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वक्फ़ पर SC का स्पष्ट आदेश: डेडलाइन वही—राहत सिर्फ़ ट्रिब्यूनल, अदालत बोली–कानून नहीं बदल सकते”

आलोक कुमार । नई दिल्ली 1 दिसंबर 2025

वक्फ़ संपत्तियों के डिजिटाइज़ेशन और रजिस्ट्रेशन को लेकर देशभर के वक्फ़ बोर्डों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वक्फ़ संशोधन अधिनियम के तहत तय की गई छह महीने की समय-सीमा को वह बढ़ा नहीं सकता, क्योंकि अदालत का काम कानून बनाना या उसे बदलना नहीं है। कोर्ट ने कहा कि संसद ने जो वैधानिक ढांचा स्थापित किया है, उसे न्यायपालिका पुनः नहीं लिख सकती—और समय-सीमा में किसी भी प्रकार का सामान्य विस्तार संसद की मंशा के खिलाफ होगा।

मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने कहा कि हालांकि याचिकाकर्ताओं की कठिनाइयाँ वास्तविक हो सकती हैं—जैसे पोर्टल में तकनीकी गड़बड़ी, सौ–डेढ़ सौ साल पुराने दस्तावेज़ ढूंढने में कठिनाई, और देशभर में लाखों वक्फ़ संपत्तियों का जटिल रिकॉर्ड—लेकिन इन कठिनाइयों का समाधान किसी सामूहिक आदेश से नहीं किया जा सकता। इसके लिए कानून ने पहले से एक स्पष्ट प्रणाली बनाई है—वक्फ़ ट्रिब्यूनल।

याचिकाकर्ताओं में AIMPLB और सांसद असदुद्दीन ओवैसी भी शामिल थे। उनका कहना था कि छह महीने की अवधि व्यावहारिक नहीं है और पोर्टल की खामियों के कारण लाखों संपत्तियों का समय पर पंजीकरण असंभव है। उन्होंने कहा कि कुछ संपत्तियाँ सौ साल से भी ज्यादा पुरानी हैं और उनके दस्तावेज़ विभिन्न जिलों में बिखरे हुए हैं, जिन्हें इकट्ठा करना समयसाध्य है।

इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि वक्फ़ अधिनियम की धारा 3B के प्रावधान के अनुसार—ट्रिब्यूनल को समय-सीमा बढ़ाने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि वक्फ़ संस्थाएँ केस-टू-केस आधार पर ट्रिब्यूनलों में आवेदन दें और अपनी परिस्थितियों के हिसाब से राहत मांगें। SG ने यह भी तर्क दिया कि इससे एक संतुलित व्यवस्था बनी रहेगी—जहां असली दिक्कतों वाले मामलों को राहत मिलेगी और डिजिटाइज़ेशन प्रक्रिया भी बाधित नहीं होगी।

कोर्ट ने SG की इस व्याख्या को स्वीकार करते हुए कहा कि यदि वक्फ़ बोर्डों और संपत्ति प्रबंधकों को वास्तविक कठिनाई है, तो उन्हें समय-सीमा समाप्त होने से पहले संबंधित वक्फ़ ट्रिब्यूनल में आवेदन करना चाहिए। ट्रिब्यूनल हर मामले को तथ्यों के आधार पर देखेगा और आवश्यकता के अनुसार एक्सटेंशन दे सकेगा।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने तीन बातें साफ कर दी हैं—

1. छह महीने की समय-सीमा जस की तस रहेगी।
2. कोई सामूहिक एक्सटेंशन नहीं मिलेगा।
3. राहत सिर्फ वक्फ़ ट्रिब्यूनल देगा—वह भी हर केस के आधार पर।

यह फैसला एक ओर जहां केंद्र सरकार के UMEED पोर्टल के डिजिटाइज़ेशन अभियान को वैधानिक समर्थन देता है, वहीं दूसरी ओर वक्फ़ बोर्डों को यह रास्ता भी दिखाता है कि वे वास्तविक कठिनाइयों के साथ ट्रिब्यूनल का दरवाज़ा खटखटा कर समय-सीमा बढ़वा सकते हैं।

इस आदेश का सीधा प्रभाव देशभर की वक्फ़ संपत्तियों के पंजीकरण, पारदर्शिता और प्रशासनिक सुधारों पर पड़ेगा और आने वाले महीनों में इस प्रक्रिया की गति और रणनीति दोनों बदलने वाली हैं।

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