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50 हज़ार की भीड़ देख सम्राट चौधरी घबराए — ये मेरी रैली नहीं, उड़ाओ चॉपर

बिहार चुनाव प्रचार के आख़िरी दिन सियासत ने ऐसा दृश्य देखा, जिसे लोग आने वाले कई चुनावों तक याद करेंगे। उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी आज अपनी निर्धारित चुनावी रैली में पहुंचे, लेकिन वहाँ पहुँचने से पहले ही आसमान में बैठकर उनकी हालत ख़राब हो गई। जैसे ही उनका हेलीकॉप्टर मैदान के ऊपर आया और नीचे उमड़ी अपार जनसमूह की तस्वीर उनकी नज़रों में पड़ी, उनका माथा तुरंत ठनका—और चेहरे का रंग उड़ते देखा गया। हज़ार–पाँच सौ लोगों के बीच भाषण देने के आदी सम्राट चौधरी अचानक 50 हज़ार से अधिक लोगों की भीड़ देखकर हैरान रह गए। उन्होंने तुरंत पायलट की ओर झुककर घबराए हुए स्वर में कहा—“अरे ये कहाँ ले आया? मेरी सभा में तो कभी इतनी भीड़ आई ही नहीं!”

हेलीकॉप्टर जैसे-जैसे नीचे उतर रहा था, भीड़ की आवाज़ और स्पष्ट दिखने लगी। ढोल, नारे, झंडे, और लोगों का उत्तेजित समुद्र—सब देखकर सम्राट चौधरी का भ्रम गहराता गया। उन्हें लगा कि शायद आज उनकी किस्मत खुल गई है और जनता ने अचानक उनसे बेहद प्यार जताया है। लेकिन तभी भीड़ के नारों ने हकीकत का झटका दे दिया—क्योंकि “तेजस्वी! तेजस्वी!” के गगनभेदी नारे हेलीकॉप्टर तक पहुँच रहे थे। सम्राट चौधरी का चेहरा बदलने में पल भर लगा। उन्होंने हड़बड़ी में पायलट की सीट पर हाथ पटकते हुए चिल्लाकर कहा—“भाग! भाग यहाँ से! ये मेरी रैली नहीं, ये तो तेजस्वी यादव की सभा है! तभी तो इतनी भीड़ है!”

पायलट ने भी समझदारी दिखाते हुए एक पल की देरी किए बिना हेलीकॉप्टर का मोड़ बदल दिया। जमीन को छुए बिना ही उसने चॉपर ऊपर खींच लिया, जैसे कोई ट्रेन गलत स्टेशन देखकर आगे बढ़ जाए। नीचे उमड़ी भीड़ को आशीर्वाद देते हुए उड़ते जाने की मजबूरी में सम्राट चौधरी एकदम शांत बैठे रहे, जबकि उनकी टीम के लोग सोच रहे थे कि आखिर यह गफलत कैसे हुई। तेजस्वी यादव की सभा और सम्राट चौधरी की सभा में फर्क वही था—जो नदी और नाले में होता है; एक तरफ हज़ारों की लहरें, दूसरी ओर सैकड़ों की बूंदें।

आखिरकार हेलीकॉप्टर को वहाँ उतारा गया जहाँ पाँच सौ लोगों की भीड़ तैनात थी—वह भी इतनी मेहनत के बाद। सम्राट चौधरी ने चैन की साँस ली, जैसे अपने परिचित आकार की भीड़ देखकर मन शांत हो जाता है। इस पूरे घटनाक्रम ने चुनावी गलियारों में जबरदस्त हलचल पैदा कर दी। सोशल मीडिया पर लोग तंज़ कर रहे हैं—“जिसको अपनी भीड़ पहचान में न आए, वह जनता का मूड क्या समझेगा?” और विपक्ष ने इसे सीधे ‘जनता की पसंद’ का प्रतीक बता दिया है।

बिहार चुनाव के आखिरी दिन की यह घटना सत्ता और विपक्ष की राजनीतिक ज़मीन के फर्क को एक ही फ्रेम में दिखाती है—एक तरफ भीड़ को देखकर डर, दूसरी तरफ भीड़ को देखकर उबाल। सम्राट चौधरी शायद आज पहली बार समझ पाए कि भीड़ हवा से नहीं आती… जनता बुलाती है।

 

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