लेखक : निमिषा जायसवाल और डॉ निपुणिका शाहिद, मीडिया स्ट्डीज, स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज, क्राइस्ट यूनिवर्सिटी दिल्ली NCR
नई दिल्ली 8 दिसंबर 2025
अमेरिका समर्थित युद्ध-विराम को दो महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन गाज़ा की धरती पर शांति की कोई वास्तविक तस्वीर नहीं उभरी। इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का यह बयान—“जंग अभी खत्म नहीं हुई है”—पूरे क्षेत्र के माहौल को वैसे ही दहशत में धकेल देता है जैसे युद्ध के शुरुआती दिनों में था। आँकड़े बताते हैं कि 70,000 से अधिक फ़िलिस्तीनी मौत के घाट उतार दिए गए हैं, और 10,800 से अधिक नागरिक, जिनमें बच्चे, बुज़ुर्ग और महिलाएँ शामिल हैं, बिना किसी मुकदमे या न्यायिक प्रक्रिया के इज़राइली जेलों में बंद हैं। यह केवल एक संघर्ष नहीं बल्कि 2 वर्ष से जारी ऐसा सामूहिक नरसंहार है जिसे दुनिया ने आधुनिक समय में शायद पहली बार इतनी नज़दीक से देखा है—और फिर भी रोका नहीं जा सका। हर बीतते दिन के साथ यह साफ़ होता जा रहा है कि यह ceasefire वास्तव में केवल नाम भर का समझौता था, ज़मीन पर इसकी आत्मा को इज़राइली सैन्य कार्रवाइयों ने शुरू से ही कुचल दिया।
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ), संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और वैश्विक मानवाधिकार संगठनों ने इस संघर्ष में इज़राइल से संयम बरतने और युद्ध-विराम का सम्मान करने की अनेक अपीलें कीं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई इसके ठीक उलट रही। अल जज़ीरा सहित कई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में यह दर्ज है कि इज़राइल ने युद्ध-विराम लागू होने के बाद भी 500 से अधिक बार हमला किया—जिससे 340 से अधिक फ़िलिस्तीनी केवल ceasefire अवधि में ही मारे गए। यह उल्लंघन केवल गोलीबारी तक सीमित नहीं थे; इनमें लक्षित हत्याएँ, हवाई हमले, घरों को ज़मींदोज़ करना और राहत भेजने वाली संस्थाओं को रोकना शामिल रहा। अंतरराष्ट्रीय आदेशों की इस खुली अवहेलना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की ताकत आखिर कितनी प्रभावी रह गई है, जब कोई सदस्य देश उनके आदेशों को बार-बार तोड़कर भी वैश्विक मंच पर दण्डमुक्त घूमता रहता है।
युद्ध-विराम के दूसरे चरण के तहत स्पष्ट शर्तें रखी गई थीं—हमास को जीवित बंधकों और दो शवों को लौटाना था, जबकि इज़राइल को राहत सामग्री, ईंधन, दवाइयों और भोजन को गाज़ा में बिना रोकटोक प्रवेश देना था। लेकिन संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय NGO की रिपोर्टें बताती हैं कि गाज़ा में पहुँचने वाली सहायता बहुत सीमित रही। इज़राइल की जांच चौकियों पर सहायता ट्रकों को अक्सर कई दिन रोका गया, कई ट्रकों को वापस भेज दिया गया, और जो थोड़ी मात्रा पहुँची, वह भी ज़रूरतों के सामने नगण्य थी। इस बीच हमास ने कई बार कहा कि वह युद्ध-विराम की शर्तों का पालन कर रहा है, लेकिन इज़राइल ने हर बार हमास पर उल्लंघन का आरोप लगाकर हमलों को जारी रखा। अमेरिका और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मध्यस्थता के बावजूद, स्पष्ट होता है कि अमेरिका ने ज़मीनी स्तर पर स्थिति सुधारने की ठोस कोशिश नहीं की—बल्कि कई विश्लेषक यह मानते हैं कि ट्रंप की ‘नोबेल प्राइज़ राजनीति’ ने इस प्रक्रिया को अधिक प्रतीकात्मक बनाकर रख दिया।
तभी दुनिया भर में इस संघर्ष के खिलाफ करोड़ों लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किए—लंदन, पेरिस, न्यूयॉर्क, दिल्ली, जोहान्सबर्ग, टोरंटो, जकार्ता और इस्तांबुल जैसे शहरों में मानव श्रृंखलाएँ और शांतिपूर्ण मार्च आयोजित किए गए। डिजिटल दुनिया में भी ‘Ceasefire Now’, ‘FreePalestine’ और ‘Stop Genocide in Gaza’ जैसे अभियान इतिहास के सबसे बड़े ऑनलाइन आंदोलनों में शामिल हो गए। लेकिन इस वैश्विक आक्रोश ने गाज़ा में चल रहे खूनी खेल को किसी भी रूप में रोकने में सफलता नहीं पाई। दुनिया का यह असहायपन न केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति की विफलता को उजागर करता है, बल्कि यह भी बताता है कि आधुनिक सभ्यता किस हद तक चुपचाप एक नरसंहार को होते देख सकती है। आम लोग पूछने लगे हैं—“इतनी मौतों के बाद भी अगर युद्ध नहीं रुका, तो आखिर कब रुकेगा?”
