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देशभक्ति पर आपत्ति, आतंकवाद पर ख़ामोशी ? मुस्लिम नेतृत्व ने मौलाना मदनी की दोहरी राजनीति को बेनक़ाब किया

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नई दिल्ली, 1 दिसंबर 2025

मौलाना महमूद मदनी ने एक बार फिर यह विवाद खड़ा कर दिया कि ‘वंदे मातरम् इस्लाम-विरोधी है’। यह बात सुनते ही पूरे देश में बहस तेज हो गई, लेकिन इस बार सबसे बड़ा जवाब उन्हें बाहर से नहीं, बल्कि अपने ही समुदाय से मिला। देश के नामी मुस्लिम बुद्धिजीवी, सामाजिक संगठन और कई धार्मिक हस्तियाँ एकमत होकर कह रही हैं कि ऐसे बयानों से मुसलमानों का भला नहीं होता— इससे हमारी छवि को नुकसान पहुँचता है और युवा पीढ़ी को गलत दिशा मिलती है। उनका कहना है कि भारत के मुसलमानों को अब डर की राजनीति नहीं चाहिए। उन्हें शिक्षा, रोज़गार, सुरक्षा और समान अवसर चाहिए।

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहिद सईद ने कहा कि मौलाना मदनी का बयान मुसलमानों को मुख्यधारा से दूर ले जाने वाला है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय मुसलमान दुनिया के सबसे सुरक्षित और सम्मानित मुसलमानों में गिने जाते हैं। देश की सेना, नौकरशाही, न्यायपालिका, खेल, विज्ञान और कला—हर जगह मुस्लिम युवा चमक रहे हैं। ऐसे में बार-बार घबराहट और अलगाव की कहानी फैलाना केवल नफ़रत को बढ़ाता है। शाहिद सईद ने साफ कहा कि ‘वंदे मातरम् पर सवाल उठाना आज़ादी की लड़ाई और भारत माता के सम्मान को ठुकराने जैसा है। इसमें कहीं भी शिर्क नहीं, इसमें तो सिर्फ़ मातृभूमि का सम्मान है—जैसा सम्मान पैग़ंबर मुहम्मद (स.) ने मदीना की धरती को दिया था।’

मंच की राष्ट्रीय संयोजक और महिला नेतृत्व की प्रमुख आवाज़ डॉ. शालिनी अली ने कहा कि भारत के मुसलमानों को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, स्किल डेवलपमेंट और रोज़गार की ज़रूरत है, न कि ऐसे मुद्दों की जो हमें बाकी समाज से टकराव की ओर ले जाएँ। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जो लोग मुसलमानों और हिंदुओं के बीच दूरी बढ़ाते हैं, वही सबसे बड़े दुश्मन हैं। भारतीय मुसलमान शांति, मेहनत और देश के साथ खड़े होने की परंपरा रखते हैं—और यह परंपरा किसी कट्टर बयान से नहीं टूट सकती।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान आयोग (NCMEI) के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. शाहिद अख्तर ने कहा कि इस्लाम और देशभक्ति एक-दूसरे के खिलाफ नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। इस्लाम इंसाफ, अमन और भाईचारे का पैग़ाम देता है। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् पर विवाद खड़ा कर मुसलमानों को भटकाने की कोशिश हो रही है। असली चुनौती तो आतंकवाद, कट्टरता, गरीबी और पिछड़ापन है—न कि राष्ट्रगीत।

जमीयत हिमायतुल इस्लाम के मशहूर आलिम मौलाना कारी अबरार जमाल क़ासमी ने और भी तीखा सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अगर मौलाना मदनी को वाकई मुसलमानों की चिंता है तो वे आतंकवाद पर खुलकर बोलें। “आतंकवाद इस्लाम को सबसे ज़्यादा बदनाम करता है। आतंकवाद पर खामोशी और वंदे मातरम् पर शोर—यह दोहरा मापदंड क्यों?” कारी जमाल ने कहा कि करोड़ों हिंदू भाइयों की भावनाओं को आहत कर के हम किसी भी तरह अपनी छवि सुधार नहीं सकते, बल्कि देश से दूरी ही बढ़ती है।

सूफी संत और सज्जादानशीन शाह सैय्यद जियारत अली मलंग हक्कानी ने पूरी बहस पर अंतिम मुहर लगाते हुए कहा कि इस्लाम की तहज़ीब, पहचान और मूल संदेश—सब प्यार, मोहब्बत और इंसानियत पर खड़े हैं। धर्म का रास्ता जोड़ने का है, तोड़ने का नहीं। उन्होंने कहा कि मुसलमानों की लड़ाई गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा और सामाजिक पिछड़ेपन से है—किसी भी राष्ट्र-प्रतीक से नहीं। जो बयान समाज को बाँटते हों, वे इस्लाम के भी नहीं, भारत के भी नहीं, और मुसलमानों के भी नहीं।

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