पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत को ‘बच्चों का देश’ कहा था, और उनकी कल्पना में बच्चे राष्ट्र की सबसे मूल्यवान संपत्ति थे। बाल दिवस के अवसर पर हमें यह स्वीकार करना होगा कि वह आदर्श भारत आज उस कल्पना से काफी दूर खड़ा नजर आता है, जहां शिक्षा, सुरक्षा और पोषण जैसी बुनियादी जरूरतें लाखों बच्चों के लिए एक दूर का सपना मात्र बनकर रह गई हैं। नेहरू ने 1950 के दशक में भारतीय शिक्षा प्रणाली की जो मजबूत बुनियाद रखी थी—जिसमें आईआईटी, एआईआईएमएस और राष्ट्रीय विज्ञान संस्थानों जैसी संस्थाओं की स्थापना शामिल थी—वे न केवल ज्ञान के केंद्र बने बल्कि राष्ट्र निर्माण के आधार स्तंभ भी साबित हुए। लेकिन आज, 2025 में, हम एक विरोधाभासी स्थिति में हैं। विकास के दावे तो किए जा रहे हैं लेकिन बच्चों की बुनियादी शिक्षा पर निवेश कम हो रहा है, जिससे सामाजिक असमानता और गहरा रही है, और नेहरू के सिद्धांतों से एक बड़ा विचलन (Deviation) दिखाई देता है।
शिक्षा संकट: 1.2 मिलियन शिक्षकों की कमी और बजट में कटौती
शिक्षा का क्षेत्र वर्तमान में एक राष्ट्रीय संकट का सामना कर रहा है। यूनेस्को के आंकड़ों के अनुसार भारत को आने वाले वर्षों में 1.2 मिलियन शिक्षकों की भारी कमी का सामना करना पड़ सकता है। 2023-24 के आंकड़ों से पता चलता है कि देश में लगभग 1.1 लाख एकल-शिक्षक स्कूल हैं जो लगभग 33 लाख छात्रों को पढ़ा रहे हैं, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता पर गहरा और अपूरणीय असर पड़ रहा है।
कई सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं जैसे शौचालय, पीने का पानी और विज्ञान प्रयोगशालाएं तक उपलब्ध नहीं हैं, और यह कमी विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक स्पष्ट है जहां बच्चे दूर-दराज के इलाकों से आते हैं। नेहरू की सोच थी कि शिक्षा राष्ट्र की रीढ़ है, लेकिन वर्तमान में शिक्षा बजट GDP का मात्र 2.7% से 4.6% के बीच ही आवंटित हो रहा है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार इसे 6% तक पहुंचना चाहिए।
चिंताजनक रूप से, 2024-25 के बजट में उच्च शिक्षा के लिए आवंटन में 17% की कटौती देखी गई है। यह कटौती सीधे तौर पर नेहरू के विज्ञान और शिक्षा पर जोर देने वाले दृष्टिकोण के विपरीत है, जिसके परिणामस्वरूप न केवल छात्रों की संख्या बढ़ रही है बल्कि ड्रॉपआउट दर भी ऊंची बनी हुई है, जहां 2023-24 में प्राथमिक स्तर पर 2.1 मिलियन बच्चे स्कूल छोड़ चुके हैं।
सुरक्षा का प्रश्न: सड़क हादसे और मानसिक स्वास्थ्य का बढ़ता दबाव
आज के भारत में बच्चों की सुरक्षा एक और बड़ा और गंभीर संकट है। नेहरू ने बच्चों को राष्ट्र की सबसे मूल्यवान संपत्ति माना था और उनके लिए बाल भवन जैसी संस्थाएं बनाईं ताकि उनका बचपन रचनात्मकता और खुशी से भरा हो। लेकिन वास्तविकता यह है कि हर साल सड़क हादसों में लगभग 9,000 से 10,000 बच्चे अपनी जान गंवा देते हैं। 2023 में कुल सड़क दुर्घटनाओं में हुई 172,000 मौतों में बच्चों का एक बड़ा हिस्सा शामिल है। ये हादसे मुख्य रूप से खराब सड़कों, अव्यवस्थित यातायात और असुरक्षित स्कूल परिवहन के कारण होते हैं।
वैश्विक स्तर पर देखें तो निम्न और मध्यम आय वाले देशों में सड़क हादसों से 1.8 लाख बच्चों और किशोरों की मौत होती है, जिसमें भारत का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि विकास मॉडल में इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर देते हुए भी बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जा रही है। यह समस्या सिर्फ शारीरिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़ी हुई है।
समाज की अपेक्षाएं बच्चों पर अत्यधिक दबाव डाल रही हैं, उन्हें उनकी व्यक्तिगत प्रतिभा को समझे बिना डॉक्टर या इंजीनियर बनने के लिए मजबूर कर रही हैं। यह दबाव बच्चों में तनाव और डिप्रेशन को बढ़ा रहा है, जो नेहरू की उस सोच के विपरीत है जहां उन्होंने कहा था कि बच्चों के मन को खुला छोड़ना चाहिए ताकि वे स्वतंत्र रूप से सीख सकें।
पोषण और स्वास्थ्य: मिड-डे मील योजना में 40% की वास्तविक कटौती
पोषण और स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। मिड-डे मील योजना (जो अब पीएम पोषण के नाम से जानी जाती है) पिछले दस वर्षों में केंद्रीय बजट में 40% की वास्तविक कटौती का शिकार हुई है। 2021-22 में इसमें 10.8% की कमी देखी गई, जबकि मुद्रास्फीति के कारण भोजन की लागत लगातार बढ़ रही है। इस कारण कई राज्यों में बच्चों को अंडे, फल या अन्य आवश्यक पोषक आहार प्रदान करने में कठिनाई हो रही है। एक राज्य सरकार ने तो अदालत में यह तक कह दिया कि वे ऐसी बढ़ी हुई लागत वहन नहीं कर सकते।
यह योजना मूल रूप से बच्चों को स्कूल आने के लिए प्रोत्साहित करने और कुपोषण से लड़ने के लिए शुरू की गई थी, लेकिन बजट कटौतियों से इसका प्रभाव कम हो रहा है, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में जहां लाखों बच्चे आज भी कुपोषित हैं। यह स्पष्ट है कि विकास का वर्तमान मॉडल आर्थिक वृद्धि पर केंद्रित है न कि मानव विकास पर।
एक्सप्रेसवे और गगनचुंबी इमारतें बन रही हैं, लेकिन स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं और बच्चों का पोषण उपेक्षित है। बाल दिवस को सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन बनाना चाहिए, जहां हम नेहरू के सपनों को याद करें और उन्हें वास्तविकता में बदलने के लिए नीतियां बनाएं, क्योंकि यदि हम बच्चों को सुरक्षित, शिक्षित और पोषित नहीं कर पाए तो “विकसित भारत 2047” का दावा खोखला साबित होगा।




