सरोज सिंह | नई दिल्ली 24 नवंबर 2025
भारत आज आर्थिक और सामाजिक संकटों से गुज़र रहा है—बेरोज़गारी अपने ऐतिहासिक स्तर पर, महंगाई लगातार बढ़ती हुई, सरकारी अस्पतालों की हालत दयनीय, शिक्षा व्यवस्था टूटती हुई और युवाओं में निराशा गहरी होती जा रही है। लेकिन इन असली मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय सत्ता पक्ष और उसके वैचारिक संगठन आरएसएस-बीजेपी जनता को भावनाओं के नशे में रखने का लगातार प्रयास करते रहते हैं। टीवी स्टूडियो, सोशल मीडिया अभियान और जोशीले भाषणों के माध्यम से ऐसे मुद्दे गढ़े जाते हैं जो देश के वास्तविक दर्द से जनता का ध्यान हटाकर सिर्फ जज़्बात का उबाल पैदा करने का काम करें। राष्ट्रवाद को एक राजनीतिक प्रोडक्ट की तरह पैक कर बाज़ार में बेचा जा रहा है, और यह खेल वर्षों से इस देश में चलता आया है। सत्ता के लिए यह सबसे आसान रास्ता है—असली काम मत करो, बस राष्ट्रवाद का शोर मचा दो।
आज़ादी की लड़ाई में संघ की अनुपस्थिति
इतिहास के दस्तावेज़, संघ साहित्य और उसके वरिष्ठ नेताओं के बयान इस बात की पुष्टि करते हैं कि 1925 में स्थापित आरएसएस ने स्वतंत्रता आंदोलन में कोई सक्रिय भूमिका नहीं निभाई। उस दौर में जब भगत सिंह, अशफ़ाक उल्लाह खान, रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाषचंद्र बोस और हजारों क्रांतिकारी देश की आज़ादी के लिए फांसी चढ़ रहे थे, जेलों में सड़ रहे थे और ब्रिटिश शासन की यातनाएँ झेल रहे थे, उसी समय संघ ने अपने सदस्यों को स्वतंत्रता आंदोलन से दूर रहने का निर्देश दिया था। संघ का तर्क था कि वह “चरित्र निर्माण और संगठन” पर काम कर रहा है और राजनीति से दूर रखना चाहता है। लेकिन सवाल उठता है—जब देश की जड़ें पर विदेशी शासन की कुल्हाड़ी चल रही थी, तब संगठन और चरित्र निर्माण की प्राथमिकता क्या वाकई आज़ादी के संघर्ष से ऊपर हो सकती थी? इतिहास गवाही देता है कि संघ के किसी भी बड़े नेता ने स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बनकर जेल नहीं काटी, सत्याग्रह नहीं किया, आंदोलन नहीं चलाया। यह देशभक्ति का कौन-सा स्वरूप था जिसमें गुलामी स्वीकार्य थी और आज़ादी गौण?
अंग्रेज़ों के साथ सहयोग और मुखबिरी के आरोप
कई ऐतिहासिक स्रोतों और राजनीतिक आलोचकों ने यह आरोप लगाया है कि संघ के लोगों ने ब्रिटिश हुकूमत को भारत के क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों की गतिविधियों की जानकारी देने का काम किया। अंग्रेजों के रिकॉर्ड में ऐसे दस्तावेज़ मौजूद रहे हैं जिनमें हिंदू राष्ट्रवादी समूहों द्वारा सहयोग की चर्चा मिलती है। यह भी तथ्य है कि उस दौर में अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ा खतरा क्रांतिकारी संगठन और कांग्रेस आंदोलन थे, लेकिन संघ को कभी ब्रिटिश शासन से गंभीर दमन का सामना नहीं करना पड़ा। यह विरोधाभास सवाल खड़ा करता है—क्या ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि संघ ने ब्रिटिश सत्ता को चुनौती ही नहीं दी? या इसलिए कि उसके अंदर ऐसे तत्व मौजूद थे जो प्रतिरोध की जगह सत्ता से तालमेल साधने में विश्वास रखते थे?
