नई दिल्ली 10 नवंबर 2025
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महिला प्रतिनिधित्व से जुड़े देश के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों में से एक पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी करके पूरे राजनीतिक और सामाजिक विमर्श को हिला दिया। कांग्रेस नेता जया ठाकुर की उस याचिका पर सुनवाई करते हुए, जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण तुरंत लागू करने की मांग की गई है, जस्टिस बी.वी. नागरत्न और जस्टिस आर. महादेवन की दो-न्यायाधीशीय पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा कि आखिर सरकार नए परिसीमन (Delimitation) का इंतजार क्यों कर रही है, जबकि संविधान में राजनीतिक समानता का अधिकार स्पष्ट रूप से हर नागरिक को दिया गया है। बेंच ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा—“संविधान की प्रस्तावना बताती है कि हर नागरिक को सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समानता का अधिकार है। इस देश की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक कौन है? महिला—48%… यह राजनीतिक समानता का मामला है।” अदालत की यह टिप्पणी सिर्फ एक कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि देश में महिलाओं की हिस्सेदारी पर गंभीर विमर्श की शुरुआत भी है।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने दलील देते हुए कहा कि भारत की आज़ादी के 75 साल बाद भी महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है—यह किसी भी सभ्य लोकतंत्र के लिए शर्मनाक स्थिति है। उन्होंने कहा कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम को राष्ट्रपति की मंजूरी 28 सितंबर 2023 को मिल गई थी, संसद के विशेष सत्र में कानून पारित भी हो चुका है, लेकिन वास्तविकता यह है कि इस कानून का लाभ देश की करोड़ों महिलाओं को अभी भी नहीं मिल रहा। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को याद दिलाया कि महिला आरक्षण को लागू करने से पहले जनगणना और परिसीमन अनिवार्य बनाने का प्रावधान असंवैधानिक, अनुचित और अनावश्यक है। यह महिलाओं की समानता को भविष्य की किसी अनिश्चित प्रक्रिया से बांध देना है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को गंभीरता से लेते हुए केंद्र से पूछा कि परिसीमन अभ्यास कब होगा और क्यों इस मुद्दे को बार-बार ढकेलने की कोशिश की जा रही है। जस्टिस नागरत्न ने साफ कहा—“कानून लागू कराना कार्यपालिका (Executive) की जिम्मेदारी है। हम आदेश नहीं दे सकते, लेकिन हम सरकार से जवाब जरूर मांग सकते हैं।” पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए कहा कि वे स्पष्ट रूप से बताएँ कि महिला आरक्षण को लागू करने में देरी क्यों हो रही है, जबकि संसद द्वारा पारित कानून पहले से उपलब्ध है।
इस मामले की जड़ में वही बहस है जो पिछले कई दशकों से भारतीय लोकतंत्र को झकझोर रही है—भारत जैसे विशाल देश की राजनीति में महिलाएँ अभी भी बहुत कम नजर आती हैं। संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी अभी भी 15% से कम है, कई राज्य विधानसभाओं में तो यह 10% भी नहीं पहुँचती। जबकि आंकड़े बताते हैं कि भारत की कुल जनसंख्या में महिलाएँ लगभग 48.5% हैं। कई अध्ययनों ने यह भी साबित किया है कि जब महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलता है, तो पंचायतों से लेकर संसद तक, नीतियों की दिशा में सकारात्मक बदलाव दिखाई देता है—शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, पोषण और सामाजिक न्याय जैसे क्षेत्रों में तेजी से सुधार होता है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम, जो 2023 में पारित हुआ था, महिलाओं को एक-तिहाई सीटों पर अधिकार देता है, लेकिन इसे लागू किए जाने को जनगणना और परिसीमन से जोड़कर भविष्य के अनिश्चित इंतजार में डाल दिया गया है। सरकार के इस रुख की आलोचना विपक्ष ही नहीं, बल्कि कई कानूनी विशेषज्ञ और महिला अधिकार कार्यकर्ता भी लंबे समय से करते आए हैं। उनका कहना है कि संविधान के तहत समानता का अधिकार तुरंत लागू किया जाना चाहिए, न कि भविष्य की किसी प्रक्रिया से बाधित किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट का यह कदम अब राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा करेगा। केंद्र सरकार पर महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण पर अपना साफ रुख बताने का दबाव बढ़ेगा। आने वाले हफ्तों में सरकार का जवाब यह तय करेगा कि यह ऐतिहासिक कानून कागज़ से जमीन पर उतरने की ओर बढ़ेगा या फिर महिलाओं को राजनीतिक बराबरी के लिए और प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। अदालत की टिप्पणी, याचिकाकर्ता की दलीलें, और 48% आबादी के अधिकार—अब यह मुद्दा सिर्फ कानूनी नहीं बल्कि राष्ट्रीय चेतना का प्रश्न बन चुका है।




