सुमन कुमार | नई दिल्ली 24 नवंबर 2025
भारतीय राजनीति के मौजूदा तूफानी दौर में केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के हालिया बयान ने एक बार फिर गर्मागर्म राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। सिंध प्रांत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र के लोग भारत के साथ जुड़ना चाहते हैं और विभाजन की त्रासदी से मुक्ति पाना चाहते हैं। यह बयान आते ही विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया और कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने व्यंग्य भरे अंदाज़ में कहा कि अगर राजनाथ सिंह इतने उत्साही हैं तो सेना जुटाइए और पाकिस्तान, अफगानिस्तान तथा बांग्लादेश को भारत में मिला लीजिए। अल्वी का यह तंज न सिर्फ राजनीतिक टिप्पणी था बल्कि सरकार की नीति, विचारधारा और ‘अखंड भारत’ की अवधारणा पर बड़ा सवाल भी खड़ा करता है।
अल्वी के कथन ने सोशल मीडिया पर आग की तरह फैलकर विपक्ष को नया हथियार दे दिया। कांग्रेस और अन्य दलों ने इसे बीजेपी की विस्तारवादी सोच का सबूत बताते हुए दावा किया कि सत्ताधारी पार्टी चुनावी लाभ के लिए ऐसे बयान देती है। दूसरी ओर बीजेपी समर्थक नेताओं ने इसे राजनाथ सिंह का भावनात्मक और सांस्कृतिक संदर्भ बताया और कहा कि यह बयान आधिकारिक नीति नहीं बल्कि एक विचारधारात्मक दृष्टि का हिस्सा है। राजनीतिक तापमान बढ़ने के बावजूद सरकार ने इस विवाद को कमतर दिखाने की कोशिश की और इसे “व्यक्तिगत राय” बताकर किनारा किया।
हालांकि यह विवाद अचानक नहीं उपजा। अखंड भारत की अवधारणा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की वैचारिक नींव का हिस्सा रही है। स्वतंत्रता संग्राम के दौर में विनायक दामोदर सावरकर, हिंदू महासभा और बाद में आरएसएस के संस्थापकों ने अखंड भारत की कल्पना को सांस्कृतिक और ऐतिहासिक एकता के आधार पर प्रस्तुत किया। आरएसएस साहित्य और उसकी शिक्षा शाखा विद्या भारती की पुस्तकों में भारत की सीमाओं का वर्णन म्यांमार, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और तिब्बत तक विस्तृत बताया गया है। इन सांस्कृतिक संदर्भों को संगठन लगातार अपनी विचारधारा का हिस्सा बनाए रखता है, जिसे सत्ताधारी दल से जोड़कर देखा जाता है।
बीजेपी के राजनीतिक इतिहास में भी ऐसे विचारों की झलक मिलती है। 1965 में भारतीय जनसंघ ने एक प्रस्ताव में कहा था कि अलगाववादी राजनीति ही भारत-पाकिस्तान विभाजन की बाधा है और मुसलमानों के राष्ट्रीय जीवन में शामिल होने पर अखंड भारत संभव है। 2015 में बीजेपी नेता राम माधव ने अल जज़ीरा को दिए इंटरव्यू में कहा था कि ऐतिहासिक कारणों से अलग हुए भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश एक दिन लोकप्रिय भावनाओं के आधार पर फिर एक हो सकते हैं। हालांकि विवाद बढ़ने पर पार्टी ने इसे भी “व्यक्तिगत राय” कहकर हटाने की कोशिश की थी।
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी कई बार अखंड भारत को “अविभाज्य सत्य” कह चुके हैं। 2023 और उससे पहले 2021-2022 में उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान भारत की सांस्कृतिक इकाई का हिस्सा रहे हैं और भविष्य में उनकी वापसी संभव है। इन बयानों ने कई बार कूटनीतिक असहजता पैदा की है, खासकर ऐसे समय में जब चीन पड़ोसी देशों में भारत की भूमिका को चुनौती दे रहा है और क्षेत्रीय संतुलन संवेदनशील बना हुआ है।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो मौर्य काल में अफगानिस्तान से म्यांमार तक कुछ क्षेत्रों पर नियंत्रण जरूर रहा, लेकिन वास्तविक रूप से इतने विस्तृत भूभाग का एकीकृत शासन दुर्लभ रहा है। ब्रिटिश काल वह समय था जब एक बड़ा हिस्सा एक प्रशासनिक ढांचे में आया, और 1947 का बंटवारा इसी संरचना के टूटने का परिणाम था। फिर भी आरएसएस और बीजेपी इस अवधारणा को सैन्य विस्तार नहीं बल्कि सांस्कृतिक एकता के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि आलोचक इसे खतरनाक और अव्यावहारिक मानते हैं।
राजनाथ सिंह के बयान और अल्वी के जवाब ने इस बहस को फिर जीवित कर दिया है। विपक्ष इसे चुनावी जुमला बताकर तंज कस रहा है, जबकि सत्तापक्ष इस मुद्दे को भावनात्मक और ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़ रहा है। यह विवाद सिर्फ बयानबाजी का मुद्दा नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति, पड़ोसी देशों से संबंध और राष्ट्रीय एकता की दिशा पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। एक तरफ शांति और सहयोग की मांग है, दूसरी ओर ऐतिहासिक आकांक्षाओं की पुनरावृत्ति—और यही मिश्रण भारतीय राजनीति को लगातार विवादों और बहसों का अखाड़ा बनाए रखता है।




