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कुंभ के लिए नाशिक में 1,700 पेड़ों पर आरी—एक महीने के सादुग्राम पर दशकों की हरियाली कुर्बान

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अमरनाथ | मुंबई19 नवंबर 2025

महाराष्ट्र के नाशिक में 2027 में होने वाले सिंहस्थ कुंभ मेले की तैयारियों ने एक बड़े पर्यावरणीय विवाद को जन्म दे दिया है। नाशिक महानगरपालिका ने तपोवन क्षेत्र में तकरीबन 1,700 परिपक्व पेड़ों को काटने का प्रस्ताव रखा है, ताकि यहां देशभर से आने वाले साधु–संत और महंतों के लिए अस्थायी ‘सादुग्राम’ बनाया जा सके। प्रशासन का तर्क है कि सादुग्राम में लगभग 3 लाख साधुओं की व्यवस्था करनी होगी, जिसके लिए सड़कें, शौचालय, पानी, बिजली, टेंट शहर और अन्य बुनियादी ढांचे का विकास जरूरी है। इसी आधार पर पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव रखा गया है, हालांकि कुछ पेड़ों को बचाने और “क्षतिपूरक वृक्षारोपण” का दावा भी किया जा रहा है।

लेकिन इस प्रस्ताव के सामने आते ही पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय नागरिक कड़े विरोध में उतर आए हैं। उनका कहना है कि नाशिक के तपोवन क्षेत्र की हरियाली केवल पेड़ नहीं, बल्कि 40–50 वर्ष पुराने जैव–विविधता के केंद्र हैं, जो गोदावरी नदी के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखते हैं। विरोध करने वालों का सवाल है कि जब कुंभ मेला सिर्फ एक महीने का आयोजन है, तो दशकों पुराने हज़ारों पेड़ सिर्फ अस्थायी ढांचे के लिए क्यों काटे जाएं? स्थानीय लोगों ने यह भी तर्क दिया है कि ये पेड़ स्वयं में प्राकृतिक छांव प्रदान करते हैं—जहां साधु-संत पहले से बैठते, तप करते और प्रवचन देते आए हैं—तो फिर इतनी बड़ी संख्या में उन्हें काटने की आवश्यकता क्यों?

पर्यावरण विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि नाशिक शहर पहले से ही प्रदूषण, गर्मी और ऑक्सीजन स्तर में गिरावट से जूझ रहा है। ऐसे में 1,700 पेड़ों की कटाई अप्रतिवर्तनीय नुकसान साबित होगी, जिसके परिणाम आने वाले वर्षों में पूरे शहर को भुगतने पड़ सकते हैं। विरोध कर रहे नागरिकों ने राज्य सरकार और नगर निगम से विकल्प तलाशने की मांग की है—जैसे पेड़ों को बचाते हुए वैकल्पिक भूमि का उपयोग, या संरचना को इस तरह तैयार करना कि प्राकृतिक हरियाली से छेड़छाड़ कम से कम हो।

स्थानीय लोग और पर्यावरण समूह इस मुद्दे पर जल्द निर्णय लेने की मांग कर रहे हैं और इसे मुख्यमंत्री से सीधे हस्तक्षेप योग्य मामला बता रहे हैं। उनका कहना है कि पेड़ लगाना आसान नहीं—उसे बढ़ने में दशकों लगते हैं—लेकिन पेड़ काटने का निर्णय चंद मिनटों में हो जाता है। यही वजह है कि लोग पूछ रहे हैं कि क्या एक महीने के कुंभ आयोजन के लिए पीढ़ियों की हरियाली का बलिदान देना उचित है?

यह मुद्दा अब सोशल मीडिया से लेकर जनसभाओं तक चर्चा का केंद्र बन चुका है। लोग सीधे सवाल उठा रहे हैं:

“जब साधु पेड़ों की छांव में ही तपस्या और प्रवचन करते हैं, तो उन पेड़ों को काटकर ही उनके लिए सादुग्राम क्यों बनाया जा रहा है?”

महाराष्ट्र सरकार और नगर प्रशासन के सामने अब एक बड़ी जिम्मेदारी है—क्या वे धार्मिक आयोजन की सुविधा को प्राथमिकता देंगे या फिर नाशिक की हरियाली और पर्यावरणीय धरोहर को बचाने के लिए संवेदनशील निर्णय लेंगे?

 

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