माफीवीर सावरकर: राष्ट्रवाद का विरोधाभासी प्रतीक
बीजेपी और संघ जिन विनायक दामोदर सावरकर को “वीर” का दर्जा देते नहीं थकते, उनके इतिहास का दूसरा पक्ष अक्सर छिपा लिया जाता है। सावरकर ने अंडमान की सेल्युलर जेल में रहते हुए अंग्रेजों को कुल छह दया याचिकाएँ लिखीं, जिनमें उन्होंने खुद को ब्रिटिश सरकार का “वफादार प्रजा” बताया और राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहने का वादा किया। यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि रिहाई के बाद सावरकर ने ब्रिटिश सरकार से 60 रुपये महीने की पेंशन ली, जो आज की मूल्य व्यवस्था में कम से कम दो लाख रुपये महीना बैठती है। जब हजारों क्रांतिकारी फांसी पर झूल रहे थे, जब स्वतंत्रता सेनानी जेलों में अमानवीय अत्याचार झेल रहे थे, तब यह आर्थिक सहयोग और वफादारी किस प्रकार का राष्ट्रवाद था? यह तुलना सावरकर की छवि को और संदिग्ध बनाती है—एक तरफ बलिदान देने वाले, दूसरी तरफ माफी मांगने वाले और पेंशन लेने वाले।
अखंड भारत और नो मोर पाकिस्तान—सिर्फ़ राजनीतिक कल्पना
आज़ादी की लड़ाई में निष्क्रिय रहने वाले वही संगठन आज “अखंड भारत” के सबसे बड़े पैरोकार बन गए हैं। वर्षों से आरएसएस का एक विंग “नो मोर पाकिस्तान” के नाम पर प्रस्ताव पास करता रहता है, बैठकें करता रहता है, नक्शे छापता रहता है, भाषण देता रहता है। लेकिन जमीन पर कोई नीति, कोई कूटनीतिक रणनीति, कोई सैन्य तैयारी या अंतरराष्ट्रीय समझ दिखाई नहीं देती। यह सब राजनीतिक भावनाएँ भड़काने के उपकरण हैं, जिनका मकसद बस इतना है कि जनता को राष्ट्रवाद के नशे में रखा जाए और असली मुद्दे पीछे धकेल दिए जाएँ। अखंड भारत का यह विचार संघ और बीजेपी के लिए एक स्थायी राजनीतिक हथियार है—जो जब चाहें इस्तेमाल कर लेते हैं, बिना किसी वास्तविक जिम्मेदारी के।
देशभक्ति का अफीम: असली मुद्दों से ध्यान भटकाना
जब भी बेरोज़गारी चरम पर पहुंचती है, जब महंगाई जनता की कमर तोड़ देती है, जब स्वास्थ्य सुविधाएँ गिर जाती हैं, जब स्कूलों में बच्चे बिना पढ़ाई के रह जाते हैं, जब किसान आत्महत्या करता है—ठीक उसी समय राष्ट्रवाद का शोर बढ़ा दिया जाता है। टीवी डिबेट्स में पाकिस्तान घुस जाता है, सोशल मीडिया पर युद्ध की बातें शुरू हो जाती हैं, नेताओं के भाषणों में अखंड भारत की घोषणाएँ गूंजने लगती हैं। जनता भावनाओं के ज्वार में बह जाती है और असली सवाल पूछना भूल जाती है। यही वह “देशभक्ति का अफीम” है, जिसका इस्तेमाल सत्ता बार-बार करती है ताकि जरूरतमंद, गरीब, बेरोज़गार और पीड़ित नागरिकों का ध्यान वास्तविक समस्याओं से हट जाए और वे भावनात्मक मुद्दों में उलझकर रह जाएँ।
राजनाथ सिंह का सिंध बयान और राजनीतिक पलटवार
हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सिंध पर बयान देकर इस पुराने राष्ट्रवादी नैरेटिव को फिर से हवा दी। उन्होंने कहा कि भारत का सिंध छीन लिया गया और इतिहास की गलती को सुधारा जाना चाहिए। इस बयान ने तुरंत मीडिया और राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी। लेकिन कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने तीखा पलटवार करते हुए कहा— “सेना भेजिए और पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश को भारत में मिला लीजिए!” उनका संदेश साफ था—सिर्फ़ भाषण और राजनीतिक बयानबाज़ी से अखंड भारत नहीं बनता। अगर वास्तव में क्षमता और इच्छा है तो कार्रवाई दिखाइए। इस प्रतिक्रिया ने राजनाथ सिंह के बयान की वास्तविकता और उसकी राजनीतिक मंशा को उजागर कर दिया—न तो सरकार का ऐसा कोई इरादा है, न ही रणनीति। यह सब सिर्फ राजनीतिक theatrics था।
राष्ट्रीयता का असली पैमाना काम, त्याग और सत्य
सच्चाई यह है कि जिस संगठन ने स्वतंत्रता की लड़ाई में योगदान नहीं दिया, जिसने अंग्रेजों से माफी मांगी, जिसने पेंशन ली, जो ब्रिटिश शासन के विरोध में खड़ा नहीं हुआ—वही आज राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा ठेकेदार बन बैठा है। अखंड भारत, पाकिस्तान-विरोध और भावनात्मक राष्ट्रवाद के नारे जनता के लिए अफीम की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं ताकि वे महंगाई, बेरोज़गारी, स्वास्थ्य संकट और शिक्षा के पतन जैसे वास्तविक मुद्दों पर सवाल न उठा सकें। देशभक्ति का असली पैमाना भाषण नहीं, त्याग और काम है। और इतिहास गवाही देता है कि त्याग करने वाले आज भी गुमनाम हैं, जबकि ड्रामा करने वाले सत्ता में बैठे हैं। यह राष्ट्रवाद नहीं—यह राजनीतिक व्यापार है।




