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कांग्रेस की बड़ी भूल: साँप का फन न कुचलने की सजा नेशनल हेराल्ड में मिल रही

एबीसी डेस्क नई दिल्ली 30 नवंबर 2025

भारतीय राजनीति में यह कहावत कई बार सुनाई देती है—“साँप का फन अगर समय पर न कुचला जाए, तो वह लौटकर ज़रूर डसता है।” आज कांग्रेस ठीक उसी राजनीतिक सत्य का दर्दनाक अनुभव कर रही है। कांग्रेस ने अपने लंबे शासनकाल में जिस उदारता, राजनीतिक शुचिता और “विंडक्टिव न बनने” का दावा बरकरार रखा, वही उदारता अब उसके गले की फांस बन चुका है। नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया और राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज हुई FIR इस बात का सबसे ताजा और तीखा प्रमाण है कि कांग्रेस ने जिन लोगों को बचाया, जिन पर हाथ हल्का रखा—आज वही नाग बनकर उसी कांग्रेस पर विष उगल रहे हैं।

UPA-1 और UPA-2 के वर्षों को याद कीजिए—जब कांग्रेस केंद्र की धुरी थी, और सत्ता इतनी मजबूत कि किसी भी विपक्षी नेता पर निर्णायक कार्रवाई की जा सकती थी। बाबरी विध्वंस की जांच हो, आडवाणी की भूमिका हो, गुजरात दंगों की पृष्ठभूमि हो या नरेंद्र मोदी और शीर्ष BJP नेतृत्व की राजनीतिक उभर—हर मोर्चे पर कांग्रेस के पास कानूनी और प्रशासनिक ताकत थी। लेकिन कांग्रेस ने ये रास्ता नहीं चुना। लिब्रहान आयोग ने आडवाणी पर रहम किया, नानावटी आयोग ने मोदी पर किसी निर्णायक निष्कर्ष की दिशा नहीं दिखाई। यह वह समय था जब कांग्रेस चाहती तो राजनीति का संतुलन पूरी तरह बदल सकती थी। मगर उसने प्रतिशोधी राजनीति से परहेज़ किया—और आज उसी परहेज़ की कीमत कांग्रेस को अपने अस्तित्व तक के संकट के रूप में चुकानी पड़ रही है।

विडंबना यह भी है कि कांग्रेस ने अपने बड़े विपक्षी नेताओं पर तो दया दिखाई, लेकिन अपनी ही सहयोगी पार्टियों के SC–OBC नेताओं पर कड़ी कार्रवाई की। दलित और पिछड़े वर्ग के कई नेताओं को जेल भेजा गया, लंबी कानूनी लड़ाइयों में उलझाया गया। यानी कांग्रेस की सख्ती का भार अपने खेमे के भीतर ग़लत दिशा में गिरा—और विपक्ष को फलने-फूलने का पूरा मौक़ा मिल गया।

आज वही BJP, वही RSS, वही नेतृत्व जिसे कांग्रेस ने कभी “सिस्टम सेफ” रखते हुए छुआ तक नहीं—वही लोग सत्ता में बैठकर कांग्रेस पर सबसे तीखा हमला बोल रहे हैं। नेशनल हेराल्ड की FIR इसलिए केवल एक केस नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस के राजनीतिक व्यवहार की ऐतिहासिक भूलों की याद दिलाने वाला दर्पण है। शिकायत 2013 में दर्ज हुई थी, लेकिन UPA में ठंडी पड़ी रही। जैसे ही मोदी शासन आया, वर्षों से सोया मामला अचानक जागा—और अब कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर शिकंजा कस रहा है।

कांग्रेस के भीतर शायद आज एक सच्ची, कड़वी कसक होगी—”अगर हमने तब साँप का फन कुचल दिया होता…
तो आज यह दिन देखने की नौबत ही न आती।”

यह मामला सिर्फ भ्रष्टाचार, जांच या FIR का मुद्दा नहीं—बल्कि राजनीतिक बुद्धिमत्ता, निर्णायकता और सत्ता के इस्तेमाल की वह सीख है जिसे कांग्रेस ने नज़रअंदाज़ किया। जिन्हें अवसर और ऑक्सीजन दी, वही आज राजनीतिक बदले की भावना लेकर कांग्रेस को ही बेदर्दी से निशाना बना रहे हैं। भारतीय राजनीति का यह बड़ा सत्य है—जो नेता दुश्मन को बचाता है, इतिहास उसे नहीं बचाता।

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