अनुराग । नई दिल्ली 1 दिसंबर 2025
मध्य प्रदेश के धार ज़िले में आज किसानों का धैर्य आखिरकार जवाब दे गया। हज़ारों की संख्या में अन्नदाता सड़क पर उतर आए और खुले शब्दों में कहा कि अब वक़्त आ गया है कि सरकार उनके हक़ को सिर्फ़ चुनावी वादों में नहीं, बल्कि ज़मीन पर लागू नीतियों में दिखाए। किसानों का कहना है कि खेती हर बीतते साल के साथ घाटे का सौदा बनती जा रही है, और केंद्र सरकार की नीतियों ने उनकी परेशानियों को कम करने के बजाय और बढ़ा दिया है। धरना स्थल पर किसानों की सबसे प्रमुख मांग है कि MSP की कानूनी गारंटी दी जाए ताकि अनिश्चित बाज़ार के हाथों उनकी फसलें औने-पौने दामों पर न बिकें। साथ ही वे वर्षों से बढ़ते कर्ज़ के बोझ से मुक्ति की मांग कर रहे हैं—कहते हुए कि यह करोड़ों किसानों की नहीं, बल्कि उनके परिवार और भविष्य की लड़ाई है।
किसानों ने बताया कि फसल बीमा योजनाओं में पारदर्शिता नाम की कोई चीज़ नहीं है। बीमा कंपनियाँ और सरकारी तंत्र आपदा के बाद भी क्षति का सही आकलन नहीं करते, जिससे किसान को बीमा मिलने के बजाय सिर्फ़ आश्वासनों की पर्चियाँ थमा दी जाती हैं। खेती से जुड़ी हर छोटी-बड़ी दिक्कत—बिजली का संकट, सिंचाई का अभाव, बीज और खाद की कालाबाज़ारी—इन सबके बीच किसान आज भी अकेला खड़ा है जबकि सरकार ने बार-बार वादा किया था कि वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूत करेगी और खेती को लाभकारी बनाएगी। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि किसान अभी भी अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए दफ़्तरों के चक्कर लगाने को मजबूर है।
रैली में किसानों ने यह भी कहा कि आज की सरकार ने किसानों को सिर्फ़ संघर्ष दिया है। MSP गारंटी की मांग से लेकर अब तक जब भी किसानों ने अपनी आवाज बुलंद की, तो उनके सामने बैरिकेड खड़े कर दिए गए। सड़कें बंद कर दी गईं, रास्तों पर कीलें बिछा दी गईं और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले दागे गए। धार के किसान याद दिलाते हैं कि यही सरकार कभी किसानों की आय दोगुनी करने का दावा करती थी, लेकिन वास्तविकता यह है कि आज किसान अपनी फसलों का दाम तय करने में भी असहाय है और कृषि लागत लगातार बढ़ती जा रही है।
किसानों का कहना है कि नरेंद्र मोदी ने जिस “अन्नदाता सम्मान” की बात की थी, वह ज़मीन पर उल्टा साबित हो गया है। किसान आज भी खून के आंसू रो रहा है—न बिजली मिलती है, न पर्याप्त पानी, न खाद समय पर। हालात इतने बदतर हैं कि किसानों को अपने अधिकारों के लिए पुलिस की लाठियां तक सहनी पड़ती हैं। ऐसे में किसान संगठनों का कहना है कि अब देश का अन्नदाता साफ़ बोल रहा है कि वह इस उपेक्षा को माफ़ नहीं करेगा।
धर में किसानों का यह उभार सिर्फ़ एक ज़िले का आंदोलन नहीं, बल्कि पूरे देश में simmer हो रहे असंतोष की झलक है। किसान अब सिर्फ़ वादों पर नहीं, ठोस नीतियों पर जवाब चाहते हैं—और यही आवाज आने वाले दिनों में और बुलंद होगी।




