नई दिल्ली 11 नवंबर 2025
नोएडा के निठारी गांव में 2005–2006 के बीच सामने आया वह भयावह कांड, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था, आज फिर एक बार चर्चा में है—और इस बार वजह वही सुरेंद्र कोली है, जिसे कभी अदालतों ने “मानवता के लिए खतरा”, “दरिंदा” और “जघन्य अपराधों का साक्षात रूप” तक कहा था। कोली को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर रिहा कर दिया गया है। जी हाँ—वही कोली, जिस पर बच्चों के अपहरण, बलात्कार, हत्या और यहाँ तक कि नरभक्षण तक के आरोप साबित हुए थे। वही कोली, जिसे निचली अदालत ने फाँसी, हाईकोर्ट ने उम्रकैद और अब सुप्रीम कोर्ट ने “अपर्याप्त सबूतों” का हवाला देकर रिहाई दे दी। इस फैसले ने न्याय व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस फैसले ने देश में गहरा आक्रोश पैदा कर दिया है। सवाल यह है कि क्या न्याय की प्रक्रिया इतनी कमजोर और बिखरी है कि एक ऐसा व्यक्ति, जिसे भारत की सबसे भयावह हत्याओं में दोषी करार दिया गया था, वह आज आज़ाद घूम सके? निठारी के परिवार आज भी उस दर्द को बयान करते हैं, जब उनके बच्चों की लाशें टुकड़ों में बरामद हुई थीं। घरों के पीछे से हड्डियाँ, अंग और कपड़े निकले थे—यह सिर्फ एक क्राइम सीन नहीं था, बल्कि भारतीय न्यायव्यवस्था की संवेदनशीलता की परीक्षा थी। लेकिन आज उसी घटनाक्रम के मुख्य आरोपी को रिहा होते देख पीड़ित परिवार आरोप लगा रहे हैं कि “न्याय ने हमारी पीठ में छुरा घोंपा है।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए रिहाई का आदेश दिया कि अभियोजन पक्ष पर्याप्त वैज्ञानिक व कानूनी प्रमाण पेश नहीं कर पाया। लेकिन देश पूछ रहा है—तो फिर पिछले 18 साल तक अदालतें किसके आधार पर फैसले देती रहीं? अगर सबूत नहीं थे तो फाँसी कैसे दी गई? अगर सबूत थे तो आज रिहाई क्यों? क्या यह न्याय प्रक्रिया की असफलता है, या फिर एक ऐसा न्यायिक मूल्यांकन जो समाज और पीड़ितों की पीड़ा को अनदेखा कर गया?
सुरेंद्र कोली का मामला सिर्फ एक क्रिमिनल केस नहीं था; यह आधुनिक भारत के सामाजिक डर, प्रशासनिक तंत्र की विफलता और पुलिस जांच में मौजूद कड़ियों की असलियत को उजागर करने वाला केस था। निठारी में बच्चों की गुमशुदगी और हत्या ने उस दौर में पुलिस की लापरवाही को भी बेनकाब किया था। माता-पिता महीनों तक थानों के चक्कर लगाते रहे, लेकिन पुलिस ने हर शिकायत को “बच्चे भाग गए होंगे” कहकर टाल दिया था। फिर जब निठारी के कूलर पंप, नालियों और घर के पिछवाड़े से शवों के अवशेष निकले—तब पूरा तंत्र हिल गया था।
अब जब देश इस दरिंदे को जेल की सलाखों के पीछे देखने का आदी हो चुका था, ऐसे में उसका बाहर आना न केवल पीड़ितों के लिए सदमा है, बल्कि न्याय व्यवस्था पर अविश्वास का बड़ा कारण भी बन रहा है। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक, एक ही सवाल उठ रहा है—
“अगर निठारी जैसा सामूहिक अपराध भी दोषियों को जेल में न रख सके, तो आम आदमी के बच्चे कितने सुरक्षित हैं?”
कई कानूनी विशेषज्ञ भी कह रहे हैं कि यह मामला भारत के क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में मौजूद गहरी खामियों का आईना बनकर खड़ा हो गया है। पुलिस जांच में खामियां, वैज्ञानिक तरीकों का अभाव, गवाहों की कमजोर सुरक्षा और वर्षों लंबी केस प्रक्रियाएं—इन सबका नतीजा आज देश एक खतरनाक रूप में देख रहा है।
पीड़ित परिवारों ने फैसले की समीक्षा की मांग की है। उनका कहना है कि “हमने बच्चों की लाशें उठाई थीं, उनके कपड़े पहचानकर रो-रोकर गिर पड़े थे, हमारे घरों की खुशियाँ हमेशा के लिए गायब हो गईं… और आज अदालत कह रही है कि सबूत कम हैं?”
यह वही सवाल है जो देश की जनता पूछ रही है—
क्या न्याय केवल कागजी सबूतों का खेल है? क्या सैकड़ों परिवारों की चीखें अदालत के लिए सबूत नहीं? आज इस फैसले ने कानून, व्यवस्था और संवेदना के संतुलन को सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है। निठारी की सड़कों पर उठी वे चीखें अभी तक शांत नहीं हुई थीं—और अब इस रिहाई ने घाव फिर से हरा कर दिया है। अगर ऐसे दरिंदे भी कानून की पकड़ से छूटने लगें, तो क्या आम आदमी न्याय में भरोसा रखेगा, मी लॉर्ड?




