आलोक कुमार । नई दिल्ली 9 दिसंबर 2025
राज्यसभा के शीतकालीन सत्र के छठे दिन, 8 दिसंबर 2025 को सदन में एक ऐसी बहस देखने को मिली जिसने न सिर्फ़ सरकार की नीति दृष्टि पर सवाल उठाए, बल्कि भारत के संवैधानिक ढांचे से लेकर जन-स्वास्थ्य तक के विषयों पर गहरी चर्चा छेड़ दी। कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद और गुजरात से राज्यसभा सदस्य शक्तिसिंह गोहिल ने ‘द हेल्थ सिक्योरिटी एंड नेशनल सिक्योरिटी सेंस बिल, 2025’ पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए सरकार पर कई मोर्चों से सवाल उठाए। यह बिल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पेश किया था, जिसमें पान मसाला जैसे स्वास्थ्य-हानिकारक उत्पादों पर विशेष ‘सेंस’ लगाने का प्रस्ताव है। बिल पहले ही लोकसभा में पारित हो चुका था और राज्यसभा में चर्चा के बाद इसे पुनः लोकसभा को भेज दिया गया।
गोहिल ने अपने संबोधन की शुरुआत ही केंद्र सरकार की मंशा पर गंभीर प्रश्न उठाकर की। उनका कहना था कि यह बिल भारत के संघीय ढांचे की बुनियाद को कमजोर करता है, क्योंकि प्रस्तावित ‘सेंस’ पूरी तरह केंद्र सरकार के पास रहेगा, जबकि राज्यों को इससे कोई हिस्सा नहीं मिलेगा। उन्होंने इसे उन संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ बताया जिन पर भारतीय संघ खड़ा है। गोहिल का तर्क था कि राज्यों को वित्तीय अधिकारों से वंचित कर केंद्रीयकरण बढ़ाया जा रहा है, जिससे नीति निर्माण में असंतुलन पैदा होगा और राज्य सरकारों की स्वायत्तता प्रभावित होगी।
उन्होंने बिल के मूल उद्देश्य पर भी सवाल उठाया। गोहिल ने तर्क दिया कि पान मसाला जैसे उत्पाद, जो कैंसर और गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं, उन पर टैक्स लगाकर राजस्व कमाना कोई समाधान नहीं है। यदि केंद्र सरकार वास्तव में जन-स्वास्थ्य को लेकर संवेदनशील है, तो उसे इन उत्पादों को टैक्स योग्य बनाने के बजाय पूर्ण प्रतिबंध लगाने पर विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि “जब सरकार खुद मानती है कि ये चीजें समाज के लिए हानिकारक हैं, तो फिर इन्हें बाज़ार में क्यों रहने दिया जा रहा है? इनके व्यापार से राजस्व कमाना किस नैतिकता के अंतर्गत आता है?” उन्होंने यह भी जोड़ा कि केंद्र का यह कदम “राजस्व कमाने की कोशिश अधिक लगता है, जन-स्वास्थ्य सुधारने का प्रयास कम।”
गोहिल ने बिल के नाम को लेकर भी व्यंग्यात्मक टिप्पणी की। उन्होंने पूछा कि आखिर बिल को अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों भाषाओं में इतना लंबा और उलझा हुआ नाम देने की क्या आवश्यकता थी? क्या सरकार इससे कोई बड़ा संदेश देना चाहती है या क्या यह सिर्फ़ एक भाषाई दिखावा है? उन्होंने कहा कि बिल के शीर्षक में जितनी जटिलता है, उतनी ही अस्पष्टता उसके प्रावधानों में भी दिखाई देती है। गोहिल ने यह टिप्पणी करते हुए सदन का ध्यान खींचा कि सरकार महत्वपूर्ण बिलों में स्पष्टता के बजाय भाषा और प्रस्तुति के माध्यम से भ्रम पैदा कर रही है।
अपने भाषण में उन्होंने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को व्यक्तिगत सम्मान भी दिया। उन्होंने कहा, “मैं आपका सम्मान करता हूं, आपने JNU से पढ़ाई की है।” यह वाक्य जहां वित्त मंत्री के प्रति सम्मान का भाव था, वहीं सदन में कई सदस्यों के लिए यह एक सूक्ष्म राजनीतिक संदेश भी था, क्योंकि JNU को लेकर पिछले एक दशक में कई विवाद और बहसें रही हैं। गोहिल का यह कथन राजनीतिक संवाद में सभ्यता और गरिमा बनाए रखने का संकेत भी देता दिखाई दिया।
सदन की अध्यक्षता उस समय डिप्टी चेयरमैन हरिवंश कर रहे थे। पूरे भाषण के दौरान सदन में कई बार हंसी, व्यंग्य और आपत्ति की आवाज़ें उठीं, लेकिन गोहिल ने अपने तर्कों को मजबूती से रखा और सरकार को कटघरे में खड़ा किया। उनका भाषण सरकार की आलोचना से आगे बढ़कर उस व्यापक प्रश्न को सामने लाता है—क्या जन-स्वास्थ्य वास्तव में सरकार की प्राथमिकता है, या हानिकारक उत्पादों पर टैक्स लगाकर राजस्व बटोरना ही उसका वास्तविक उद्देश्य है?
बहस के अंत में बिल को आगे की प्रक्रिया के लिए लोकसभा को वापस भेज दिया गया। लेकिन गोहिल का यह संबोधन न सिर्फ़ सदन में, बल्कि राजनीतिक और नीति-विशेषज्ञों के बीच भी चर्चा का विषय बना हुआ है। यह बहस एक बार फिर याद दिलाती है कि भारत की संसद में स्वास्थ्य, संघीय ढांचा और वित्तीय अधिकार जैसे मुद्दे सिर्फ़ तकनीकी विषय नहीं हैं—ये लोकतंत्र की रीढ़ हैं, और इन्हें लेकर गंभीर बहसें जरूरी हैं।




