अमनप्रीत सिंह । चंडीगढ़ 9 दिसंबर 2025
चंडीगढ़ जिला अदालत में एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया, जिसमें किडनैपिंग और रेप के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे एक युवक को अदालत ने सभी आरोपों से बरी कर दिया। इस फैसले ने न सिर्फ कानूनी गलियारों में चर्चा छेड़ दी, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि हर आपराधिक शिकायत के पीछे सच हमेशा वैसा नहीं होता जैसा पहली नज़र में दिखाई देता है। अदालत ने अपने फैसले में जिस आधार पर आरोपी को राहत दी, वह और भी हैरान करने वाला था—पीड़िता की शादी के रिसेप्शन की तस्वीरें, जिनमें वह बेहद खुश और सहज नजर आ रही थी।
फैसला सुनाते हुए जिला अदालत की जज याशिका ने कहा कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत घटनाक्रम और पीड़िता के व्यवहार में बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। अदालत ने उल्लेख किया कि शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप—जिसमें युवक पर लड़की को बहला-फुसलाकर भगाने, अवैध रूप से रोककर रखने और रेप करने तक के दावे शामिल थे—उनकी पुष्टि किसी भी विश्वसनीय सबूत से नहीं होती। इसके उलट, जिन तस्वीरों को अदालत में पेश किया गया, उनमें लड़की खुद आरोपी की शादी के रिसेप्शन में मौजूद थी और पूरी तरह प्रसन्न दिखाई दे रही थी। जज ने साफ लिखा कि “यह विश्वास करना कठिन है कि कोई महिला, जिसे कथित रूप से किडनैप किया गया और प्रताड़ित किया गया हो, वह उसी व्यक्ति की शादी के रिसेप्शन में इतनी खुशी के साथ शामिल हो सकती है।”
अदालत ने अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत कहानी को “अस्वाभाविक, अविश्वसनीय और प्रमाणों के विपरीत” बताया। अदालत ने आगे कहा कि यदि लड़की वास्तव में अपनी इच्छा के विरुद्ध रोकी गई होती या उस पर दबाव डाला गया होता, तो उसका सार्वजनिक रूप से कार्यक्रमों में शामिल होना और इतने लोगों के बीच पूरी तरह सुरक्षित व सहज दिखना परिस्थिति-साक्ष्यों से मेल नहीं खाता। अदालत ने स्पष्ट किया कि शिकायत में गंभीर विसंगतियाँ हैं और आरोप साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य नहीं दिए गए।
जज याशिका ने अपने फैसले में कहा कि न्यायालय केवल आरोपों के आधार पर किसी आदमी को दोषी नहीं ठहरा सकता, विशेषकर तब जब उसके खिलाफ प्रस्तुत सबूत इतने कमजोर हों कि वे खुद ही कहानी को संदेह के घेरे में ले आएँ। अदालत ने कहा कि कानून सबूतों पर चलता है, भावनाओं पर नहीं। इस केस में आरोपी के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष, ठोस या विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिला। पीड़िता के बयान और उसके वास्तविक व्यवहार के बीच भारी अंतर अदालत के लिए बेहद महत्वपूर्ण कारक साबित हुआ।
आरोपी को बरी करते हुए अदालत ने पुलिस की जांच पर भी सवाल उठाए, यह कहते हुए कि प्रारंभिक जांच में तथ्यों को सही तरीके से परखा नहीं गया और जो दस्तावेज़ तथा फ़ोटोग्राफ़ जांच के दौरान सामने आए उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में बिना पर्याप्त पड़ताल किए किसी भी आदमी की जीवन-प्रतिष्ठा को दांव पर लगाना न्याय और कानून दोनों के साथ अन्याय है।
यह फैसला एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है—कि अदालतें केवल आरोपों पर नहीं, बल्कि ठोस और तार्किक सबूतों पर फैसला सुनाती हैं। यह मामला दिखाता है कि सोशल-नैरेटिव या भावनात्मक आरोपों से परे जाकर, अदालतें वास्तविक तथ्यों और परिस्थितियों को सबसे बड़ी कसौटी मानती हैं।




