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काला धन लाने के नाम पर आई सरकार को ये नहीं पता कि 10 साल में कितना काला धन विदेश गया?

सुमन कुमार । नई दिल्ली 1 दिसंबर 2025

काला धन वापस लाने के वादे पर सत्ता में आई सरकार के सामने आज संसद में एक सीधा, कटाक्षभरा और बेहद महत्वपूर्ण सवाल रखा गया—पिछले दस वर्षों में भारत से कितना काला धन विदेश भेजा गया है? विडंबना यह है कि जिस मुद्दे पर “विदेशों से धन लाने” के नारे लगाकर राजनीतिक पूँजी अर्जित की गई, उसी मुद्दे पर सरकार के पास कोई ठोस रिकॉर्ड ही नहीं है कि उसके शासनकाल में कितना पैसा भारत से बाहर गया। विपक्ष ने इसे एक गंभीर विफलता बताते हुए कहा कि “काला धन लाने की बात तो दूर, सरकार को यह भी नहीं पता कि देश से कितना काला धन बाहर चला गया!” यह सवाल अपने आप में उस पूरी राजनीतिक कथा को चुनौती देता है, जिसमें विदेशों से काला धन लाने के वादों ने एक दशक तक चुनावी तराजू का रुख मोड़ने में अहम भूमिका निभाई थी।

संसद में जैसे ही प्रश्न उठा, सरकार का आधिकारिक जवाब आया—“10 साल में कितना काला धन विदेश भेजा गया, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है।” इस एक वाक्य ने सदन में हलचल मचा दी। विपक्षी दलों ने तुरंत सवाल उठाया कि जब आयकर विभाग, ED, CBI, DRI, FIU और अन्य एजेंसियाँ लगातार काले धन, हवाला और वित्तीय अपराधों पर कार्रवाई कर रही हैं, तो फिर पूरे दशक के दौरान भेजे गए अवैध धन का समेकित रिकॉर्ड आखिर क्यों नहीं है? क्या सरकार यह मान रही है कि भारी-भरकम नौकरशाही और तगड़ी जांच एजेंसियों के बावजूद वे आर्थिक अपराधों की असली तस्वीर तैयार ही नहीं कर पाए?

सरकार के इस बयान ने यह भी पुनर्जीवित कर दिया है कि वर्षों से जिस ‘विदेशी खातों की सूची’ और ‘₹15 लाख’ के नारे ने राजनीतिक माहौल को गर्म रखा था, उनकी वास्तविकता अब संसद के रिकॉर्ड पर सवाल बनकर खड़ी है। विपक्ष ने सीधा निशाना साधते हुए कहा कि अगर काला धन लाने के वादे ईमानदार थे, तो देश से बाहर जा रहे धन पर निगरानी क्यों नहीं रखी गई? क्या यह वादों और नीतियों के बीच की दूरी है, या प्रशासनिक विफलता? यह सवाल अब राजनीतिक विमर्श के केंद्र में है।

वित्तीय अपराधों और पारदर्शिता को लेकर चिंतित जनता के बीच भी यह जवाब निराशा और अविश्वास पैदा करने वाला है। जिस समय देश को डिजिटल ट्रैकिंग, GST, आयकर सुधार, और बेनामी संपत्ति कानूनों की मजबूती का दावा सुनाया जा रहा था, उसी दौरान यह सामने आया कि सरकार के पास देश से बाहर गए अवैध धन का कोई आधिकारिक अनुमान तक नहीं है। यह तथ्य वित्तीय शासन, जवाबदेही, डेटा प्रबंधन और नीति-नियमन की पूरी संरचना पर सवाल खड़ा करता है। क्या एजेंसियों की रिपोर्टें अलग-अलग फाइलों में दबी रह जाती हैं? या फिर काले धन के खिलाफ लड़ाई महज कुछ चुनिंदा मामलों की कार्रवाई तक सीमित रही?

एक दशक का शासन और “आधिकारिक आंकड़ा नहीं”—यह स्वीकारोक्ति बताती है कि भारत को अभी भी काले धन की पूरी श्रृंखला समझने और उसे रोकने के लिए एक मजबूत, समन्वित और पारदर्शी तंत्र की जरूरत है। संसद में उठा यह सवाल न केवल वित्तीय अपराधों की गंभीरता को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि काले धन के मुद्दे पर जनता को जो सपने दिखाए गए, वे अभी भी अधूरे और अस्पष्ट हैं। यह बहस आने वाले दिनों में राजनीतिक और नीति दोनों स्तरों पर तीखी होती दिखाई देगी।

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