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10 दिन का गोला-बारूद—और दो जन्मदिन वाले जनरल साहब : काम खत्म, घर बैठो

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भारतीय राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिनका कद उनके तर्क से नहीं, उनके टाइटल से बनता है। जनरल वी.के. सिंह उसी दुर्लभ नस्ल के प्रतिनिधि हैं—जहाँ वर्दी उतर जाती है, लेकिन “सत्य” बोलने का लाइसेंस जारी रहता है। लोग उनकी हर बात को रक्षा रणनीति समझ लेते हैं, चाहे वह बात विज्ञान की हो, गोला-बारूद की, या उनकी खुद की जन्मतिथि की। दो जन्मतिथियाँ लेकर घूमने वाले इस जनरल ने जब “भारत के पास सिर्फ 10 दिन का गोला-बारूद है” जैसे महावाक्य उछाले, तो आधा देश इसे गोला-बारूद का नोबेल पुरस्कार-स्तरीय सत्य मान बैठा। इसीलिए हेडलाइन कहती है—“काम खत्म, घर बैठो”—क्योंकि जनरल साहब का काम बयान देना था, उसमें वे सफल रहे; अब जनता को बेवकूफ़ बनाना बंद करके थोड़ा विश्राम कर लेना चाहिए।

सवाल यह है कि यह “10 दिन” का जादुई आंकड़ा आया कहाँ से? न किसी सैन्य किताब में ऐसा नियम है, न किसी लॉजिस्टिक मॉडल में। युद्ध में “एक दिन में कितनी गोली चलेगी” इसका कोई गणित नहीं होता—यह वैसे ही है जैसे कोई कहे: “घर में 10 आलू हैं, रोज़ दो खाओगे तो 5 दिन चलेंगे।” यह सेना का विज्ञान नहीं, बल्कि व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का गणित है। लेकिन क्योंकि इसे एक “जनरल” ने कहा, इसलिए भक्तों को लगा कि यह रक्षा रणनीति है। जबकि सच्चाई यह है कि मिसाइल, गोला-बारूद, ईंधन—सबकी एक्सपायरी होती है; युद्ध 5 साल की सब्सक्रिप्शन सेवा नहीं है। लेकिन जनरल साहब इस बिज़नेस मॉडल को ऐसे पेश करते रहे जैसे उन्हें अलमारी में रखा स्टॉक गिनकर सीधे प्रेस कॉन्फ़्रेंस में जाना होता था।

विडंबना देखिए—2017 में CAG ने भी कहा कि स्टॉक कम है, पर देश शांत रहा, क्योंकि तब तक मोदी जी प्रधानमंत्री थे और भक्तों के लिए वे ही “लेथल वेपन” थे। सीमा पर हवा भी तेज़ बह जाए तो कहा जाता था—“मोदी जी का प्रभाव है।” ऐसे माहौल में जनरल साहब के बचकाने तर्कों की जांच कौन करता? आख़िर देश भावनाओं से चलता है, गोला-बारूद नीति से नहीं।

अब ज़रा उस “दो जन्मदिन” वाले प्रकरण पर भी विचार करें—जनरल साहब का वास्तविक जन्मदिन कौन-सा है, यह आज तक भगवान ब्रह्मा भी तय नहीं कर पाए। लेकिन आश्चर्य यह है कि एक आदमी अपनी जन्मतिथि तय न कर पाया, और देश की युद्ध तैयारी पर अंतिम सत्य सुनाता रहा। दो जन्मतिथियाँ, चार पद, दस बयान—लॉजिक कहाँ खोजोगे? यही कारण है कि जनरल साहब की राजनीतिक यात्रा तर्क पर नहीं, नैरेटिव पर आधारित रही। अन्ना आंदोलन से भाजपा तक और फिर मंत्रालय तक, यह सब कुछ एक ही चीज़ से संभव हुआ—बयान-बाज़ी। बोलो, उछालो, वायरल हो जाओ और सत्ता के गलियारों में जगह बना लो।

युद्ध की गंभीरता, सैन्य रणनीति की गहराई, लॉजिस्टिक्स की जटिलता—ये सब जनरल साहब की टैगलाइन “10 दिन में खत्म” के आगे बौनी हो गईं। युद्ध कोई हलवा-पूरी का कार्यक्रम नहीं होता जहाँ पहले से प्लेटें रख दी जाएँ। यदि युद्ध 10 दिन से लंबा चले, तो परमाणु हथियारों का साया पूरी दुनिया पर मंडराने लगता है। पर जनरल साहब इसे भी “दशहरे की रिहर्सल” की तरह बताते रहे, और जनता ने इसे भी राष्ट्रवाद समझकर ताली बजा दी।

फिर जब असलियत सामने आई—रक्षा सौदे, बारूद की कमी, खरीदी में अनियमितता, युद्ध तैयारी के सवाल—तो जनरल साहब धीरे-धीरे राजनीतिक गायबगी के शिकार हो गए। उनका मिशन पूरा हो चुका था, पुरस्कार मिल चुका था, मंत्रालय मिल चुका था, और अब वे वही कर रहे हैं जो ऐसे किरदार अंत में करते हैं—चुपचाप कोने में बैठ जाना।

और यहीं व्यंग्य अपना चरम छूता है—

यह पूरी कहानी सिर्फ गोला-बारूद की नहीं, बल्कि “च्यूतियोक्रेसी”—यानी मूर्खतंत्र—की स्थापना की है। यह वह व्यवस्था है जहाँ तथ्य नहीं, चेहरा मायने रखता है; तर्क नहीं, क्रोध मायने रखता है; और सत्य नहीं, पद के पीछे लटकता हुआ सम्मान मायने रखता है। जनरल साहब इस तंत्र के सबसे सफल मोहरों में से एक रहे। उन्होंने वही दिया जो इस दौर को चाहिए था—दिल को गुदगुदाने वाला झूठ, दिमाग को सुन्न करने वाला राष्ट्रवाद, और टीवी डिबेट में इस्तेमाल होने वाला फ्री गोला-बारूद।

काम भी हो गया, सियासी कर्ज भी उतर गया, और जनता के मन में वही पुराना मिथक—“जनरल ने कहा है, जरूर सच होगा”—आज भी किसी को किसी भी झूठ को सत्य मानने के लिए मजबूर कर देता है।

बाकी जनता को—
“घर जाओ सब।”

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