ग्रेटर नोएडा की फास्ट ट्रैक कोर्ट में दादरी लिंचिंग केस एक बार फिर सुर्खियों में है। साल 2015 में भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मारे गए मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या के मामले को उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा वापस लेने की कोशिश पर अदालत ने तीखा सवाल खड़ा किया है। सुनवाई के दौरान अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने सीधे पूछा—“क्या धारा 302 यानी हत्या का कोई मामला कभी इस तरह वापस लिया गया है?” यह सवाल सिर्फ कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश के न्याय तंत्र और राजनीतिक नैतिकता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि यह घटना कथित तौर पर “अफवाहों” के चलते हुई और इसमें किसी आग्नेय या धारदार हथियार का इस्तेमाल नहीं हुआ, बल्कि लाठी, डंडे और ईंट-पत्थर बरामद हुए। इसी आधार पर सरकार ने तर्क दिया कि हत्या का मामला कमजोर है और इसे “सामाजिक सौहार्द” की बहाली के लिए वापस लिया जाना चाहिए। लेकिन अदालत ने इस दलील पर असहजता जताते हुए कहा कि हत्या तो हत्या होती है—चाहे वह गोली से हो या भीड़ के डंडों से।
अख़लाक़ के परिवार की ओर से वकील ने सरकार के इस कदम का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार खुद यह स्वीकार कर रही है कि लाठी-डंडों और लोहे की रॉड से हत्या हुई, फिर भी हत्या का केस वापस लेने की बात कर रही है। यह न्याय का मज़ाक है। पीड़ित परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि वर्षों से केस को जानबूझकर धीमा किया गया, गवाहों के बयान दर्ज नहीं हुए और अब उसी देरी को बहाना बनाकर सरकार पीछे हटना चाहती है।
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या का नहीं, बल्कि उस दौर का प्रतीक बन गया है, जहां भीड़ के हाथों इंसाफ कुचला गया। मोहम्मद अख़लाक़ को उनके घर से घसीटकर मारा गया, उनके बेटे दानिश को गंभीर रूप से घायल किया गया और यह सब गोमांस रखने की अफवाह पर हुआ। इस घटना ने पूरे देश में असहिष्णुता, मॉब लिंचिंग और कानून-व्यवस्था पर बहस छेड़ दी थी। लेखकों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने पुरस्कार लौटाए, लेकिन आज वही केस सरकार की फाइलों में “सौहार्द” के नाम पर दफन करने की तैयारी में दिखता है।
आलोचकों का कहना है कि यह “नए भारत” की वही तस्वीर है, जहां अपराध और सत्ता के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। जहां हत्या और बलात्कार के आरोपियों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है, उन्हें माला पहनाई जाती है, जबकि पीड़ित परिवार सालों तक अदालतों के चक्कर काटता रहता है। बैंक घोटाले करने वाले देश छोड़कर भाग जाते हैं और आर्थिक अपराधी सत्ता की छत्रछाया में सुरक्षित दिखाई देते हैं। वहीं, हर बड़े घोटाले या अपराध के बाद आरोपी किसी न किसी तरह सत्ताधारी दल में शामिल होकर “धुल” जाते हैं।
अदालत की अगली सुनवाई में यह तय होगा कि यह मामला वापस लिया जाएगा या ट्रायल जारी रहेगा। लेकिन अदालत का यह सवाल—“क्या कभी हत्या का केस वापस हुआ है?”—इतिहास में दर्ज हो गया है। यह सवाल सिर्फ दादरी केस के लिए नहीं, बल्कि उस लोकतंत्र के लिए है, जहां कानून से ऊपर राजनीति और सत्ता के हिसाब से इंसाफ तौला जा रहा है। अगर हत्या जैसे जघन्य अपराध भी “राज्य की मर्जी” से खत्म किए जाने लगे, तो आम आदमी के लिए न्याय का मतलब क्या रह जाएगा—यही आज देश का सबसे बड़ा सवाल है।




