एबीसी डेस्क | 14 दिसंबर 2025
कांग्रेस पार्टी से 1940 से लेकर आज तक का “हिसाब” मांगने वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) एक बार फिर अपने ही संगठनात्मक फैसलों के कारण कठघरे में खड़ी दिखाई दे रही है। इस बार सवाल किसी विपक्षी हमले या चुनावी बयान से नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर लिए गए एक अहम निर्णय से पैदा हुए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर ‘राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष’ जैसे अस्थायी लेकिन प्रभावशाली पद पर नितिन नबीन की नियुक्ति ने BJP के भीतर लोकतंत्र, पारदर्शिता और निर्णय प्रक्रिया की वास्तविक स्थिति को लेकर गंभीर और असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। यह नियुक्ति उस समय की गई है, जब पार्टी खुद को दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पार्टी बताने का दावा करती है और लगातार कांग्रेस से उसके ऐतिहासिक फैसलों और संगठनात्मक प्रक्रियाओं का हिसाब मांगती रही है।
सबसे बुनियादी और निर्णायक सवाल यही है कि नितिन नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आखिर किस प्रक्रिया से बनाया गया? क्या यह फैसला किसी खुले, घोषित और विधिवत संगठनात्मक चुनाव के जरिए लिया गया, या फिर यह भी BJP की उस चर्चित ‘पर्ची संस्कृति’ का हिस्सा है, जिसके आरोप खुद पार्टी पर वर्षों से लगते रहे हैं? पार्टी नेतृत्व की ओर से अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इस पद के लिए और कितने नामों पर विचार हुआ, क्या किसी तरह की आंतरिक वोटिंग या रायशुमारी हुई, या फिर यह निर्णय चंद शीर्ष नेताओं की सहमति से बंद कमरे में तय कर लिया गया। सवाल यह भी है कि अगर प्रक्रिया इतनी ही पारदर्शी थी, तो पार्टी इसे सार्वजनिक रूप से बताने से क्यों बच रही है।
इस नियुक्ति ने एक और पुराने लेकिन अहम सवाल को फिर से हवा दे दी है—तीन साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद BJP अब तक पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष क्यों नहीं चुन पाई है? अगर पार्टी के भीतर सब कुछ लोकतांत्रिक, अनुशासित और सुव्यवस्थित है, तो फिर ‘कार्यकारी अध्यक्ष’ जैसे अस्थायी इंतज़ाम को स्थायी व्यवस्था की तरह क्यों चलाया जा रहा है? क्या यह देरी केवल तकनीकी या संगठनात्मक कारणों से जुड़ी है, या फिर इसके पीछे शीर्ष नेतृत्व के भीतर चल रही सत्ता-संतुलन की खींचतान, गुटबाजी और भरोसे की कमी जैसी गहरी वजहें छिपी हुई हैं? राजनीतिक जानकार मानते हैं कि कार्यकारी अध्यक्ष का लंबा कार्यकाल इस बात का संकेत है कि पार्टी नेतृत्व किसी एक चेहरे पर अंतिम मुहर लगाने से बच रहा है।
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि नितिन नबीन की नियुक्ति के पीछे असली शक्ति किसकी है। क्या इस नाम पर RSS प्रमुख मोहन भागवत की कोई औपचारिक या अनौपचारिक सहमति शामिल है, या फिर यह फैसला एक बार फिर उस कथित “गुजरात लॉबी” की रणनीति का हिस्सा है, जिस पर पहले भी पार्टी और सरकार—दोनों में अपने पसंदीदा चेहरों को आगे बढ़ाने के आरोप लगते रहे हैं? BJP की ओर से इन सवालों पर पूरी तरह चुप्पी साध लेना इस संदेह को और गहरा करता है कि संगठन के बड़े फैसले अब खुले मंच पर नहीं, बल्कि सीमित दायरे में लिए जा रहे हैं।
