आलोक कुमार। नई दिल्ली 5 दिसंबर 2025
दुनिया भर में जन्मदर लगातार गिर रही है और माता-पिता के बीच ‘One-Child Family’ का चलन तेजी से बढ़ रहा है। यह सिर्फ एक सामाजिक ट्रेंड नहीं, बल्कि आर्थिक दबाव, समय की कमी, childcare की चुनौती, करियर की मजबूरियाँ और भविष्य के प्रति गहरी अनिश्चितता का मिला-जुला असर है। ब्रिटेन की नताली जॉनस्टन जैसी लाखों महिलाएँ दुनिया के अलग-अलग देशों में एक ही सवाल से जूझ रही हैं—“क्या दूसरे बच्चे का खर्च, समय और जिम्मेदारी उठाना संभव है?” और यह सवाल अब भारत में भी उतनी ही तीव्रता से उठ रहा है। नताली जैसे माता-पिता बताते हैं कि आधुनिक दुनिया में दो बच्चों की परवरिश सिर्फ भावनाओं का विषय नहीं रह गई—यह एक बहुत बड़ा आर्थिक और मानसिक निर्णय है। यह स्थिति केवल पश्चिम तक सीमित नहीं, बल्कि भारत में भी हर मिडिल-क्लास और अर्बन परिवार की वास्तविकता बन चुकी है।
भारत में जन्मदर का गिरना अब शोध का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक वास्तविकता बन गया है। NFHS–5 के ताज़ा आँकड़े बताते हैं कि भारत की कुल प्रजनन दर 2.0 तक आ चुकी है—जो पहली बार replacement level (2.1) से नीचे है। दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल जैसे विकसित राज्यों में यह दर 1.4–1.6 है, जो यूरोप और जापान जैसे विकसित देशों के बराबर है। यह संकेत है कि भारत की शहरी आबादी अब बड़े परिवार की कल्पना त्याग रही है और ‘एक ही बच्चा काफी है’ का विचार तेजी से मजबूत हो रहा है। इसका कारण महँगी शिक्षा, नौकरी का तनाव, कामकाजी माता-पिता का बदलता जीवन, संयुक्त परिवारों का टूटना और भविष्य की अनिश्चितता है। अधिकतर युवा दंपति मानते हैं कि एक बच्चे को अच्छी शिक्षा, अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी गुणवत्ता वाला जीवन देना ही अपने आप में एक बड़ी जिम्मेदारी है—और दो बच्चों पर यह बोझ दुगना नहीं, तीन गुना हो जाता है।
शोध यह भी पुष्टि कर रहा है कि भारत में Only Children यानी एकल संतान वाले बच्चों का शैक्षणिक और भावनात्मक प्रदर्शन अक्सर बेहतर होता है। बेंगलुरु, दिल्ली और मुंबई में किए गए हालिया अध्ययनों से पता चला कि एकल संतान वाले बच्चों को माता-पिता की अधिक सहभागिता, अधिक ध्यान, बेहतर आर्थिक संसाधन और भावनात्मक समर्थन मिलता है, जिसकी वजह से उनका आत्मविश्वास, अंक, नेतृत्व क्षमता और सीखने की क्षमता अधिक होती है। यह निष्कर्ष वही है जिसे अंतरराष्ट्रीय अध्ययन Resource Dilution Theory और Confluence Theory द्वारा सिद्ध करते हैं—अधिक संख्या में बच्चे होने पर माता-पिता के संसाधन विभाजित हो जाते हैं, जबकि एक बच्चे के साथ ऐसा नहीं होता।
लेकिन इस फर्टिलिटी स्लंप का असर अब स्कूलों और शिक्षा प्रणाली पर भी भारी पड़ रहा है। ब्रिटेन की तरह भारत में भी कक्षा 1 से 5 तक के छात्रों की संख्या में गिरावट ने स्कूलों की फंडिंग, शिक्षक नियुक्ति और संसाधन प्रबंधन को कठिन बना दिया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले पाँच वर्षों में देशभर में 17 लाख से अधिक सरकारी स्कूल कम छात्र संख्या के कारण बंद या विलय हो चुके हैं। शहरी निजी स्कूलों में भी प्रवेश कम हो रहे हैं, सीटें खाली रह रही हैं, और कई स्कूल बढ़ते खर्च और घटती आय के कारण आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यह रुझान जारी रहा, तो भारत एक दशक बाद पश्चिम की तरह ‘empty classroom crisis’ का सामना करेगा।
यह गिरती जन्मदर केवल शिक्षा तक सीमित समस्या नहीं है—यह भविष्य की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रहार है। भारत में 2036 तक बुजुर्ग आबादी दोगुनी हो जाएगी, लेकिन कार्यशील युवा जनसंख्या उसी अनुपात में नहीं बढ़ेगी। इसका मतलब है कि आने वाले दशकों में सरकार पर पेंशन, स्वास्थ्य देखभाल, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक उत्पादकता बनाए रखने का दबाव कई गुना बढ़ जाएगा। श्रम मंत्रालय के अनुसार भारत में श्रम शक्ति का गिरता अनुपात देश की विकास गति को चुनौती देगा, और यह स्थिति जापान व यूरोप की मौजूदा आर्थिक समस्याओं जैसी हो सकती है।
दुनिया के कई देशों में सरकारें जन्मदर बढ़ाने के लिए बड़े प्रोत्साहन दे रही हैं—अमेरिका में ट्रंप ने $5,000 “Baby Bonus” का सुझाव दिया, पोलैंड ने दो बच्चों वाले परिवारों के लिए Zero Income Tax लागू किया, हंगरी ने माताओं को बड़े टैक्स छूट दिए। भारत में भी राज्यों द्वारा समय-समय पर maternity benefits और childcare incentives दिए जा रहे हैं, लेकिन दीर्घकालिक समाधान अभी भी अनिश्चित है।
इन सबके बीच, असली कहानी उन लाखों माता-पिता की है जो अपने बच्चों के भविष्य और अपनी आर्थिक क्षमता के बीच फँसे हुए हैं। जैसे नताली अपनी बेटी के साथ खुश हैं और मानती हैं कि बच्चे की परवरिश किसी और के लिए नहीं, बल्कि अपने लिए होनी चाहिए—वैसे ही भारत के लाखों युवा दंपति इस सवाल पर रोज़ निर्णय ले रहे हैं कि—क्या एक बच्चा ही पर्याप्त है?
दुनिया का बदलता जनसांख्यिकीय नक्शा बता रहा है कि One-Child Family अब अपवाद नहीं, आधुनिक समय की नई हकीकत है—और भारत भी इसी दिशा में पूरे वेग से बढ़ रहा है।




