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500 में 499 का दावा ध्वस्त : हाईकोर्ट की फटकार, लॉ स्टूडेंट पर जुर्माना

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इलाहाबाद 10 नवंबर 2025

इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया, जहाँ कानपुर के छत्रपति साहू जी महाराज विश्वविद्यालय की एक लॉ स्टूडेंट ने दावा किया कि उसने एलएल.बी. परीक्षा में 500 में से 499 अंक हासिल किए हैं, लेकिन विश्वविद्यालय ने उसे सिर्फ 181 अंक दिए। छात्रा ने अदालत में याचिका दाखिल की, विश्वविद्यालय पर भ्रष्टाचार और मनमानी का आरोप लगाया, और यहां तक मांग रखी कि उसे हर विषय में 100-100 अंक देकर मेरिट सूची में शामिल किया जाए। अदालत ने पहले विश्वविद्यालय से रिपोर्ट तलब की। तीन-सदस्यीय विशेषज्ञ समिति, जिसमें लॉ विभागाध्यक्ष भी शामिल थे, ने उसकी ओएमआर शीट की दोबारा जांच की, प्रश्न-दर-प्रश्न पुनर्मूल्यांकन किया और अपनी विस्तृत रिपोर्ट हाई कोर्ट को सौंप दी। इस रिपोर्ट में साफ लिखा था कि छात्रा के कुल अंक 181 हैं और उसके 499 अंकों के दावे का कोई आधार, कोई रिकॉर्ड, कोई प्रमाण—कुछ भी मौजूद नहीं है।

जब अदालत ने छात्रा से पूछा कि उसने 499 अंकों का आंकड़ा कहाँ से निकाला, तो वह अपने दावे का कोई विश्वसनीय स्रोत या दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सकी। उसने केवल एक हलफनामा दिया जिसमें कुछ ‘कथित-सही उत्तर’ दर्ज थे, लेकिन यह नहीं बताया गया कि यह सूची किसने तैयार की, किस आधार पर सही ठहराई गई, और विश्वविद्यालय के मूल्यांकन से किस प्रकार विरोधाभास पैदा होता है। अदालत ने इसे एक “पूरी तरह अनुमान आधारित और बेबुनियाद दावा” करार देते हुए कहा कि परीक्षा परिणामों में बदलाव सहानुभूति या कल्पना के आधार पर नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति ने सख़्त टिप्पणी की—“पहले पढ़ाई पर ध्यान दें, ताकि अच्छे नंबर आएँ; यूँ कोर्ट का चक्कर लगाने की ज़रूरत न पड़े।”

अदालत ने यह भी पाया कि छात्रा पिछले कुछ वर्षों में दस से अधिक याचिकाएँ और अपीलें दायर कर चुकी है। इस प्रवृत्ति को देखते हुए उसे “chronic litigant” यानी “लगातार अदालतों में बेबुनियाद दावे करने वाली” कहा गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यूनिवर्सिटी की विशेषज्ञ समिति ने जब निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से उत्तर पुस्तिका की दोबारा जांच कर दी है, तब अदालत के सामने दखल देने का कोई कारण नहीं बचता। ऐसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप तभी हो सकता है जब ठोस प्रमाण हों, न कि कल्पनाओं पर आधारित अंक-दावे। अंततः अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए छात्रा पर ₹20,000 का जुर्माना लगाया और 15 दिनों में हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी में राशि जमा करने का निर्देश दिया।

यह निर्णय न केवल इस छात्रा के एक अतिशयोक्तिपूर्ण दावे को खारिज करता है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा-प्रणाली और न्यायिक प्रक्रिया के सम्मान को भी मजबूत करता है। अदालत ने साफ संदेश दिया कि अंकों से असंतोष का मतलब यह नहीं कि कोई भी अपना मनमाना स्कोर घोषित कर दे और न्यायालय को दबाव में ला दे। मूल्यांकन प्रक्रिया विशेषज्ञों के हाथ में है, और अदालतें उस क्षेत्र में तभी हस्तक्षेप करती हैं जब तथ्य, सबूत और तर्क मजबूत हों। यह मामला छात्रों के लिए एक स्पष्ट सीख है—अंक मेहनत से मिलते हैं, अदालत की दलीलों से नहीं; और शिक्षा प्रणाली के प्रति अनुशासन तथा जिम्मेदारी सर्वोपरि है।

 

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