहासिक भाषण के रूप में समझा जाता है।

योग के विषय में विवेकानंद जी की दृष्टि

योग के विषय में विवेकानंद जी की दृष्टि अत्यंत व्यापक थी। उनके लिए योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा के संतुलन का मार्ग था। शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत के उपासक थे। शंकराचार्य की भांति उनका जीवन भी अद्वैतनीय कर्म, सतत भ्रमण, आध्यात्मिकता, संगठन, समाज चिंतन और ज्ञान परिवर्तन में लगा।

भारतवर्ष में जितने भी वेद, मन्तर, दर्शनशास्त्र थे, उन सब का एक ही लक्ष्य था— पूर्णता प्राप्त करके आत्मा को मुक्त कर लेना। इसका एक ही उपाय है— योग। स्वामी विवेकानंद ने राजयोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग— कई योग पद्धतियों का अभ्यास किया। उनका मानना था कि योग की सभी धाराएँ एक ही लक्ष्य की ओर ले जाती हैं।

उन्होंने योग को युवाओं के लिए अत्यंत सरल बनाया। राजयोग के सप्तम अध्याय में स्वामी विवेकानंद ने बताया कि यदि चित्त की शुद्धि के साथ संयम न हो तो अलौकिक ज्ञान के साथ अहंकार मिल जाता है।

आज की युवा पीढ़ी के लिए योग मानसिक स्वास्थ्य का साधन बन सकता है। ध्यान, प्राणायाम और संयमित जीवन शैली से युवाओं की आंतरिक शक्ति, एकाग्रता और आत्मनियंत्रण की क्षमता विकसित हो जाती है। योग के माध्यम से युवा न केवल तनाव और अवसाद से मुक्त हो सकता है, बल्कि अपने लक्ष्य के प्रति अधिक स्पष्ट और सजग बन सकता है तथा अपने कर्म के प्रति उत्तरदायित्व निभा सकता है।

जोसेफ जोशिया गुडविन स्वामी विवेकानंद के मित्र और अनुयायी थे। उन्होंने 1896 में स्वामी जी के व्याख्यानों का एक संकलन तैयार किया और उस संकलन को बाद में कर्मयोग के रूप में प्रकाशित किया। उन्होंने कहा— कोई व्यक्ति काम किए बिना एक पल भी नहीं रह सकता; प्रत्येक पल कर्म करने से ही कुछ पा सकता है।

विवेकानंद जी के नैतिक मूल्यों और योग दर्शन को जीवन में उतार जाए तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन स्वाभाविक रूप से घटित होंगे। उनके अनुसार पहला कर्तव्य है कि अपने प्रति घृणा न करें, स्वयं में विश्वास रखें और ईश्वर में विश्वास रखें। भक्ति को परम प्रेम रूप दर्शाते हुए उन्होंने भक्ति की गहरी विवेचना की है, जो नारद भक्ति सूत्र के अनुरूप है।

युवा हिंसा की जगह संवाद, निराशा की जगह आशा, स्वार्थ की जगह सेवा और भक्ति को अपनाएंगे। ऐसा युवा केवल अपने लिए ही नहीं बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए भी जीना सीखेगा। विवेकानंद जी का सपना था— भारत का युवा आध्यात्मिक रूप से जागरूक हो, परंतु संसार से पलायन न करे बल्कि समाज के बीच रहकर उसे दिशा दे।

आज की युवा पीढ़ी यदि उनके बताए मार्ग पर चलकर नैतिकता, आत्मबल और योग को अपने जीवन का आधार बना ले, तो एक सशक्त, संवेदनशील और सकारात्मक समाज का निर्माण निश्चित रूप से किया जा सकता है।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments