अवधेश कुमार | नई दिल्ली 19 नवंबर 2025
सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने ही ऐतिहासिक वना-शक्ति फैसले को वापस लेने का निर्णय भारत की पर्यावरणीय न्यायप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाता है। जस्टिस अभय ओका द्वारा लिखित यह फैसला देश में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सबसे संतुलित और प्रगतिशील निर्णयों में गिना जाता था। इस फैसले ने केंद्र सरकार की उस अधिसूचना को अमान्य कर दिया था, जिसके तहत किसी भी परियोजना को शुरू होने के बाद भी—यानि retrospective environmental clearance—मंजूरी दी जा सकती थी। यानी कोई कंपनी पहले पेड़ काट दे, नदी किनारे निर्माण कर दे, पर्यावरण को नुकसान पहुंचा दे, और बाद में पैसे देकर ‘हरी झंडी’ ले ले—इस अवधारणा को अदालत ने असंवैधानिक माना था।
लेकिन इस ऐतिहासिक फैसले को एक बड़े बेंच ने 2–1 के बहुमत से पलट दिया। यह कदम न सिर्फ कानूनी रूप से विवादास्पद है, बल्कि नैतिक और पर्यावरणीय स्तर पर भी बेहद चिंताजनक है। जस्टिस उज्जल भुइयाँ, जो मूल फैसले देने वाली पीठ का हिस्सा थे, ने इस पुनर्विचार को सुनने वाले बेंच में पहले शामिल ही नहीं किया गया। यह वही बेंच था, जिसकी अगुवाई CJI बी.आर. गवई कर रहे थे और जिसमें रियल एस्टेट डेवलपर्स के सबसे बड़े संगठन CREDAI की पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई हो रही थी। यह तथ्य अपने आप में बताता है कि किस तरह प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे थे। मीडिया में यह तथ्य सामने आते ही जस्टिस भुइयाँ को आनन-फानन में बेंच में जोड़ा गया, लेकिन तब तक कहानी दिशा पकड़ चुकी थी।
इस पुनर्विचार में बहुमत का तर्क चकित करने वाला है। अदालत कहती है कि ऐसी परियोजनाएं, जो पहले से शुरू हो चुकी हैं, उन्हें रोकने से आर्थिक नुकसान होगा, इसलिए शुरुआत के बाद भी पर्यावरण मंजूरी मिलनी चाहिए। यह तर्क उतना ही खतरनाक है जितना सरल दिखता है। इसका सीधा मतलब यह है कि—किसी कंपनी को पहले जंगल काटने की छूट होगी, चाहे पेड़ सौ साल पुराने हों, चाहे पारिस्थितिकी पूरी तरह नष्ट हो जाए; और बाद में वह सरकार को पैसा देकर मंजूरी ले सकती है। इस व्यवस्था में पर्यावरण सुरक्षा एक औपचारिकता और पेड़-पौधे एक ‘कोलेट्रल डैमेज’ बनकर रह जाते हैं।
जस्टिस भुइयाँ ने अपने कड़े असहमति नोट में साफ कहा है कि यह फैसला पर्यावरणीय कानून के बुनियादी सिद्धांतों को ही कमजोर कर देता है और यह “एक खतरनाक पिछड़ा कदम” है। उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया कि यह फैसला न्यायपालिका को ऐसे दिशाहीन क्षेत्र में ले जाता है, जहां कॉरपोरेट लॉबी बार-बार आवेदन देकर मामला उस “सही न्यायाधीश” तक पहुंचा सकती है, जिसकी राय उनके हित में हो। कई कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि यह घटना दिखाती है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में अंतिमता खत्म होती जा रही है—कॉरपोरेट दबाव और अनंत पुनर्विचार याचिकाएं न्याय की प्रक्रिया को कमजोर कर रही हैं।
यह सवाल अब पहले से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है: जब जलवायु संकट चरम पर है, जब पेड़ कटने की दर रिकॉर्ड स्तर पर है, जब हवा जहरीली हो रही है—तब देश का सर्वोच्च न्यायालय पर्यावरण के साथ समझौता करने की अनुमति कैसे दे सकता है? यह फैसला न सिर्फ एक कानूनी चूक है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों से किया गया एक अन्याय भी है। भारत ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम आगे बढ़ाया था—लेकिन अब ऐसा लगता है कि हम उसी राह पर दो कदम पीछे लौट आए हैं।




