अंतरराष्ट्रीय डेस्क 31 दिसंबर 2025
खाड़ी क्षेत्र के दो सबसे ताकतवर देश—सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई)—के रिश्तों में इस महीने की शुरुआत से ही लगातार तल्खी बढ़ती जा रही थी। लंबे समय से रणनीतिक साझेदार रहे ये दोनों देश अब क्षेत्रीय राजनीति, आर्थिक नेतृत्व और प्रभाव बढ़ाने की दौड़ में आमने-सामने खड़े नजर आने लगे हैं। तेल नीति से लेकर व्यापार, निवेश और क्षेत्रीय नेतृत्व तक, कई मुद्दों पर मतभेद खुलकर सामने आए हैं। यूएई की ओर से की गई एक अहम घोषणा के बाद यह उम्मीद जरूर जगी कि शायद दोनों देशों के बीच बढ़ता तनाव कुछ कम हो सकता है। इस घोषणा को सुलह की दिशा में एक संकेत के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार हो सकता है। असलियत यह है कि दोनों देशों की जियोपॉलिटिकल महत्वाकांक्षाएं अब टकराव के मोड़ पर पहुंच चुकी हैं, जिसे केवल एक बयान या घोषणा से सुलझाना आसान नहीं है।
दरअसल, सऊदी अरब खुद को खाड़ी और अरब दुनिया का निर्विवाद नेता मानता रहा है, जबकि बीते कुछ वर्षों में यूएई ने तेज़ी से आर्थिक, कूटनीतिक और सैन्य ताकत बढ़ाकर अपनी अलग पहचान बनाई है। यही आत्मविश्वास अब प्रतिस्पर्धा में बदलता दिख रहा है। चाहे वैश्विक निवेश आकर्षित करने की होड़ हो, अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को अपने यहां लाने की नीति या फिर क्षेत्रीय संकटों में दखल—दोनों देश अब एक-दूसरे के कदमों पर नजर रखे हुए हैं।
इस बढ़ते तनाव का असर सिर्फ द्विपक्षीय रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता और वैश्विक राजनीति पर भी पड़ सकता है। फिलहाल यूएई की ताज़ा घोषणा ने कयासों को जन्म दिया है कि शायद बातचीत का रास्ता खुले, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यही है कि सऊदी अरब और यूएई के बीच शक्ति संतुलन और नेतृत्व की यह खींचतान अभी खत्म होती नहीं दिख रही। खाड़ी की राजनीति में यह टकराव आने वाले दिनों में और किस दिशा में जाएगा, इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।




