एबीसी डेस्क 13 दिसंबर 2025
नई दिल्ली। कांग्रेस ने मोदी सरकार पर तीखा व्यंग करते हुए आरोप लगाया है कि बीते वर्षों में केंद्र की भाजपा सरकार ने जनकल्याण की नई योजनाएँ गढ़ने से ज़्यादा पुरानी योजनाओं के नाम बदलने पर ऊर्जा लगाई है। कांग्रेस का कहना है कि यूपीए दौर में शुरू की गई दर्जनों योजनाओं को सिर्फ नया नाम, नया लोगो और नया पोस्टर देकर “नई पहल” के तौर पर पेश किया गया, जबकि ज़मीन पर ढांचा, उद्देश्य और लाभार्थी वही रहे। कांग्रेस नेताओं ने इसे “रीब्रांडिंग की राजनीति” करार देते हुए कहा कि सरकार ने काम से ज़्यादा प्रचार पर भरोसा किया।
कांग्रेस के मुताबिक, मनरेगा जैसी ऐतिहासिक योजना को “पूज्य बापू ग्रामीण रोज़गार योजना” कहने की कवायद हो या निर्मल भारत अभियान को स्वच्छ भारत मिशन बनाना—असल में नीति वही रही, बस नाम बदल गया। इसी तरह एलपीजी पर डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर को पहल, बेसिक सेविंग्स बैंक अकाउंट को जनधन, राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन को दीनदयाल अंत्योदय योजना-एनयूएलएम और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (आजीविका) को दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण योजना कह दिया गया। कांग्रेस का तंज है कि “फाइल वही, फॉर्म वही—बस कवर पेज बदल गया।”
पार्टी का आरोप है कि राष्ट्रीय विनिर्माण नीति को मेक इन इंडिया, राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना को डिजिटल इंडिया, राष्ट्रीय समुद्री विकास कार्यक्रम को सागरमाला, नेशनल ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क को भारतनेट और जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन को अमृत कहकर सरकार ने जनता को यह आभास देने की कोशिश की कि सब कुछ नया है। कांग्रेस नेताओं ने चुटकी लेते हुए कहा, “देश में सड़कें पहले भी बनती थीं, अब बस नाम अंग्रेज़ी से हिंदी या हिंदी से ब्रांडिंग में बदल गया है।”
कांग्रेस ने सामाजिक योजनाओं का हवाला देते हुए कहा कि इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना को प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना, स्वावलंबन को अटल पेंशन योजना, इंदिरा आवास योजना को प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना, मुफ़्त एलपीजी कनेक्शन की पुरानी पहल को उज्ज्वला, और आम आदमी बीमा योजना को प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा बना दिया गया। पार्टी का कटाक्ष है कि “नाम बदलते ही श्रेय भी बदल जाता है—यही नया गणित है।”
कृषि और ग्रामीण क्षेत्र में भी यही पैटर्न दिखाने का दावा किया गया। कांग्रेस के अनुसार संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना को प्रधानमंत्री फसल बीमा, त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम को प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई, राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य परियोजना को सॉयल हेल्थ कार्ड, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना समेत कार्यक्रमों को परंपरागत कृषि विकास, और नीम कोटेड यूरिया के इर्द-गिर्द पीएम प्रणाम जैसे नाम देकर सरकार ने पुराने ढांचे पर नया साइनबोर्ड टांग दिया। कांग्रेस ने कहा कि “किसान वही, खेत वही—बस बैनर बदल गया।”
महिलाओं और बालिकाओं से जुड़ी पहलों पर भी कांग्रेस ने सवाल उठाए। पार्टी का कहना है कि नेशनल गर्ल चाइल्ड डे से जुड़े कार्यक्रमों को बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ नाम देकर पेश किया गया, लेकिन ज़मीनी निवेश और परिणामों पर उतनी ही मेहनत नहीं दिखी। इसी तरह आईसीडीएस की सेवाओं को पोषण अभियान कहने से कुपोषण अपने आप कम नहीं होता—उसके लिए फंडिंग, निगरानी और अमल चाहिए।
कांग्रेस ने दवा और स्वास्थ्य क्षेत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि जन औषधि को प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना बना देने से दवाओं की उपलब्धता और गुणवत्ता अपने आप नहीं बढ़ती। यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम को मिशन इंद्रधनुष कहने से टीकाकरण की चुनौतियाँ खत्म नहीं हो जातीं—ग्राउंड पर सिस्टम मज़बूत करना पड़ता है।
कुल मिलाकर कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार ने “काम कम, नामकरण ज़्यादा” की नीति अपनाई। पार्टी ने व्यंग्य करते हुए कहा कि अगर नाम बदलने से ही देश बदल जाता, तो आज हर समस्या का समाधान पोस्टर से हो जाता। कांग्रेस ने सरकार से सवाल किया कि नई योजनाओं में नई फंडिंग कितनी है, पुराने लाभार्थियों तक अतिरिक्त लाभ कितना पहुँचा, और नतीजों का स्वतंत्र आकलन कहाँ है?
अंत में कांग्रेस ने कहा कि जनता को नामों से नहीं, परिणामों से फर्क पड़ता है। सरकार चाहे जितने भी नए नाम रख ले, असली परीक्षा ज़मीन पर होती है—रोज़गार बढ़ा या नहीं, आय बढ़ी या नहीं, सेवाएँ बेहतर हुईं या नहीं। कांग्रेस का तंज साफ़ है: “पोस्टर बदलने से नीति नहीं बदलती; नीति बदलने से ही देश बदलता है।”




