महेंद्र कुमार | नई दिल्ली 6 जनवरी 2025
बंदूक दो, वर्दी दो… लेकिन इंसान मत रहने दो
यह नया भारत है—जहां जवान से कहा जाता है कि सीमा पर खड़ा होकर गोली खाओ, बर्फ़ में जमो, रेगिस्तान में जलो, समुद्र में डूबो, और ज़रूरत पड़े तो चुपचाप शहीद हो जाओ। लेकिन अगर उसी जवान ने यह पूछ लिया कि वह कब शादी करेगा, किससे प्यार करेगा और कब परिवार बसाएगा—तो तुरंत “अनुशासन” याद दिला दिया जाता है। सरकार के नए फरमान के मुताबिक स्थायी सैनिक बनने से पहले अग्निवीरों की शादी पर रोक है। यानी देश के लिए जान देने की पूरी आज़ादी है, लेकिन अपनी ज़िंदगी जीने की नहीं। यह आदेश नहीं, एक सोच है—और यह सोच खतरनाक है। यह कहा जा रहा है कि यह सिर्फ़ एक “सेवा शर्त” है। सवाल यह है कि सेवा शर्तें कब से इंसान की निजी ज़िंदगी तय करने लगीं? जवान से कहा जाता है—तुम 24 घंटे देश के हो, तुम्हारा शरीर देश का है, तुम्हारा समय देश का है, तुम्हारा भविष्य देश का है। अब अगला कदम साफ़ दिख रहा है—तुम्हारे रिश्ते भी देश तय करेगा। शादी मत करो, क्योंकि शादी करोगे तो घर होगा, ज़िम्मेदारी होगी, सोच होगी। और सोच वाला जवान सिर्फ़ गोली नहीं चलाता, वह सवाल भी करता है। और सवाल पूछने वाला जवान हर सत्ता को असहज करता है।
अनुशासन नहीं, अकेलापन पैदा करने की नीति
शादी कोई ऐश नहीं है, कोई अपराध नहीं है—यह इंसान को इंसान बनाए रखने का आधार है। परिवार इंसान को संवेदनशील बनाता है, उसे ज़िम्मेदार बनाता है। लेकिन इस फरमान के पीछे का डर साफ़ है—अगर जवान का परिवार होगा, तो वह सिर्फ़ आदेश नहीं मानेगा, वह यह भी सोचेगा कि आदेश सही है या नहीं। इसलिए पहले शादी रोको, फिर रिश्ते कम करो, फिर भावनाओं को कमज़ोरी घोषित करो। और अंत में एक ऐसा जवान तैयार करो जो अकेला हो, कटा हुआ हो और हर आदेश आंख बंद करके माने।
RSS मॉडल अब सेना में?
यह कोई अचानक लिया गया प्रशासनिक फ़ैसला नहीं लगता। यह वही पुराना मॉडल है—रिश्तों से दूरी, परिवार से दूरी, व्यक्तिगत जीवन से दूरी। एक ऐसा कैडर जो सिर्फ़ संगठन के लिए जिए, सोचे और मरे। फर्क बस इतना है कि अब यह प्रयोग सेना में किया जा रहा है। जबकि भारतीय सेना किसी संगठन की प्रयोगशाला नहीं है। सेना संविधान से चलती है, किसी विचारधारा के भर्ती मैनुअल से नहीं।
संविधान बनाम सत्ता की सोच
भारतीय संविधान हर नागरिक को मौलिक अधिकार देता है—चाहे वह किसान हो, मज़दूर हो या सैनिक। वर्दी पहनने से कोई आदमी संविधान से बाहर नहीं हो जाता। जवान भी नागरिक है, उसके भी अधिकार हैं। लेकिन इस फरमान में जवान को नागरिक नहीं, “संसाधन” माना जा रहा है—जिसे इस्तेमाल किया जाएगा, नियंत्रित किया जाएगा और ज़रूरत खत्म होते ही भुला दिया जाएगा।
आज शादी पर रोक, कल सोच पर ताला
इतिहास बताता है कि नियंत्रण हमेशा छोटे फैसलों से शुरू होता है। आज कहा गया—शादी मत करो। कल कहा जाएगा—सोच संभाल कर रखो। और परसों कहा जाएगा—वोट की ज़रूरत नहीं, तुम सैनिक हो। यही रास्ता लोकतंत्र को धीरे-धीरे खोखला करता है। यही रास्ता सेना को नागरिकों की सेना से सत्ता की सेना में बदल देता है।
अनुशासन के नाम पर अधिकारों की हत्या
अनुशासन का मतलब यह नहीं होता कि इंसान को मशीन बना दिया जाए। अनुशासन का मतलब होता है—कर्तव्य और अधिकार के बीच संतुलन। लेकिन यहां संतुलन नहीं, सिर्फ़ आदेश है। यह फरमान जवान की इंसानियत पर हमला है, उसके भविष्य पर हमला है और अंततः लोकतंत्र पर हमला है।
देश को जवान चाहिए, आज्ञाकारी कैडर नहीं
देश को ऐसे जवान चाहिए जो बहादुर हों, समझदार हों, संवेदनशील हों—जो संविधान को समझें और उसकी रक्षा करें। देश को ऐसे जवान नहीं चाहिए जो बिना सोचे हर आदेश मान लें। क्योंकि जवान अगर इंसान नहीं रहेगा, तो देश भी लोकतंत्र नहीं रहेगा।




