अवधेश कुमार । नई दिल्ली 1 दिसंबर 2025
लोकसभा का माहौल सोमवार को उस समय पूरी तरह तनावग्रस्त हो गया जब विपक्षी दलों ने ‘SIR’—यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन—के मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए अचानक हंगामा शुरू कर दिया। यह मामला पिछले कई दिनों से राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है, लेकिन सोमवार को पहली बार यह विरोध सीधे सदन की कार्यवाही को थमाकर भारी टकराव का कारण बना। जैसे ही प्रश्नकाल शुरू हुआ, कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके, वाम दलों और कई क्षेत्रीय दलों के सदस्यों ने आसन के सामने एकजुट होकर नारेबाज़ी शुरू कर दी और SIR प्रक्रिया में ‘अनियमितता’, ‘मतदाता सूची में गड़बड़ी’ और ‘BLOs की संदिग्ध मौतों’ को तत्काल चर्चा के लिए सूचीबद्ध करने की मांग की। इस अप्रत्याशित विरोध ने सदन को उथल-पुथल में बदल दिया और अध्यक्ष को कार्यवाही को बार-बार बाधित करना पड़ा।
विपक्ष की मुख्य आपत्ति यह थी कि SIR के नाम पर पूरे देश में मतदाता सूची के संशोधन की प्रक्रिया जिस तरह चलाई जा रही है, वह “अभूतपूर्व, संदिग्ध और लोकतांत्रिक ढांचे पर हमला” है। विपक्षी सांसदों ने आरोप लगाया कि सैकड़ों क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम बिना सूचना के काटे गए, कई क्षेत्रों में BLO कर्मचारियों पर अत्यधिक दबाव बनाया गया, और कई जगह BLO कर्मियों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौतें हुईं—जो यह संकेत देती हैं कि यह प्रक्रिया सिर्फ प्रशासनिक काम नहीं, बल्कि “चुनावी इंजीनियरिंग” है। विपक्ष ने कहा कि यह मुद्दा सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि संविधान और मताधिकार की पवित्रता से सीधा जुड़ा है, इसलिए केंद्र सरकार को इससे जुडे़ हर प्रश्न का स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
जैसे ही विपक्ष ने सत्ता पक्ष पर “मतदाता घोटाला”, “चुनावी हस्तक्षेप”, और “BLOs के मानवीय संकट” जैसे शब्दों में आरोप लगाना शुरू किया, कोषागार बेंचों से जोरदार विरोध शुरू हो गया। सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री ने विपक्ष के आरोपों को “भ्रम फैलाने वाला” और “राजनीतिक नौटंकी” बताया, जिससे माहौल और गरमा गया। विपक्षी सांसदों ने कहा कि सरकार बहस से भाग रही है और SIR पर कोई विस्तृत चर्चा नहीं कराना चाहती क्योंकि सच्चाई उजागर होने पर “पूरे प्रशासनिक ढांचे पर गंभीर उंगली उठेगी।” सरकार और विपक्ष के इस टकराव के बीच सदन में स्थिति लगातार बिगड़ती गई। तेज़ शोर, तीखी नारेबाज़ी और आरोप-प्रत्यारोप के बीच अध्यक्ष को कई बार सांसदों को शांत रहने की अपील करनी पड़ी, लेकिन कोई असर नहीं हुआ।
सदन में हंगामे का चरम उस समय आया जब विपक्षी दलों ने SIR प्रक्रिया को रोकने, इसकी न्यायिक जांच कराने और BLOs की मौतों पर विशेष चर्चा की माँग पर अड़ गए। कांग्रेस और टीएमसी के सांसद आसन के सामने आकर लगातार नारे लगाते रहे—“लोकतंत्र पर हमला बंद करो”, “मतदाता सूची साफ करो”, “SIR का सच बताओ”—और पूरे सदन का वातावरण अनियंत्रित हो गया। कुछ सांसदों ने कार्रवाई पुस्तिका लहराते हुए कहा कि सरकार चर्चाओं से डर रही है और सत्र का समय बर्बाद कर रही है। जवाब में सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर संसद को विकसित होने से रोकने और राजनीति को “अराजकता में बदलने” का आरोप लगाया। लगातार शोर और निपटने में असमर्थता के कारण अध्यक्ष को पहली बार कार्यवाही अस्थायी रूप से स्थगित करनी पड़ी।
लेकिन जब सदन पुनः शुरू हुआ, स्थिति और भी खराब हो चुकी थी। विपक्ष SIR पर तत्काल चर्चा की मांग पर अड़ा रहा और सत्ता पक्ष इसे “पूर्व नियोजित अवरोध” बताता रहा। दोनों पक्षों के बीच संवाद पूरी तरह टूट चुका था। कुछ ही मिनटों में नारेबाज़ी इतनी बढ़ गई कि अध्यक्ष ने अपनी नाराज़गी व्यक्त करते हुए कहा कि इस तरह सदन चलाना संभव नहीं। दोनों तरफ से एक कदम पीछे हटने की कोई इच्छा दिखाई न देने पर अंततः अध्यक्ष को कार्यवाही को पूरे दिन के लिए स्थगित करना पड़ा और घोषणा की कि कार्यवाही अब कल जारी होगी।
इस तरह SIR विवाद, जो पहले सिर्फ राजनीतिक बयानों तक सीमित था, अब सीधे संसद के गतिरोध का कारण बन गया है। विपक्ष इस मुद्दे को व्यापक लोकतांत्रिक संकट बता रहा है, जबकि सरकार इसे विपक्ष की “निराधार आशंकाएँ” बताती है। लेकिन सत्र की शुरुआत में ही सदन का ठप हो जाना इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद की कार्यवाही को गहरे स्तर पर प्रभावित कर सकता है। यह विवाद अब केवल मतदाता सूची या BLOs के कामकाज का नहीं, बल्कि देश के राजनीतिक और संवैधानिक संतुलन का मुद्दा बन चुका है—और दोनों पक्ष टकराव के लिए पूरी तरह तैयार दिख रहे हैं।




