एबीसी डेस्क 7 दिसंबर 2025
देश की हालत उस दिन किसी विकसित लोकतंत्र की नहीं, बल्कि ऐसे असहाय राष्ट्र की लग रही थी जहाँ जनता की तकलीफें असली खबर नहीं, बल्कि फुटनोट बन जाती हैं। एयरपोर्टों पर लोग फर्श पर सो रहे थे, ठंड से कांप रहे थे, पानी की बोतलें गायब थीं, बच्चों का दूध उपलब्ध नहीं था, और बुजुर्ग दवाई के इंतज़ार में रो रहे थे। हर मिनट दर्जनों फ्लाइटें रद्द हो रही थीं, टिकटें बेकार हो चुकी थीं, डिजिटल बोर्ड पर “Cancelled, Cancelled, Cancelled” की लाइनें किसी राष्ट्रीय आपदा से कम नहीं लग रही थीं। लेकिन इस विनाशकारी दृश्य के ठीक समानांतर, देश का प्रधानमंत्री सुरक्षित मंच पर विदेशी मेहमानों के बीच बैठकर हँसी-मज़ाक करते हुए, वैश्विक नेतृत्व, हिंदू ग्रोथ रेट, उपनिवेशवाद, सेमीकंडक्टर और महिलाओं के सशक्तिकरण पर “ज्ञान का अमृत” उंडेल रहा था। प्रधानमंत्री के चेहरे पर न कोई चिंता दिखती थी, न कोई तनाव, न कोई क्षोभ—जैसे देश में कोई संकट हुआ ही न हो। यह दृश्य भारत के लोकतांत्रिक चरित्र की सबसे बड़ी विडंबना था—देश पस्त, और प्रधानमंत्री मस्त।
तीन लंबे दिनों तक जनता ने जो झेला, उसे सरकार ने किसी घटना या “ऑपरेशनल इश्यू” जैसी भाषा में ढकने की कोशिश की, लेकिन वास्तविकता यह थी कि लोगों ने एक असफल और संवेदनहीन शासन का चेहरा सामने से देखा। एयरपोर्टों पर माएँ बच्चों के साथ एटीएम लाइनों की तरह घुमड़ रही थीं, महिलाओं के पास शौचालय तक की सुविधा नहीं थी, और हज़ारों लोग बिना कंबल के ठंड में रातें गुज़ारने पर मजबूर हो गए। जिस भारत को हम डिजिटल इंडिया कहते हैं, वहाँ लाखों लोगों तक फ्लाइट कैंसलेशन की सूचना भी समय पर नहीं पहुँची। जो देश चंद्रयान भेजकर गर्व करता है, वही देश तीन दिन तक ट्रॉली बैग पकड़े खड़े हुए नागरिकों की बेबसी को हल करने में विफल रहा। और इस स्थिति में जब प्रोटोकॉल तोड़ने का हुनर अक्सर दिखाने वाले प्रधानमंत्री एक शब्द भी नहीं बोलते, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या वे वास्तव में जनता के नेता हैं या सिर्फ़ मंच के महारथी?
मोदी जी की प्रधानमंत्री छवि का बड़ा हिस्सा “प्रोटोकॉल तोड़ने” और “अचानक बीच में पहुंच जाने” की मार्केटिंग से बना है। कभी वे विमान से उतरकर किसी बच्चे को उठा लेते हैं, कभी किसी के घर में चाय पीने चले जाते हैं, कभी किसी सैनिक की पीठ थपथपा देते हैं। यह सब उन्हें “जनप्रिय नेता” बनाने की रणनीति का हिस्सा है। लेकिन जब असल संकट आया—जब जनता को सचमुच अपने नेता की जरूरत थी—वह व्यक्ति, जो हर प्रोटोकॉल तोड़ सकता था, मौन साधकर बैठ गया। न प्रेस कॉन्फ्रेंस, न संदेश, न माफी का एक वाक्य। यह चुप्पी किसी संयोग का परिणाम नहीं थी, यह सत्ता की मानसिकता का आइना थी—“जनता की तकलीफ़ से छवि को नुकसान होता है, इसलिए उस पर कम बोलो।”
और इस चुप्पी के पीछे एक और बड़ा डर छिपा था—अगर प्रधानमंत्री बोलते, तो उन्हें यह स्वीकारना पड़ता कि देश की सबसे बड़ी एयरलाइन ने सरकार को खुली चुनौती दी है, कि एविएशन सेक्टर एक अराजकता में तब्दील हो गया है, कि पायलटों और क्रू की कार्य-शर्तें दशकों पुरानी दमनकारी व्यवस्था पर चल रही हैं, कि DGCA एक निष्क्रिय संस्था बन चुकी है, और संघीय जिम्मेदारी पूरी तरह विफल हो चुकी है। यदि मोदी जी इस पर बोलते, तो उनकी प्रचारित “मजबूत सरकार” की परछाई में बड़ी दरारें दिखाई देतीं। इसलिए बोलना ही नहीं था। राष्ट्रहित भाड़ में जाए, पहले “इमेज हित” सुरक्षित रखो।
