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ECI की दोहरी चाल: सुप्रीम कोर्ट में कहा ‘बेकार’, 2023 में बताया था ‘सबसे कारगर’

एबीसी डेस्क | नई दिल्ली | 9 दिसंबर 2025

देश के लोकतांत्रिक ढांचे की विश्वसनीयता तब सवालों के घेरे में आ जाती है जब चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था खुद अपने ही फैसलों पर विरोधाभासी बयान देने लगे। सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफ़नामे में चुनाव आयोग (ECI) ने यह स्वीकार किया कि डुप्लीकेट वोटरों का पता लगाने के लिए बनाया गया डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर—SIR—इतना अप्रभावी और घटिया था कि उसे “स्क्रैप” यानी कूड़ेदान में फेंकना पड़ा। अदालत में आयोग ने साफ कहा कि इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करना जोखिम भरा होता, इसलिए इसे पूरी तरह छोड़ देना पड़ा। पर यही वह बिंदु है, जहां पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर तीखे प्रश्न खड़े हो जाते हैं।

2023 में आयोग को ‘अत्यधिक प्रभावी’ लगा था वही सॉफ्टवेयर—100% अभियान मोड में लगाने का आदेश क्यों दिया गया?

सुप्रीम कोर्ट में आज जिस SIR सॉफ्टवेयर को चुनाव आयोग ने बेकार बताकर खारिज कर दिया, 2023 में उसी तकनीक को आयोग ने “अत्यधिक प्रभावी” और “प्रमुख समाधान” बताया था। इतना भरोसा जताया गया कि 2024 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले देशभर में कैंपेन मोड में 100% वोटर वेरिफिकेशन का आदेश जारी कर दिया गया। लाखों मतदाताओं के नाम इस अभियान के दौरान पुनः जांचे गए, और कई जगहों पर हटाए भी गए। अब सवाल यह है कि अगर सॉफ्टवेयर इतना ही खराब था कि अदालत में उसे ‘बेकार’ घोषित करना पड़ रहा है, तो देशभर में इसके आधार पर वोटर लिस्ट क्यों छानी गई? किस तकनीकी मूल्यांकन के आधार पर यह बड़ा फैसला लिया गया? और अगर समीक्षा नहीं हुई थी, तो यह सीधी लापरवाही है।

क्या करोड़ों मतदाताओं के अधिकारों के साथ खिलवाड़ हुआ? जवाबदेही कौन लेगा?

इस पूरे विवाद का सबसे गंभीर पहलू यह है कि मतदाता सूची देश के हर नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकारों का आधार है। जब उसी सूची की सफाई के लिए अपनाई गई तकनीक को बाद में ‘अविश्वसनीय’ कहा जाता है, तो प्रश्न उठते हैं कि क्या इस प्रक्रिया में लाखों वैध वोटर गलत तरीके से हटाए गए? क्या किसी राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव में गलत निर्णय लिए गए? और अगर ऐसा हुआ, तो इसकी जवाबदेही तय कौन करेगा?

कई राज्यों से पहले ही शिकायतें मिल रही थीं कि वैध मतदाताओं के नाम बिना उचित सत्यापन हटाए जा रहे हैं। चुनाव आयोग ने इन शिकायतों को अक्सर ‘लॉजिस्टिक त्रुटियाँ’ बताकर टाल दिया। लेकिन अब, जब आयोग खुद स्वीकार कर रहा है कि मुख्य उपकरण ही दोषपूर्ण था, तब यह स्पष्ट है कि समस्या साधारण नहीं बल्कि संरचनात्मक थी—और उसका असर लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सीधा पड़ा है।

चुनाव आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया और पारदर्शिता पर गहरी दरारें उजागर

यह विवाद केवल तकनीकी विफलता नहीं है; यह चुनाव आयोग की निर्णय-प्रक्रिया में गहरी असंगतियों को उजागर करता है। एक तरफ आयोग अदालत में एक सॉफ्टवेयर को कूड़ेदान योग्य बताता है, दूसरी तरफ उसी को देशव्यापी ऑपरेशन में उपयोग करने का आदेश दिया गया। यह विरोधाभास बताता है कि या तो चुनाव आयोग अपनी ही तकनीक का मूल्यांकन ईमानदारी से नहीं कर रहा था, या फिर चुनावी तैयारियों में जल्दबाज़ी और राजनीतिक दबाव के आगे उसके निर्णय समझौता कर रहे थे। दोनों ही स्थितियाँ खतरनाक हैं।

लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवश्यक है स्वतंत्र जांच और जवाबदेही

चुनाव आयोग की यह स्वीकारोक्ति केवल एक तकनीकी चूक नहीं है; यह लोकतंत्र की सुरक्षा पर सीधा वार है। जिस संस्था पर चुनाव की शुचिता बनाए रखने की जिम्मेदारी है, वह खुद अपने फैसलों में पारदर्शिता न बरते, तो मतदाता के विश्वास की नींव हिल जाती है।

अब यह आवश्यक हो गया है कि इस पूरी प्रक्रिया की एक स्वतंत्र, न्यायिक या संसदीय जांच हो—यह पता करने के लिए कि—

1. SIR सॉफ्टवेयर को पहले अत्यंत प्रभावी कैसे घोषित किया गया?

2. क्या राजनीतिक निर्देशों के कारण इसे लागू किया गया?

3. क्या गलत तकनीक के आधार पर हटाए गए मतदाताओं के वोटिंग अधिकार बहाल होंगे?

4. और सबसे अहम—क्या चुनाव आयोग की तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सुधार अनिवार्य हो चुका है?

चुनाव आयोग को जवाब देना होगा—मतदाताओं का भरोसा कोई प्रयोगशाला नहीं

सुप्रीम कोर्ट में दिए गए ताज़ा बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव आयोग को अपने भीतर की गलतियों को स्वीकार करने और सुधारने की दिशा में गंभीर कदम उठाने होंगे। लोकतंत्र के स्तंभों में से एक संस्था यदि तकनीकी निर्णय लेने में भी असंगतियाँ दिखाए, तो लोकतांत्रिक भविष्य खतरे में पड़ जाता है।

यह विवाद केवल एक सॉफ्टवेयर का मामला नहीं—यह भारत के मतदाता, मताधिकार की गरिमा और चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता से जुड़ा प्रश्न है। और इस प्रश्न का जवाब देश मांग रहा है।

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