पटना/ नई दिल्ली 10 नवंबर
बिहार की राजनीति में अचानक एक भारी तूफ़ान उठ खड़ा हुआ है, और उसके केंद्र में हैं राज्य के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी। सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका ने पूरे राजनीतिक माहौल को हिला दिया है, जिसमें चौधरी पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने कई चुनावों में दाखिल किए गए अपने शपथपत्रों में उम्र को लेकर गलत और विरोधाभासी जानकारी दी। याचिका में कहा गया है कि यह सिर्फ तकनीकी गलती नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ गंभीर खिलवाड़ है, जो न सिर्फ कानून का उल्लंघन है बल्कि मतदाताओं के साथ एक तरह का धोखा भी है।
यह विवाद उस समय भड़का जब याचिकाकर्ता ने सम्राट चौधरी के 1995 और 1999 के हलफनामों का तुलनात्मक अध्ययन कर अदालत के सामने रखा। 1995 में चौधरी ने अपनी उम्र 15 वर्ष बताते हुए नामांकन दाखिल किया था। लेकिन—सिर्फ पाँच वर्षों बाद—1999 के हलफनामे में उनकी आयु 25 वर्ष दर्ज है! यानी पाँच साल में दस साल का ‘चमत्कारिक विकास’। यह हैरान करने वाली असंगति अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई है। कई राजनीतिक जानकारों ने इसे “भारत का सबसे अजीबोगरीब उम्र मामला” बताते हुए चुनाव आयोग से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
याचिका में आगे दावा किया गया है कि सम्राट चौधरी के 2020 और 2025 के हलफनामों में भी उम्र में लगातार अंतर पाया गया है। यह असंगति, याचिकाकर्ता के अनुसार, इस बात का संकेत है कि उपमुख्यमंत्री द्वारा दी गई जानकारी न तो स्थिर है और न ही विश्वसनीय। चुनाव आयोग की वेबसाइटों और अन्य रिकॉर्ड से तुलना में यह मामला और उलझता दिखाई देता है। सोशल मीडिया पर लोग तंज कस रहे हैं कि “सम्राट चौधरी की उम्र सरकार के डेटा से भी तेज़ अपडेट होती है।” कुछ लोग उन्हें व्यंग्य में “बिहार का नया यूथ आइकन” भी कह रहे हैं।
बिहार के राजनीतिक गलियारों में इस आरोप ने हड़कंप मचा दिया है। विपक्ष ने इसे “नैतिक दिवालियापन” करार देते हुए कहा है कि ऐसा मामला किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मज़ाक बना सकता है। कांग्रेस, राजद और वामपंथी दलों के नेताओं ने कड़े शब्दों में कहा कि यदि हलफनामों में दी गई जानकारी झूठी पाई जाती है, तो सम्राट चौधरी को तुरंत पद से हटाया जाना चाहिए और इनके खिलाफ FIR दर्ज की जानी चाहिए। वहीं सत्ता पक्ष का कहना है कि यह एक राजनीतिक षड्यंत्र है, जिसका उद्देश्य विकासवादी राजनीति को बदनाम करना है।
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में स्पष्ट तौर पर मांग की गई है कि उपमुख्यमंत्री के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज हो, उनके नामांकन की वैधता की जांच की जाए और चुनाव आयोग इस पूरे प्रकरण पर विस्तृत इनक्वायरी चलाए। अब हर किसी की निगाहें इस पर हैं कि उच्चतम न्यायालय क्या रुख अपनाता है। यदि आरोप सही पाए गए, तो यह मामला बिहार की राजनीति में बड़ी उथल-पुथल ला सकता है, क्योंकि यह सिर्फ एक नेता की उम्र का विवाद नहीं, बल्कि चुनावी पारदर्शिता और संवैधानिक जिम्मेदारी का बड़ा मुद्दा बन चुका है।
बिहार इस समय चुनावी माहौल में है और ऐसी स्थिति में यह विवाद न सिर्फ सत्ता के लिए सिरदर्द बन गया है, बल्कि विपक्ष के लिए एक बड़ा राजनीतिक हथियार भी। आने वाले दिनों में साफ़ होगा कि सम्राट चौधरी अपने ऊपर लगे आरोपों को कैसे जवाब देते हैं और क्या यह ‘उम्र विवाद’ बिहार की राजनीति की दिशा बदल देगा।




