मुंबई 13 नवंबर 2025
महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल मेलघाट क्षेत्र से आई यह खबर किसी भी संवेदनशील समाज को झकझोर देने के लिए काफी है। जून 2025 से अब तक यहां 65 नवजात शिशुओं की कुपोषण से मौत हो चुकी है। एक तरफ सरकारें विकास की दौड़ में अपनी पीठ थपथपा रही हैं, बड़े-बड़े भाषणों में ‘अमृतकाल’, ‘विकसित भारत’ और ‘सबका विकास’ जैसे नारे गूंज रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इस देश के सबसे गरीब और हाशिए पर खड़े समुदाय के बच्चे भोजन और पोषण की कमी से दुनिया से जा रहे हैं। यह सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं और संवेदनाओं की गहरी विफलता को उजागर करने वाला राष्ट्रीय शर्म का प्रतीक है।
अदालत ने इस मसले पर बेहद गंभीर टिप्पणी की है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि राज्य का रवैया “बेहद लापरवाह” है और सरकार को स्थिति से व्यथित होना चाहिए। कोर्ट ने बताया कि मेलघाट जैसे आदिवासी क्षेत्रों में गंभीर कुपोषण की समस्या नई नहीं है, वर्षों से इन इलाकों में मातृ मृत्यु, शिशु मृत्यु और गर्भवती व स्तनपान कराने वाली महिलाओं में कुपोषण के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। इसके बावजूद स्वास्थ्य सुविधाएं, पोषण कार्यक्रम, डॉक्टरों की उपलब्धता और सरकारी योजनाओं का ज़मीनी असर बेहद कम है।
सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि इतनी भयावह खबर भी राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में नहीं आई। ये मौतें न कोई टीवी पर बहस बनीं, न अखबारों के पहले पन्ने पर जगह मिली। ‘अमर उजाला’ के पेज 11 पर छपी यह रिपोर्ट इस बात का प्रतीक है कि देश की बड़ी मीडिया कंपनियों की नज़र में भूख से मरते बच्चे कोई “बड़ी खबर” नहीं हैं, क्योंकि इससे टीआरपी नहीं मिलती और न ही सत्ता के लिए कोई राजनीतिक अवसर पैदा होता है।
यह विडंबना किसी काले हास्य से कम नहीं कि महाराष्ट्र में विकास के नाम पर सत्ता परिवर्तन की राजनीति कितनी तेजी से होती रही। सत्ता की कुर्सी को लेकर दल बदले, विधायक खरीदे गए, सरकारें पलटीं—उप-मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री बने और मुख्यमंत्री उप-मुख्यमंत्री—लेकिन मेलघाट के बच्चों की भूख नहीं बदली। गरीब और गरीब होते गए, और सरकार ‘विकास’ के नाम पर राजनीतिक फसल काटती रही।
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने इस पर तीखा व्यंग किया है। उन्होंने कहा, “काश महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार होती, तब कम से कम कई दिनों तक 65 आदिवासी बच्चों की मौत पर मीडिया में चर्चा तो होती।”
यह टिप्पणी सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि भारतीय मीडिया की आज की हालत का आईना है—जहां सच्चाई मुद्दा नहीं, बल्कि सत्ता का एजेंडा प्राथमिकता है।
अदालत ने सुनवाई के दौरान यह भी सुझाव दिया कि आदिवासी क्षेत्रों में डॉक्टरों को अधिक वेतन दिया जाए ताकि वहां विशेषज्ञ और आम चिकित्सक रुके रहें। कोर्ट ने कहा कि वर्षों से हालत जस की तस है, और सरकार केवल कागज़ी आश्वासन देती है, ज़मीनी स्तर पर स्थिति में कोई वास्तविक सुधार नहीं हो रहा।
इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारत जैसे देश में, जहां प्रतिदिन ‘विकास’ और ‘आत्मनिर्भरता’ के ढोल पीटे जाते हैं, वहां एक बच्चे को भी कुपोषण से मरना नहीं चाहिए—लेकिन यहां एक नहीं, 65-65 मासूम अपनी जान गंवा रहे हैं। यह हमारे शासन तंत्र, प्रशासन, स्वास्थ्य व्यवस्था और मीडिया—सभी की सामूहिक विफलता का प्रमाण है।
आज यह खबर सिर्फ आंकड़ा नहीं है—यह उस लोकतंत्र की करुण कहानी है जिसने ‘विकास’ की राजनीति में अपने सबसे कमजोर नागरिकों को भूलकर उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया। प्रश्न सिर्फ 65 बच्चों का नहीं—यह सवाल है कि क्या भारत के विकास मॉडल में गरीब बच्चे बचे ही नहीं?सरकार को हाई कोर्ट की फटकार के बाद अब केवल आश्वासन नहीं, ठोस और तात्कालिक कार्रवाई करनी ही होगी—वरना मेलघाट जैसी जगहें कुपोषण की कब्रगाह बनती रहेंगी।