इंडिगो संकट पर अधिकांश मीडिया का व्यवहार भी इस सरकार की अघोषित तानाशाही की गवाही देता है। जहां लोकतांत्रिक देशों में मीडिया सरकार को कठघरे में खड़ा करता है, वहीं यहाँ मीडिया ने जनता की पीड़ा को पीछे ढकेलकर यह पूछना शुरू किया कि—नेहरू का खतना हुआ था या नहीं? क्या नेहरू मुसलमान थे? क्या मुगल काल में फलाँ हुआ या नहीं? टीवी स्टूडियो ऐसे विचित्र, बेहूदे और भटकाने वाले सवालों से भरे थे कि लगता था देश की सामूहिक बुद्धि का अपमान किया जा रहा है। एयरपोर्ट पर फंसी हुई जनता की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल थीं, लेकिन टीवी चैनलों पर “थोड़ी देर में सदी की सबसे बड़ी बहस: नेहरू मुसलमान थे या हिंदू?” जैसे कार्यक्रम चलते रहे। यही वह मीडिया है जिसे सरकार ने slowly, steadily और systematically अपनी जेब में डाल लिया है।
इस बीच एक हास्यास्पद घोषणा आई—“प्रधानमंत्री को इंडिगो संकट पर ब्रीफिंग दी गई है।” जैसे देश को गुरु-वरिष्ठ की प्रशंसा करनी चाहिए कि वाह! तीन दिन बाद आखिर प्रधानमंत्री को दया आई और उन्होंने जानकारी ली! पीएमओ ने एयरलाइन मैनेजमेंट से बातचीत की और कहा कि पेनाल्टी लगेगी। यह बयान ऐसा लगा जैसे असल सत्ता एयरलाइन के पास है और प्रधानमंत्री विनम्र अनुरोध कर रहे हों। लोग पूछने लगे—क्या भारत में उड्डयन मंत्री का कोई अस्तित्व है? क्या DGCA सिर्फ़ कागज़ी बाघ है? क्या नागरिक उड्डयन मंत्रालय इंडिगो के नीचे दबा हुआ है?
एक विकसित देश में, एक समझदार लोकतंत्र में, यदि ऐसी विपत्ति घटती, तो तत्काल उड्डयन मंत्री का इस्तीफा लिया जाता। एक हाई-लेवल जांच कमेटी बनती। एयरलाइन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होती। संसद में आपातकालीन चर्चा होती। लेकिन यहाँ? यहाँ सरकार की प्राथमिकता कहीं और थी। सत्ता के गलियारे में इंडिगो संकट सिर्फ़ एक “मैनेजमेंट इश्यू” था, जो जनता की कीमत पर निपटा लिया जाएगा—और जनता? जनता की भूमिका सिर्फ़ भूल जाना है।
मोदी सरकार का यह व्यवहार बताता है कि “नया भारत” एक ऐसी राजनीतिक मशीनरी बन चुका है जहाँ संकट पर सरकार का पहला काम है—बोलना नहीं; दूसरा काम है—दोष किसी और पर डालना; और तीसरा काम है—मुद्दे से जनता का ध्यान हटाकर उसे नेहरू, इतिहास, धर्म, मंदिर–मस्जिद और काल्पनिक राष्ट्रवाद में उलझा देना। यही कारण है कि यह सरकार अपने सबसे बड़े हथियार—“नैरेटिव”—के सहारे शासन करती है, और जब नैरेटिव टूटता है, तो चुप्पी थोप दी जाती है।
इस पूरे संकट ने एक बहुत बड़ी सच्चाई उजागर की है—भारत में नागरिक की हैसियत कितनी गिर चुकी है। “नया भारत” नागरिक को सिर्फ़ तीन भूमिकाएँ देता है—
1. एक उपभोक्ता, जिसे कंपनियों की मनमानी सहनी है,
2. एक यात्री, जिसे एयरलाइनों की दया पर चलना है,
3. एक वोट, जिसे पाँच साल में एक दिन इस्तेमाल किया जाता है।
4. बाकी अधिकार? बाकी सुरक्षा? बाकी सम्मान? सरकार की प्राथमिकताओं में कहीं मौजूद ही नहीं।
मोदी जी की इस गहरी चुप्पी ने जनता को यह संदेश दे दिया है— संकट तुम्हारा है। सत्ता हमारी है। और यही नए भारत का सबसे भयावह सच है।




