सासाराम की वह रात साधारण रात नहीं थी। शहर गहरी नींद में डूबा हुआ था, सड़कों पर सन्नाटा पसरा था, और पूरा माहौल ऐसा था जैसे सब कुछ सामान्य हो। लेकिन इस गहरी चुप्पी के पीछे एक तूफान खड़ा हो रहा था। ठीक रात के 3 बजे, जब लोग अपने घरों में चैन से सो रहे थे और पूरे इलाके में कोई हलचल नहीं थी, तभी अचानक एक संदिग्ध ट्रक मतगणना केंद्र की ओर बढ़ता हुआ दिखाई देता है। यह वह समय है जब आम तौर पर किसी भी आधिकारिक गतिविधि की अनुमति नहीं होती। लेकिन प्रशासन की ओर से न कोई रोक-टोक, न कोई पूछताछ, न कोई जांच—ट्रक को सीधे अंदर जाने दिया गया, मानो पहले से तय योजना के तहत यह सब हो रहा हो। इसी पल कई कार्यकर्ताओं के मन में शक पैदा हुआ कि सासाराम में चुनावी खेल किसी अंधेरी स्क्रिप्ट के तहत चल रहा है।
आश्चर्य तो इस बात का था कि जैसे ही राजद के कार्यकर्ताओं ने ट्रक को अंदर जाते देखा और मौके पर पहुंचे, प्रशासन ने उन्हें कोई जवाब नहीं दिया। सभी अधिकारी मौन थे, कोई यह बताने को तैयार नहीं था कि इस ट्रक में क्या है, क्यों आया है और किसके आदेश पर इसे बिना जांच अंदर जाने दिया गया। स्थिति और संदिग्ध तब हुई जब देखते ही देखते प्रशासन ने ट्रक ड्राइवर को मौके से भगा दिया, जैसे उसकी मौजूदगी का सच सामने आ जाए तो पूरा मामला उजागर हो जाएगा। ड्राइवर के गायब होते ही राजद के कार्यकर्ताओं ने अपने अन्य साथियों को बुलाया और मौके पर भीड़ बढ़ने लगी। जैसे-जैसे लोग पहुंचते गए, प्रशासन की बेचैनी बढ़ती गई, और उसी क्षण एक ऐसा कदम उठाया गया जिसने पूरे मामले को वोट चोरी कांड की शक्ल दे दी—CCTV कैमरे बंद कर दिए गए।
CCTV बंद होते ही लोगों में गुस्सा और अविश्वास बढ़ गया। सवाल उठने लगे कि आखिर कैमरे बंद करने की जरूरत क्यों पड़ी? किस बात का डर था? रात के अंधेरे और बंद कैमरों की आड़ में ट्रक से कितनी EVM मशीनें अंदर ले जाई गईं, यह आज तक किसी को नहीं पता। जो लोग उस समय वहां मौजूद थे, उनका कहना है कि “यही वो समय था जब पूरा खेल खेला गया।” बाहर खड़े लोगों में से कई ने यह दावा किया कि जैसे ही कैमरे बंद हुए, प्रशासनिक अधिकारियों की आवाजाही बढ़ गई और परिसर के अंदर काफी हलचल शुरू हो गई। उस वक्त ‘वोट चोरी’ के नारे लगने लगे, पर दावा है कि तब तक सब कुछ तय हो चुका था—पूरा कांड अंजाम दिया जा चुका था।
इसके थोड़ी देर बाद DM और SDM मौके पर पहुंचे। भीड़ को शांत करने के बजाय वे सीधे ट्रक को बाहर निकालने के निर्देश देते हैं। जब ट्रक को बाहर लाकर खोला गया तो बॉक्स खाली पाया गया। लेकिन जनता का सवाल वही रहा—जब कैमरे बंद थे तब क्या निकाला गया था? क्या वास्तविक EVM पहले ही बदल दी गई थी? यह शक इसलिए भी पुख्ता हुआ क्योंकि प्रशासन लगातार पारदर्शिता से बचता रहा। इसी बीच राजद, जनसुराज और कुछ निर्दलीय प्रत्याशी भी मौके पर पहुंच गए और सभी ने एक ही मांग की—CCTV फुटेज दिखाया जाए और उस ट्रक की एंट्री-एग्जिट रिकॉर्डिंग सार्वजनिक की जाए। लेकिन DM ने यह कहकर फुटेज देने से साफ इनकार कर दिया कि “यह संभव नहीं है।” यही इनकार इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा संकेत है कि सच्चाई को जानबूझकर छिपाया जा रहा था।
इसके बाद जो हुआ वह और ज्यादा चौंकाने वाला था। SDM और DM दोनों ने सभी प्रत्याशियों और कार्यकर्ताओं को धमकाया कि ज्यादा आवाज उठाने पर कार्रवाई की जाएगी। लोकतंत्र में पारदर्शिता की मांग पर धमकी मिलना किसी भी व्यक्ति को यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि प्रशासन किसके दबाव में काम कर रहा था। जब गुस्सा बढ़ने लगा तो प्रशासन ने राजद कार्यकर्ताओं पर लाठीचार्ज कर दिया। उन्हें मौके से खदेड़ दिया गया ताकि परिसर फिर से पूरी तरह प्रशासन के नियंत्रण में आ सके। भीड़ हटते ही, जैसे कि उन कार्यकर्ताओं का दावा है, अंधेरे का फायदा उठाकर ओरिजिनल EVM मशीनें गायब कर दी गईं—और यही इस कांड का सबसे गंभीर आरोप है।
रात के 3 बजे की यह गतिविधि महज़ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक संगठित प्रयास का संकेत देती है। लोग कहते हैं कि दिन में कानून चलता है, लेकिन रात में वोट चोरों का गिरोह चलता है, और सासाराम में यही हुआ। लोकतंत्र की रक्षा कैमरों के पीछे नहीं, ईमानदार कार्यवाही के पीछे होती है। लेकिन जब कैमरे ही बंद कर दिए जाएं, और जानकारी देने से इनकार कर दिया जाए, तो संदेह आरोप में बदल जाता है।
यह घटना न सिर्फ सासाराम के लिए बल्कि पूरे बिहार चुनाव के लिए एक गहरी चेतावनी है। यह बताती है कि चुनावी प्रक्रिया पर किस तरह की शक्तियाँ कब्जा जमाने की कोशिश कर रही हैं। लोकतंत्र को रात के अंधेरे में होने वाले ऐसे कृत्यों से बचाना अब वक्त की जरूरत है।