विपक्षी दलों और स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर BJP वास्तव में आंतरिक लोकतंत्र में विश्वास रखती है, तो उसे यह बताना चाहिए कि उसके संगठन में आख़िरी बार वास्तविक और प्रतिस्पर्धात्मक चुनाव कब हुए थे। कितने सदस्यों ने वोटिंग में हिस्सा लिया, किन पदों पर दो या उससे अधिक उम्मीदवारों के बीच वास्तविक मुकाबला हुआ, और कितने पदों पर “सर्वसम्मति”, “अनुरोध” या “ऊपर से आए निर्देश” के नाम पर नाम तय कर दिए गए। आरोप यह है कि पार्टी का संगठनात्मक ढांचा अब धीरे-धीरे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से हटकर एक निर्देशात्मक मॉडल में तब्दील होता जा रहा है, जहां चुनाव औपचारिकता बनते जा रहे हैं।
विपक्ष का तंज है कि “पर्ची से संचालक, मुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष तय करने वाली व्यवस्था” आज देश को लोकतंत्र और जवाबदेही का पाठ पढ़ा रही है। कहा जा रहा है कि BJP के अधिकांश बड़े संगठनात्मक और राजनीतिक फैसले बंद कमरों में लिए जाते हैं, जहां शीर्ष नेतृत्व की सहमति ही अंतिम निर्णय बन जाती है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या BJP अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्षों और मुख्यमंत्रियों के चयन की पूरी प्रक्रिया—मतदाता सूची, मतदान का आंकड़ा, उम्मीदवारों के नाम और मुकाबले की जानकारी—सार्वजनिक करने का साहस दिखाएगी, या फिर इसे भी आंतरिक मामला बताकर टाल दिया जाएगा।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का तर्क है कि कांग्रेस का राजनीतिक इतिहास देश के सामने हमेशा खुली किताब की तरह रहा है। उसके अधिवेशन, कार्यसमिति की बैठकों, आंतरिक चुनावों, नेतृत्व परिवर्तन और यहां तक कि गुटबाजी और मतभेद भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं। 1940 से लेकर आज तक कांग्रेस के उतार-चढ़ाव, टूट-फूट, विभाजन और वैचारिक संघर्ष किसी से छिपे नहीं हैं। इसके विपरीत BJP पर आरोप है कि उसने समय के साथ-साथ आंतरिक लोकतंत्र को सीमित करते हुए संगठन को एक “कमांड एंड कंट्रोल” प्रणाली में बदल दिया है, जहां सवाल पूछना और वैकल्पिक नेतृत्व उभरना लगातार मुश्किल होता जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब BJP कांग्रेस से दशकों पुराना हिसाब मांगती है, तो उसे पहले अपने वर्तमान और हालिया अतीत का लेखा-जोखा देश के सामने रखना चाहिए। कितने राज्यों में पार्टी अध्यक्ष वास्तव में चुनाव लड़कर चुने गए, कितनी जगहों पर उन्हें निर्विरोध घोषित किया गया, कितनी बार संगठनात्मक चुनाव टाले गए और कितनी बार “ऊपर से आए नाम” को अंतिम फैसला बना दिया गया—इन सभी सवालों का जवाब दिए बिना पारदर्शिता के दावे खोखले ही रहेंगे।
यह पूरा विवाद भारतीय राजनीति के एक बुनियादी सवाल को फिर से केंद्र में ले आता है—क्या राजनीतिक दल खुद उसी लोकतांत्रिक कसौटी पर खरे उतरते हैं, जिसकी अपेक्षा वे दूसरों से करते हैं? विपक्ष का साफ कहना है कि अगर BJP सच में पारदर्शिता और जवाबदेही में विश्वास रखती है, तो उसे कांग्रेस से सवाल पूछने से पहले अपने संगठनात्मक चुनावों, नियुक्तियों और निर्णय प्रक्रिया का पूरा, दस्तावेज़ी और सार्वजनिक ब्यौरा देश के सामने रखना होगा। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक “1940 से हिसाब” जैसी मांगें राजनीतिक शोर और दोहरे मापदंडों की मिसाल बनकर ही रह जाएंगी।




