समी अहमद | पटना 13 नवंबर 2025
बिहार में विधानसभा चुनावों के नतीजे आने से पहले जिस तरह की राजनीतिक हलचल दिखाई दे रही है, वह भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़े एक बड़े संकट की ओर इशारा करती है। चुनाव प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही राजनीतिक दलों का अपनी-अपनी रणनीति में जुट जाना बताता है कि हमारे यहां चुनाव अब केवल जनता के मतदान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि “मतदान के बाद की राजनीति” ज्यादा निर्णायक बनती जा रही है। तेजस्वी यादव द्वारा अपने सभी उम्मीदवारों से व्यक्तिगत संपर्क कर उन्हें “हर परिस्थिति” के लिए तैयार रहने को कहना इस बात का संकेत है कि विपक्ष को अपनी जीत के साथ-साथ अपने विधायकों को “सुरक्षित रखने” की चिंता भी उतनी ही है। यह चिंता अचानक नहीं आई—हाल के वर्षों में देश के कई राज्यों में ‘पोस्ट-पोल मैनेजमेंट’ ने असली बहुमत को बदलते हुए देखा है, और यही कारण है कि बिहार में भी विधायकों को शिफ्ट करने की तैयारी की खबरें सामने आ रही हैं।
दूसरी ओर जेडीयू के दफ्तर में लगा पोस्टर—“टाइगर जिंदा है”—सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और सत्ता में वापसी के दावे का प्रतीक है। एनडीए की ओर से केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का यह दावा कि उन्हें “2010 से बड़ा बहुमत” मिलेगा, राजनीतिक माहौल को और ज्यादा एकतरफा बनाने की कोशिश है। लेकिन इन बयानों और नारों के बीच जो सवाल दब जाता है, वह यह कि जब चुनाव आयोग मतगणना के दिन से पहले नतीजों का कोई अनुमान नहीं देता, तो राजनीतिक दल क्यों पहले से खुद को विजेता घोषित करने लगते हैं? यह राजनीतिक मनोविज्ञान मतदाताओं और जनता दोनों पर अनावश्यक दबाव बनाता है। लोकतंत्र में परिणाम जनता तय करती है, लेकिन आज की राजनीति में ऐसा लगता है मानो राजनीतिक दल ही जनता के फैसले से पहले अपनी जीत लिख देना चाहते हों।
चुनावी प्रक्रिया की संवेदनशीलता को देखते हुए चुनाव आयोग द्वारा वीवीपैट मशीन बदले गए मतदान केंद्रों पर पहले पर्ची मिलान करवाने का निर्णय बेहद महत्वपूर्ण है। यह कदम पारदर्शिता और भरोसे की दिशा में मजबूत संकेत देता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस पारदर्शिता को राजनीतिक पार्टियाँ भी उतनी गंभीरता से ले रही हैं, जितनी जनता ले रही है? जब कुछ दल 80 लाख वोट चोरी का आरोप लगाते हैं, तो यह दावा चुनावी प्रक्रिया में विश्वास को हिलाने का काम करता है। आरोप सच हों या राजनीतिक रणनीति—इनका प्रभाव पूरे चुनावी तंत्र की विश्वसनीयता पर पड़ता है। और अगर चुनावी प्रणाली पर विश्वास टूटने लगे, तो लोकतंत्र किस जमीन पर खड़ा रहेगा?
महिलाओं का रिकॉर्ड मतदान बिहार की राजनीतिक तस्वीर का सबसे बड़ा सामाजिक संकेत है। महिलाओं ने कई जिलों में पुरुषों से कहीं अधिक वोटिंग की है—कुछ जगहों पर तो 14% तक का अंतर। यह इस बात का प्रमाण है कि बिहार की महिलाएँ अब सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं। जो भी सरकार बनेगी, उसे यह याद रखना चाहिए कि बिहार की राजनीति अब “पुरुष केंद्रित” नहीं रही। महिलाओं की यह भागीदारी राज्य की सामाजिक संरचना में बदलती प्राथमिकताओं को दर्शाती है, और यही भविष्य में राजनीतिक विमर्श का केंद्र भी बनेगा।
और अंत में—कांग्रेस को हरियाणा की याद आने का अर्थ सिर्फ इतना नहीं कि एग्जिट पोल्स गलत साबित हो सकते हैं। इसका असली अर्थ यह है कि एग्जिट पोल भारतीय राजनीति की विश्वसनीयता को बार-बार चुनौती देते हैं। यह सच है कि कई बार एग्जिट पोल्स का अंतर जमीन पर दिखने वाले राजनीतिक समीकरणों से बिल्कुल उलटा निकलता है। इसलिए तेजस्वी हों, नीतीश हों या कोई और—असली परीक्षा मतगणना वाले दिन ही होगी।
बिहार की चुनावी तस्वीर इस समय जितनी उलझी हुई है, उतनी ही रोचक भी। लेकिन इस हलचल के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लोकतंत्र का सम्मान केवल मतदान से नहीं, बल्कि परिणाम स्वीकार करने की परिपक्वता से होता है। यह परिपक्वता राजनीतिक दलों में कितनी है, इसका जवाब 14 नवंबर को सामने आ जाएगा—जब सत्ता की राजनीति नहीं, बल्कि जनता का फैसला बोलता दिखेगा।




