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तेल से टेक तक: सऊदी में महंगे पैकेजों पर ब्रेक

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अंतरराष्ट्रीय डेस्क 16 नवंबर 2025

सऊदी अरब, जो दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक के रूप में जाना जाता है और जिसकी महत्वाकांक्षी आर्थिक योजना विजन 2030 ने वैश्विक स्तर पर हलचल मचा रखी है, अब अपने आर्थिक चक्र में एक नया और बेहद निर्णायक मोड़ ले रहा है। लंबे समय तक “टैलेंट मैग्नेट” बने रहने के बाद, जहाँ दुनिया भर के उच्च-स्तरीय विशेषज्ञों को दोगुनी-तिगुनी तनख्वाह देकर बुलाया जाता था, अब वही सऊदी कंपनियाँ खर्च को कसने और प्रोजेक्ट प्राथमिकताओं को नया रूप देने में लगी हैं। सालों तक जारी रहे वेतन प्रीमियम—40% तक के बोनस, कई जगह मौजूदा सैलरी को भी दोगुना कर देने वाली पेशकश—अब इतिहास होते जा रहे हैं। चार प्रमुख रिक्रूटर्स के अनुसार, कंपनियों का मूड बदल चुका है; अब वेतन ऑफर तर्कसंगत, सीमित और नई आर्थिक वास्तविकताओं पर आधारित हैं।

विजन 2030 का मूल लक्ष्य था—तेल आय पर निर्भरता कम करना, लाखों नौकरियाँ पैदा करना, और पर्यटन, रियल एस्टेट, खनन, वित्तीय सेवाओं, लॉजिस्टिक्स व उभरती तकनीकों जैसे AI में नई अर्थव्यवस्था गढ़ना। इस महत्वाकांक्षा के चलते सऊदी अरब ने पिछले एक दशक में सैकड़ों अरब डॉलर के मेगा-प्रोजेक्ट्स शुरु किए—NEOM जैसी 500 अरब डॉलर की भविष्यवादी स्मार्ट सिटी, और Trojena जैसी पर्वतीय टूरिज़्म परियोजनाएँ जो 2029 एशियाई विंटर गेम्स की मेजबानी करेंगी। इन प्रोजेक्ट्स के चलते उच्च-कौशल विदेशी कामगारों की मांग कई गुना बढ़ गई थी। लेकिन जब प्रोजेक्ट धीमे पड़े, लागतें बढ़ीं, और वैश्विक बाजार की सच्चाइयों ने वित्तीय दबाव बढ़ाया, तब सऊदी सरकार और उसकी प्रमुख फंडिंग संस्था—$925 बिलियन का पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड (PIF)—ने अपने निवेश का पुनर्मूल्यांकन शुरू किया।

सऊदी अरब में अब वेतन पॉलिसी का बदलना सिर्फ कंपनियों की मजबूरी नहीं, बल्कि बड़े आर्थिक पुनर्गठन का संकेत भी है। PIF, जिसने पहले बड़े पैमाने पर इन्फ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट क्षेत्रों में धन लगाया था, अब इन्हीं क्षेत्रों के बजट में कटौती कर रहा है। फ़ोकस तेजी से AI, खनन, डिजिटल इकोनॉमी और लॉजिस्टिक्स की ओर जा रहा है—वे क्षेत्र जहाँ अपेक्षाकृत कम लागत में अधिक रिटर्न संभव है। इस बदलाव के चलते NEOM और अन्य PIF-समर्थित परियोजनाओं में देरी हुई है और नई भर्तियाँ लगभग आधी रह गई हैं। Recruitment अवसरों में यह गिरावट सीधे तौर पर उन हजारों विदेशी पेशेवरों को प्रभावित कर रही है जो इस दशक की शुरुआत में दुबई, अबू धाबी, यूरोप, एशिया और अमेरिका से भारी-भरकम पैकेज पर सऊदी आए थे।

