2 अप्रैल 2025 | नई दिल्ली
संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में उस समय विशेष ऊर्जा और गूंज सुनाई दी जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 पर बेहद प्रभावशाली, तार्किक और इतिहास-निरूपक भाषण दिया। उनका भाषण केवल एक पार्टी लाइन का प्रतिनिधित्व नहीं था, बल्कि भारतीय समाज के उस वर्ग के लिए आश्वासन था, जो दशकों से वक्फ संपत्तियों की अव्यवस्था, भ्रष्टाचार और अपारदर्शिता का शिकार रहा है। अमित शाह ने यह स्पष्ट किया कि यह विधेयक किसी धर्म, संप्रदाय या समुदाय के अधिकारों को हड़पने के लिए नहीं, बल्कि वक्फ जैसी पवित्र संस्थाओं को फिर से एक पारदर्शी और जनकल्याणकारी स्वरूप देने के लिए लाया गया है।
अमित शाह ने अपने भाषण में इस विधेयक के पीछे की वैचारिक संरचना और व्यावहारिक उद्देश्य पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि वर्षों से वक्फ संपत्तियों का दुरुपयोग हो रहा था, और इससे सबसे अधिक नुकसान उन गरीब, अनाथ, विधवा और वंचित मुसलमानों को हुआ, जिनके लिए ये संपत्तियां वक्फ की गई थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक और सांठगांठ वाले तबकों ने वक्फ संस्थाओं को अपनी व्यक्तिगत जागीर बना लिया था। अब इस विधेयक के ज़रिए सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि हर वक्फ संपत्ति राष्ट्रहित में और वास्तविक ज़रूरतमंदों के कल्याण में उपयोग हो, और इसके लिए जवाबदेही तय की जाए।
गृह मंत्री ने अपने भाषण में कहा कि यह विधेयक केवल एक संशोधन नहीं, बल्कि वक्फ प्रशासन की बुनियादी पुनर्रचना है। इसके तहत वक्फ बोर्डों की कार्यप्रणाली को आधुनिक बनाया गया है। अमित शाह ने ज़ोर देकर कहा कि अब सभी वक्फ संपत्तियों का डिजिटल रजिस्ट्रेशन, CAG द्वारा नियमित ऑडिट, और विवाद समाधान के लिए न्यायिक ट्रिब्यूनल तथा उच्च न्यायालय में अपील का विकल्प उपलब्ध होगा। उन्होंने बताया कि वक्फ बोर्डों में महिलाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और गैर-मुस्लिम विशेषज्ञों को भी प्रतिनिधित्व मिलेगा, ताकि निर्णय केवल मौलवी या राजनीतिक हितों के अनुसार न हों, बल्कि राष्ट्र और समाज के व्यापक हित में हों।
अपने भाषण के दौरान अमित शाह ने विपक्ष के उन आरोपों को भी सशक्त रूप से खारिज किया जिसमें इस विधेयक को मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताया जा रहा था। उन्होंने कहा कि यह विधेयक मुसलमानों के खिलाफ नहीं, बल्कि उनके पक्ष में है, खासकर उन लाखों मुसलमानों के लिए जो अब तक वक्फ से कुछ भी नहीं पा सके। शाह ने पूछा कि अगर वक्फ संपत्तियां अनाम या “यूज़र-बेस्ड” आधार पर घोषित होती रहीं तो पारदर्शिता और न्याय का क्या होगा? उन्होंने स्पष्ट किया कि “वक्फ-बाय-यूज़र” जैसी अवधारणाएं संविधान और न्याय व्यवस्था के विरुद्ध हैं, और इन्हें हटाना एक ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी है।
अमित शाह ने कहा कि इस विधेयक का नाम ही अपने उद्देश्य को प्रतिबिंबित करता है – UMEED (Unified Waqf Management, Empowerment, Efficiency and Development)। यह केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक दृष्टिकोण है, जिसमें वक्फ संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन के साथ-साथ समाज के सशक्तिकरण, दक्षता और समग्र विकास का लक्ष्य निहित है। उन्होंने यह भी बताया कि इस कानून के ज़रिए सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि वक्फ की आय केवल मस्जिदों या धार्मिक कार्यों तक सीमित न रहे, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला कल्याण और रोज़गार सृजन जैसे वास्तविक ज़रूरतों में खर्च हो।
गृह मंत्री के इस भाषण के बाद सदन में जबरदस्त उत्साह देखा गया। कई सदस्यों ने इसे एक ऐतिहासिक वक्तव्य बताया जो केवल सरकार का घोषणापत्र नहीं बल्कि देश के बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच सामाजिक विश्वास बहाल करने का प्रयास है। अमित शाह का भाषण न केवल विधेयक के तकनीकी पक्षों पर रोशनी डालता है, बल्कि एक व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जिसमें न्याय, सहभागिता और पारदर्शिता के सिद्धांत प्रमुख हैं।
अमित शाह का संसद में दिया गया यह भाषण वक्फ विधेयक 2025 की आत्मा को शब्दों में ढालने वाला एक ऐतिहासिक दस्तावेज बन गया है। यह भाषण उन सभी नागरिकों के लिए भी था, जो धार्मिक संस्थाओं की आड़ में भ्रष्टाचार और बंद दरवाजों के फैसलों से त्रस्त हैं। अमित शाह ने यह स्पष्ट किया कि यह कानून धर्म नहीं, व्यवस्था की बात करता है, और उसका मकसद है — मजहब की आड़ में पनपती मनमानियों को खत्म कर, हक़दारों तक उनका हक पहुंचाना। यह भाषण निस्संदेह विधेयक के पारित होने की दिशा में निर्णायक रहा, और आने वाले समय में जब यह विधेयक अधिनियम बनेगा, तब इसे संसद की इस ऐतिहासिक बहस का केंद्रबिंदु माना जाएगा।




