Home » National » ड्रामेबाज कौन? देश जानता है—शीतकालीन सत्र में विपक्ष का हमला, जवाबदेही से बचती मोदी सरकार

ड्रामेबाज कौन? देश जानता है—शीतकालीन सत्र में विपक्ष का हमला, जवाबदेही से बचती मोदी सरकार

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 1 दिसंबर 2025

संसद का शीतकालीन सत्र 2025 शुरू होते ही माहौल गरमा गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष पर उंगली उठाते हुए कहा कि “संसद में ड्रामा नहीं, डिलीवरी चाहिए।” उनके इस बयान ने विपक्ष को और अधिक आक्रामक बना दिया। कांग्रेस सहित लगभग सभी विपक्षी दलों ने तत्काल पलटवार किया और कहा कि असली ड्रामा किसी से छिपा नहीं है—ड्रामा वह कर रहा है जो जनता के गंभीर मुद्दों पर चर्चाओं से भाग रहा है और संसद को केवल अपने भाषणों का मंच बनाना चाहता है। विपक्ष का कहना है कि सरकार की यह टिप्पणी लोकतंत्र का अपमान है, क्योंकि संसद का उद्देश्य सवालों से भागना नहीं, बल्कि जवाब देना होता है। विपक्ष ने कहा कि अगर देश में कहीं भी ड्रामा हो रहा है तो वह सत्ता पक्ष की तरफ़ से हो रहा है, जो हर सवाल उठाए जाने पर विपक्ष को दोषी ठहराने का आसान तरीका अपनाती है।

विपक्ष का सीधा आरोप—“सरकार बहस से डरती है, इसलिए मुद्दों को एजेंडा से बाहर कर रही है”

सत्र के पहले ही दिन विपक्ष ने सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि शीतकालीन सत्र का एजेंडा देखकर साफ है कि सरकार गंभीर मुद्दों पर चर्चा कराने को बिल्कुल तैयार नहीं है। SIR (Special Intensive Revision) मतदाता सूची विवाद, अनेक BLO कर्मियों की संदिग्ध मौतें, देश की राजधानी में लगातार सुरक्षा चूक, दिल्ली विस्फोट, बेरोज़गारी का बढ़ता पहाड़, और दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण संकट जैसे विषय—ये सभी विपक्ष की प्राथमिकता में थे, लेकिन सरकार ने इन्हें सत्र के मुख्य एजेंडे से पूरी तरह हटाकर यह संकेत दिया कि वह बहस से घबराती है। विपक्ष का तर्क है कि जनता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा किए बिना, संसद को केवल सरकारी विधेयकों की फैक्ट्री बना देना लोकतंत्र का अपमान है। विपक्षी नेताओं ने कहा कि सरकार जानती है कि इन मुद्दों पर उसके पास ठोस जवाब नहीं हैं, इसलिए वह बहस से बचने का रास्ता चुन रही है, जिसे “ड्रामा” कहकर छिपाया जा रहा है।

SIR विवाद पर विपक्ष का प्रहार—“मतदाता सूची में हो रहा खेल, सरकार चुप क्यों है?”

सत्र में विपक्ष का सबसे तीखा हमला SIR विवाद पर केंद्रित रहा। विपक्ष का दावा है कि मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण में जिन बड़े पैमाने पर बदलावों की शिकायतें मिल रही हैं, वे मात्र तकनीकी त्रुटियाँ नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के साथ गहरा खिलवाड़ हैं। BLO कर्मचारियों की असामान्य मौतें, कई जगहों पर मतदाता नाम काटे जाने की खबरें, और मतदाता पहचान बदलने की शिकायतें—इन सभी मुद्दों पर सरकार की चुप्पी विपक्ष के अनुसार “संदिग्ध और चिंताजनक” है। विपक्ष ने सवाल उठाया कि अगर सबकुछ साफ और पारदर्शी है, तो सरकार इस मुद्दे पर खुलकर बहस करने से क्यों कतराती है? विपक्ष का कहना है कि सरकार इस विवाद को “तकनीकी प्रक्रिया” कहकर असल मुद्दे से भाग रही है, जबकि लोकतंत्र का भविष्य दांव पर लगा हुआ है। एक विपक्षी सांसद ने तीखे शब्दों में कहा—“जिस देश में मतदाता सूची सुरक्षित न हो, वहां लोकतंत्र भी सुरक्षित नहीं रहता।”

दिल्ली प्रदूषण और सुरक्षा पर विपक्ष का हमला—“सरकार को PR की चिंता है, जनता की जिंदगी की नहीं”