जब वेतन तेजी से बढ़ रहे थे, तब दुबई में $60,000 कमाने वाले एक प्रोजेक्ट मैनेजर को सऊदी में $100,000 का ऑफर मिल जाता था। लेकिन अब यह “सोने का युग” खत्म हो रहा है। दुबई की तुलना में सऊदी वेतन का अंतर मात्र 5-8% रह गया है। रिक्रूटर्स का कहना है कि UAE की मजबूत स्कूलिंग, पक्की सामाजिक संरचना, लचीला जीवनशैली और टैक्स-फ्री बिजनेस वातावरण—इन सब वजहों से आज भी उत्कृष्ट प्रतिभा UAE में रहना अधिक पसंद करती है। इसलिए सऊदी के पास उच्च वेतन का हथियार पहले जैसा प्रभावी नहीं रहा। Boyden के मैग्डी अल ज़ेन कहते हैं—“अब सऊदी नियोक्ता वेतन को लेकर कहीं ज्यादा कठोर हैं, और उम्मीदवारों की सप्लाई बढ़ने से कंपनियाँ आराम से सौदे कर रही हैं।”

दूसरी ओर, तेल कीमतें गिरने और उत्पादन में कटौती करने के फैसलों ने सऊदी के वित्तीय दबाव को बढ़ा दिया है। IMF का अनुमान है कि सऊदी बजट संतुलन के लिए तेल का भाव लगभग $100 प्रति बैरल चाहिए—जबकि बाजार इससे नीचे है। इसका असर भर्ती, प्रोजेक्ट टाइमलाइन और विदेशी टैलेंट की लागत पर साफ़ दिख रहा है। Kamco Invest के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में सऊदी प्रोजेक्ट अवार्ड्स पहली नौ महीनों में लगभग आधे रह गए—जो सीधे रोजगार और वेतन बाजार को प्रभावित करता है।

परिदृश्य का दूसरा पहलू यह है कि सऊदी अरब के अंदरूनी श्रम बाज़ार में भारी उथल-पुथल और सुधार जारी हैं। सरकारी प्रयासों से निजी क्षेत्र में सऊदी नागरिकों की भागीदारी 2016 से 2025 के बीच 31% बढ़ गई है। बेरोजगारी ऐतिहासिक न्यूनतम स्तर पर है। इससे विदेशियों के लिए प्रतिस्पर्धा तेज हुई है, और कंपनियाँ अब “हॉट जॉब्स”—AI, डिजिटल, और उभरती तकनीकों—पर ही पैसा लगा रही हैं। Tuscan Middle East के CEO हसन बातत कहते हैं—“जब प्रोजेक्ट धीमे पड़ते हैं, कंपनियाँ वेतन पर पहले से ज्यादा मोलभाव करती हैं।”

फिर भी, सऊदी अरब की ग्रोथ दर (4.4%) इसे वैश्विक प्रतिभा के लिए अभी भी आकर्षक बनाती है—खासकर उन देशों के पेशेवरों के लिए जहाँ अर्थव्यवस्था धीमी है और मुद्रास्फीति बढ़ रही है। Matches Talent की CEO लुईज़ नुट्सन के अनुसार, अब सऊदी कंपनियाँ वेतन पैकेज को भावनाओं या प्रतिष्ठा के बजाय डेटा, प्रदर्शन, बाज़ार के रियल बेंचमार्क और लागत संरचना पर आधारित कर रही हैं। यह परिवर्तन भले ही कई लोगों को सख्ती लगे, लेकिन यह एक “परिपक्व अर्थव्यवस्था” की ओर बढ़ने का संकेत है—जहाँ भावनात्मक खर्च की जगह स्मार्ट निवेश को वरीयता दी जाती है।

सऊदी अरब के लिए चुनौती स्पष्ट है—अगर वह दुनिया का सर्वश्रेष्ठ टैलेंट आकर्षित करना चाहता है, तो उसे सिर्फ वेतन ही नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता, परिवार के लिए स्थिरता, अंतरराष्ट्रीय स्कूलों, स्वास्थ्य सेवाओं और सांस्कृतिक लचीलापन जैसे पहलुओं को भी मजबूत बनाना होगा। नहीं तो UAE जैसे देशों की चमक और व्यवस्था शीर्ष प्रतिभा को खींचती रहेगी, और सऊदी की नई आर्थिक महत्वाकांक्षाएँ अपनी अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाएँगी।

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