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अंधभक्तों की अंतहीन पीड़ा-पुराण: राहुल गाँधी क्यों चैन से नहीं रहने देते?

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एबीसी डेस्क 18 दिसंबर 2025

राहुल गाँधी से “अंधभक्तों” को शिकायतें हैं—इतनी गहरी, इतनी निजी, मानो उनका पासवर्ड बदल दिया गया हो। शिकायतें भी कैसी-कैसी! जर्मनी क्यों गए? अरे भाई, विदेश जाना अब देशद्रोह का प्रीमियम पैकेज हो गया है क्या? भट्टा–पारसौल क्यों गए? किसान के बीच जाना भी अब अपराध है—वो भी बिना कैमरा एंगल पूछे। समस्या राहुल के जाने में नहीं, समस्या उनके “यहां वहां” जाने में है। भक्त चाहते हैं कि नेता वही जाए जहाँ स्क्रिप्ट पहले से लिखी हो, तालियाँ आरक्षित हों और सवालों का जवाब “राष्ट्रहित” में टाल दिया जाए।

फिर पहनावे का मुद्दा। ठंड में टी-शर्ट क्यों? क्योंकि सर्दी का थर्मामीटर अब टीवी डिबेट तय करता है। भक्तों को लगता है कि तापमान उतना ही होता है जितना एंकर चिल्लाता है। पैदल चल दें तो भक्तों के सीने में छुरियाँ चल जाती हैं—“ये क्या नाटक है?” बाइक चला दें तो भक्तों की साँसें स्पीड ब्रेकर ढूँढने लगती हैं—“ये क्या स्टंट है?” यानी राहुल अगर खड़े रहें तो समस्या, बैठें तो समस्या, मुस्कराएँ तो समस्या—और अगर सांस लें तो राष्ट्र संकट में।

मुक़दमों का अध्याय तो अलग ही साहित्य है। नेशनल हेराल्ड जैसे फर्जी मुक़दमे ठोंके गए, संसद सदस्यता छीनी गई, घर रातों-रात—पर राहुल मुस्कराते रहे। यही तो असली तकलीफ़ है। भक्त चाहते थे आँसू, बयान, चीख-पुकार—पर मिला शांति का चेहरा। और जब किसी को दंड देने की कोशिश में देने वाला ही बेचैन हो जाए, तो पीड़ा स्वाभाविक है। मुस्कराहट उनके लिए सबसे बड़ा अपराध है—क्योंकि इससे उनका ट्रोल-टेम्पलेट बेकार हो जाता है।

संसद में आरोप लगे—लेडी सांसद बोलीं: “ये घूरता है, छेड़ता है।” राहुल फिर मुस्कराते रहे। भक्त और उनकी आंटी बिलबिलाते रहे। क्योंकि आरोप जब सबूत से तेज़ दौड़ते हैं, तब न्याय हांफने लगता है। मगर भक्तों को हांफते न्याय से नहीं, हांफती सच्चाई से दिक्कत है। उन्हें वो राजनीति चाहिए जिसमें सवाल पूछना असभ्यता और गाली देना राष्ट्रवाद हो।

भक्त चाहते हैं कि राहुल संसद में शानदार हिंदी बोलें—पर अमित शाह के “साले” पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं। भाषा की शुद्धता तब तक मायने रखती है, जब तक वो विपक्ष की जीभ पर हो। सत्ता की ज़ुबान में वही शब्द शहद बन जाता है। राहुल अपने कुत्ते से प्यार क्यों करते हैं? अरे चंपको, कुत्ता तो तुमसे भी ज़्यादा वफादार है—कम से कम बिना स्क्रिप्ट के भी सच तो पहचान लेता है। बॉडी लैंग्वेज कूल क्यों है? क्योंकि कुछ लोग हर मौसम में जलते हैं—और जलन की आँच से ही कूलनेस पैदा होती है।

तो अंधभक्तों, कब तक रोओगे? कब तक हर कदम पर ट्रिगर, हर मुस्कान पर बवाल, हर सवाल पर देशद्रोह? तुम सपने में भी बुदबुदाते होंगे—“ये दुख क्यों खत्म नहीं होता?” जवाब सीधा है: क्योंकि दुख का कारण राहुल नहीं, तुम्हारी अंधभक्ति है। और अंधभक्ति का इलाज रोशनी से होता है—टी-शर्ट से नहीं।

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