आलोक कुमार | नई दिल्ली 24 नवंबर 2025
लोकतंत्र सिर्फ समारोह नहीं, जवाबदेही की मांग करता है
दिल्ली के प्रतिष्ठित राष्ट्रपति भवन में 24 नवंबर 2025 को आयोजित शपथ-ग्रहण समारोह में न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में पद की शपथ ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्रियों और शीर्ष संवैधानिक पदाधिकारियों की उपस्थिति इस कार्यक्रम को भव्यता प्रदान कर रही थी। लेकिन इस पूरे आयोजन में एक चेहरा गायब था—लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का। उनकी अनुपस्थिति ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी और सोशल मीडिया पर बड़ी बहस को जन्म दिया। जहाँ सत्ता पक्ष ने इसे प्रोटोकॉल की अवहेलना बताया, वहीं लोकतंत्र व न्याय व्यवस्था में विश्वास रखने वाले कई विश्लेषकों ने इसे एक गंभीर और साहसी राजनीतिक संकेत माना।
लोकतंत्र के लिए प्रतीकात्मक विद्रोह, सिर्फ बहिष्कार नहीं
राहुल गांधी का यह निर्णय किसी लापरवाही या औपचारिकता के प्रति उदासीनता का परिणाम नहीं था, बल्कि न्यायपालिका पर बढ़ते सवालों और चुनाव प्रणाली में पारदर्शिता की कमी के खिलाफ एक मजबूत संदेश था। विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि चुनाव प्रक्रिया में वोटर लिस्ट में हेराफेरी (#VoteChori) और संस्थाओं की निष्पक्षता पर खतरा बढ़ रहा है, जबकि न्यायपालिका कई मामलों में चुप्पी साधे बैठी है। ऐसे समय में समारोह से दूरी बनाकर राहुल ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि वह सिर्फ लोकतंत्र के मंच पर उपस्थित रहकर फोटो-ऑप का हिस्सा नहीं बनेंगे, बल्कि न्यायिक संस्थाओं की जवाबदेही और निष्पक्षता पर प्रश्न उठाते रहेंगे। यह कदम दर्शाता है कि उनके लिए लोकतंत्र एक दैनिक जिम्मेदारी है, न कि तामझाम और प्रोटोकॉल का उत्सव।
संस्थाओं पर भरोसे की लड़ाई: विपक्ष की भूमिका को मजबूती
सत्ता पक्ष की ओर से आरोप लगाए जा रहे हैं कि राहुल गांधी ने संवैधानिक परंपरा का सम्मान नहीं किया, लेकिन उनके समर्थक और कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यही वह प्रतीकात्मक प्रतिरोध है जिसकी आज भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को आवश्यकता है। जब संस्थाओं पर जनता का विश्वास डगमगा रहा हो, तब विपक्ष का यह भूमिका निभाना—सवाल उठाना, उपस्थित होने के बजाय खामोशी से प्रतिरोध करना—लोकतंत्र को जीवित रखने का एक महत्वपूर्ण तरीका बन जाता है। राहुल की यह चुप्पी किसी भाषण से अधिक प्रभावी साबित हुई, क्योंकि इसने न्यायपालिका और सत्ता संरचनाओं के बीच संबंधों पर रोशनी डाली।
समारोह में न जाकर राहुल ने जताई न्यायिक सुधार की मांग
राहुल गांधी की यह रणनीति सत्ता के गलियारों को असहज कर गई, क्योंकि यह संदेश साफ था—जब तक न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता, चुनावी प्रणाली में विश्वसनीयता और नागरिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित नहीं होती, तब तक विपक्ष का प्रतिनिधि केवल औपचारिक उपलब्धियों का हिस्सा नहीं बनेगा। यह लोकतांत्रिक मर्यादाओं को चुनौती देने का साहसी प्रयास था, जो यह बताता है कि विपक्ष केवल आलोचना नहीं कर रहा, बल्कि संस्थाओं के चरित्र और दिशा पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
एक मौन लेकिन प्रभावशाली राजनीतिक कदम
राहुल गांधी की अनुपस्थिति को सतही तौर पर देखने से मामला हल्का हो सकता है, लेकिन गहराई में जाएँ तो यह भारत की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह कदम सिर्फ कार्यक्रम का बहिष्कार नहीं, बल्कि लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था की आत्मा को लेकर एक गंभीर और विचारशील हस्तक्षेप है। यह संदेश किसी भाषण, ट्वीट या बयान से कहीं ज्यादा प्रभावी साबित हुआ—क्योंकि यह उस प्रणाली को आईना दिखाता है जो अक्सर औपचारिकताओं के पीछे वास्तविक मुद्दों को छिपा लेती है।
राहुल गांधी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उनके लिए लोकतंत्र सम्मान का समारोह नहीं, जिम्मेदारी का निर्वाह है। उनका यह मौन प्रतिरोध आने वाले समय में भारतीय राजनीति और न्यायिक प्रणाली पर दूरगामी प्रभाव छोड़ सकता है।