जब इस संघर्ष के मूल कारणों और संभावित भविष्य पर क्राइस्ट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉ. ज्यूडिथ ऐन लाल से बात की गई, तो उन्होंने इसे केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं बल्कि एक गहरी ऐतिहासिक और राजनीतिक प्रक्रिया बताया। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष औपनिवेशिक मानसिकता, साम्राज्यवादी रणनीतियों और धार्मिक भू-राजनीति का सम्मिलित परिणाम है। वेस्ट बैंक में लगातार बस्तियों का विस्तार, फ़िलिस्तीनी सत्ता संरचनाओं का कमजोर होना, समाज का विखंडन और इज़राइली कब्ज़े को वैश्विक शक्तियों द्वारा मिलने वाला समर्थन—ये सभी कारक मिलकर एक स्थायी असमानता और दमन की संरचना तैयार करते हैं। डॉ. ज्यूडिथ मानती हैं कि इस परिस्थिति में अमेरिकी मध्यस्थता कागज़ी है—अमेरिका न संघर्ष रोकने में सक्षम है और न वास्तव में इच्छुक। इसीलिए वे यह भी कहती हैं कि इस युद्ध का भविष्य फिलहाल धुंधला है; जब तक शक्ति-संतुलन नहीं बदलता, तब तक संघर्ष का अंत मुश्किल है।
इस बीच गाज़ा की धरती पर मानवीय संकट लगातार गहराता जा रहा है। इज़राइल द्वारा छोड़े गए 2000 से अधिक शवों पर यातना, गोलीबारी और दुर्व्यवहार के स्पष्ट निशान मिले। कई जगहों पर सामूहिक कब्रों में बिना पहचान के दफनाए गए शव मिले, जो आधुनिक समय में युद्ध अपराधों का सबसे काला उदाहरण बन चुके हैं। घर, स्कूल, अस्पताल, विश्वविद्यालय—सब कुछ ढह चुका है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट कहती है कि गाज़ा का बुनियादी ढांचा लगभग 20 साल पीछे चला गया है। विश्वविद्यालयों के पुनः शुरू होने में भी भारी मुश्किलें आ रही हैं; कई शिक्षण संस्थान खंडहरों में बदल गए। ज़ैतून के खेत, जो फ़िलिस्तीन की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान का प्रतीक थे, तबाही का शिकार हो चुके हैं। लाखों लोग अपने ही वतन में बेघर हो गए, और बच्चे—जिन्हें किताबों के साथ भविष्य की ओर बढ़ना चाहिए था—अब परिवार का पेट भरने के लिए काम करने पर मजबूर हैं।
इस सब के बीच सबसे भयावह तस्वीर वह है जिसमें गाज़ा के लोग अपने प्रियजनों के शवों को मलबे में खोजते दिखते हैं। कई इलाक़ों में मृतकों को उथली, अनचिह्नित कब्रों में दफ़नाना पड़ा, क्योंकि न तो अस्पताल बचे हैं, न कब्रिस्तान। यह दृश्य केवल युद्ध की त्रासदी नहीं बल्कि मानवता के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न है—हम 21वीं सदी में होते हुए भी ऐसी बर्बरता के खिलाफ कितने कमजोर साबित हुए हैं?
इन सभी तथ्यों के बीच यह सवाल अब भी हवा में तैर रहा है—क्या यह युद्ध कभी रुकेगा? क्या गाज़ा का कोई बच्चा बिना डर के सो पाएगा? क्या कोई माँ यह भरोसा कर पाएगी कि अगली सुबह उसका घर सलामत रहेगा? डॉ. ज्यूडिथ का मत है कि यह संघर्ष अभी लंबा चलेगा, लेकिन इतिहास ने हमेशा दिखाया है कि सबसे अंधेरी रात के बाद ही सुबह आती है। शायद किसी दिन वैश्विक राजनीति अपनी ज़िम्मेदारी संभाले, शायद कोई कूटनीतिक चमत्कार हो, शायद जनता की आवाज़ निर्णायक साबित हो। फिलहाल, गाज़ा के लोगों के लिए वह सुबह अभी दूर दिखाई देती है—लेकिन उनकी लड़ाई, उनका धैर्य और उनका अस्तित्व दुनिया को लगातार यह याद दिला रहा है कि मानवता की अंतिम जीत हमेशा उसी की होती है जो अन्याय के सामने खड़ा रहता है।