दिल्ली-एनसीआर में जीवन-मृत्यु की स्थिति पैदा कर चुके प्रदूषण पर भी विपक्ष का हमला बेहद कठोर रहा। विपक्ष ने कहा कि AQI जब ‘खतरनाक’, ‘गंभीर’ और ‘आपातकालीन’ स्तर को पार कर चुका है, तब भी सरकार ने इसे संसद के एजेंडा में शामिल नहीं किया, जो दर्शाता है कि जनता की स्वास्थ्य चिंता सरकार की प्राथमिकता में कहीं नहीं है। विपक्ष का कहना है कि यह पहली बार नहीं है—हर सर्दी दिल्ली जहरीली होती है, और हर बार सरकार सिर्फ़ बैठकें और बयान देती है, लेकिन ठोस उपाय नहीं। विपक्ष ने यह भी सवाल उठाया कि दिल्ली में हो रहे विस्फोटों और सुरक्षा विफलताओं पर सरकार अब तक एक भी विस्तृत बयान देने के लिए तैयार क्यों नहीं? कांग्रेस ने कहा कि सरकार को जनता की सुरक्षा नहीं, बल्कि अपनी छवि और PR अभियान की अधिक चिंता है। विपक्ष का आरोप है कि जब सरकार अपनी नाकामी से घिर जाती है, तब वह दोष विपक्ष या राज्य सरकारों पर डालने का आसान रास्ता चुनती है, जबकि असल जिम्मेदारी केंद्र की होती है।

विपक्ष का तंज—“विधेयक पास करो, सवाल बाईपास करो—यही मोदी सरकार का संसद मॉडल”

सरकार द्वारा एक के बाद एक विधेयक लाने की तैयारी पर भी विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उच्च शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य सुरक्षा सेस तक, सरकार इस सत्र में कई भारी भरकम विधेयक लाना चाहती है। विपक्ष का कहना है कि सरकार संसद का इस्तेमाल केवल क़ानून पास कराने के लिए करती है, जबकि इन विधेयकों पर व्यापक बहस, संसदीय समितियों की जांच, और विपक्ष की राय—यह सब केवल रस्म अदायगी के लिए छूट दिया जाता है। विपक्ष ने कहा कि मोदी सरकार का संसद मॉडल बहुत स्पष्ट है—“पहले विधेयक फेंको, फिर धक्का देकर पास कराओ, और सवाल पूछे जाने पर विपक्ष को बदनाम करो।” राज्यसभा में नारेबाज़ी पर रोक और सांसदों के व्यवहार पर सख्त दिशानिर्देशों को विपक्ष ने “आवाज़ दबाने का तरीका” बताया। विपक्ष का कहना है कि सरकार हर संवैधानिक संस्थान को अपनी सुविधा के हिसाब से बदलना चाहती है, जिससे लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ जाता है।

पहले दिन ही सदन ठप—“यह विपक्ष की नहीं, सरकार की असहजता का नतीजा है”

शीतकालीन सत्र के पहले दिन ही लोकसभा और राज्यसभा में हंगामा हुआ और सदन स्थगित करना पड़ा। सरकार हमेशा यह दावा करती है कि विपक्ष सदन नहीं चलने देता, लेकिन विपक्ष का तर्क है कि सदन तभी चलता है जब सरकार बहस के लिए तैयार हो और विपक्ष के मुद्दे एजेंडे का हिस्सा बने। विपक्ष का कहना है कि सरकार केवल अपनी सुविधानुसार सदन चलाना चाहती है—जहां मंत्री भाषण दें, प्रधानमंत्री बयान दें, और विपक्ष सिर्फ़ दर्शक बना बैठा रहे। सदन का ठप होना इस बात का प्रमाण है कि सरकार विपक्ष की आवाज़ सुनने तक को तैयार नहीं। एक वरिष्ठ विपक्षी नेता ने कहा—“सदन सरकार की जिम्मेदारी होती है, विपक्ष का रोल सवाल पूछना है। अगर सरकार जवाब देने से भागेगी तो सदन ठप होना ही है।”

विपक्ष एकजुट, सरकार रक्षात्मक—2025 का शीतकालीन सत्र मोदी सरकार के लिए मुश्किलों भरा

शीतकालीन सत्र की शुरुआत ने ही साफ कर दिया है कि विपक्ष पूरी तरह आक्रामक मोड में है। सरकार पहली बार इतनी रक्षात्मक दिखाई दे रही है—क्योंकि मुद्दे बहुत बड़े हैं और जवाब बहुत कम। SIR विवाद से लेकर दिल्ली प्रदूषण तक, सुरक्षा से लेकर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं तक—हर मुद्दा सरकार की विफलताओं की ओर इशारा कर रहा है। विपक्ष ने सत्र के पहले ही दिन सरकार को संदेश दे दिया है—
“लोकतंत्र में जवाब देना ही पड़ेगा, ड्रामा कह कर भागा नहीं जा सकता।”

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments