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शेख हसीना की पारंपरिक सीट पर RSS से जुड़े गोबिंद का नामांकन खारिज, BNP पर साजिश के आरोप

अंतरराष्ट्रीय डेस्क | 4 जनवरी 2026

बांग्लादेश में हिंदू नेता के चुनाव लड़ने पर रोक

बांग्लादेश में आगामी आम चुनावों से पहले अल्पसंख्यक राजनीति को लेकर एक बड़ा और संवेदनशील विवाद सामने आया है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पारंपरिक संसदीय सीट मानी जाने वाली गोपालगंज से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे प्रमुख हिंदू नेता गोबिंद चंद्र प्रमाणिक का नामांकन चुनाव अधिकारियों ने खारिज कर दिया है। गोबिंद चंद्र प्रमाणिक को बांग्लादेश में हिंदू समुदाय के एक सक्रिय और मुखर नेता के रूप में जाना जाता है। कुछ रिपोर्टों में उनका वैचारिक जुड़ाव हिंदू संगठनों से बताया गया है। नामांकन रद्द होने के बाद गोबिंद ने इस फैसले को केवल तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक साजिश करार देते हुए सीधे तौर पर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

चुनाव अधिकारियों की ओर से नामांकन खारिज करने के पीछे तकनीकी कारण बताए गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि गोबिंद चंद्र प्रमाणिक द्वारा जमा किए गए नामांकन पत्रों के साथ समर्थकों के हस्ताक्षर और कुछ दस्तावेज चुनाव कानून के प्रावधानों के अनुरूप नहीं पाए गए। बांग्लादेश के चुनावी नियमों के अनुसार, निर्दलीय उम्मीदवार को तय संख्या में पंजीकृत मतदाताओं का समर्थन प्रमाणित रूप से प्रस्तुत करना होता है। हालांकि गोबिंद का दावा है कि उन्होंने सभी आवश्यक दस्तावेज नियमों के तहत जमा किए थे, लेकिन नामांकन की जांच के दौरान जानबूझकर अड़चनें डाली गईं और उनके समर्थकों को दबाव में लाकर पीछे हटने के लिए मजबूर किया गया।

नामांकन रद्द होने के बाद गोबिंद चंद्र प्रमाणिक ने आरोप लगाया कि BNP समर्थकों ने हिंदू मतदाताओं और प्रस्तावकों को डराया-धमकाया, ताकि वे अपना समर्थन वापस ले लें और कागजी प्रक्रिया कमजोर दिखाई दे। उनका कहना है कि गोपालगंज क्षेत्र में हिंदू मतदाताओं की संख्या उल्लेखनीय है और यदि उन्हें चुनाव लड़ने दिया जाता, तो अल्पसंख्यक वोटों का एक बड़ा ध्रुवीकरण संभव था। इसी आशंका के चलते, उनके अनुसार, उन्हें चुनावी मैदान से बाहर करने की रणनीति अपनाई गई। गोबिंद ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मामला सिर्फ उनके व्यक्तिगत राजनीतिक अधिकारों का नहीं, बल्कि बांग्लादेश में हिंदू समुदाय की राजनीतिक भागीदारी को सीमित करने की एक व्यापक कोशिश का हिस्सा है।

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इस पूरे घटनाक्रम ने बांग्लादेश की चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यक संगठनों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ सामाजिक दबाव, हिंसा की घटनाएं और राजनीतिक हाशिए पर धकेले जाने की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। ऐसे माहौल में किसी प्रमुख हिंदू नेता का नामांकन रद्द होना केवल एक तकनीकी प्रशासनिक निर्णय नहीं माना जा सकता, बल्कि इसे लोकतांत्रिक अधिकारों और समान प्रतिनिधित्व से जुड़ा अहम मुद्दा माना जा रहा है। विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों की मांग है कि चुनाव आयोग इस पूरे मामले की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच कराए।

गोपालगंज सीट का राजनीतिक महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह क्षेत्र लंबे समय तक शेख हसीना और उनकी पार्टी का मजबूत गढ़ रहा है। ऐसे में यहां से किसी स्वतंत्र या वैकल्पिक उम्मीदवार का उभरना सत्तारूढ़ दल और विपक्ष—दोनों के लिए राजनीतिक चुनौती माना जा रहा था। गोबिंद चंद्र प्रमाणिक ने संकेत दिए हैं कि वे नामांकन रद्द किए जाने के फैसले को उच्च चुनावी प्राधिकरण या अदालत में चुनौती देंगे। माना जा रहा है कि यह मामला आने वाले दिनों में बांग्लादेश की राजनीति में अल्पसंख्यक अधिकारों, चुनावी निष्पक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर एक बड़ी बहस का रूप ले सकता है।

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