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भारत और अमेरिका जल्द करेंगे 10‑साल की रक्षा साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर

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वाशिंगटन, 1 जुलाई 2025 — 

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को नई ऊँचाई देने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। मंगलवार को जारी एक आधिकारिक बयान में पेंटागन ने पुष्टि की कि दोनों देश इस वर्ष के अंत तक एक नए 10-वर्षीय रक्षा ढांचा समझौते (10-Year Defence Framework Agreement) पर हस्ताक्षर करेंगे। यह जानकारी तब सामने आई जब भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अमेरिकी रक्षा सचिव पेट हेज़ेथ के बीच एक अहम फोन वार्ता हुई, जिसमें दोनों नेताओं ने रक्षा, तकनीक, और औद्योगिक सहयोग को मज़बूत करने के लिए इस दीर्घकालिक योजना पर सहमति जताई।

इस प्रस्तावित समझौते का उद्देश्य न केवल इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन बनाए रखना है, बल्कि दोनों देशों के बीच तकनीकी हस्तांतरण, संयुक्त सैन्य उत्पादन, और सेना-सेना के संपर्क को गहराना भी है। बातचीत के दौरान GE F404 इंजन की आपूर्ति और भारत में ही GE F414 इंजनों के संयुक्त उत्पादन को तेज़ी से आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया। इसके अलावा, भारत-अमेरिका के बीच होने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यास, लॉजिस्टिक सपोर्ट, प्रशिक्षण कार्यक्रम, और इंटरऑपरेबिलिटी यानी आपसी सैन्य तालमेल को एक संरचित और टिकाऊ दिशा देने का रोडमैप तैयार किया गया है।

पेंटागन ने इस बात को रेखांकित किया कि अमेरिका भारत को “दक्षिण एशिया का प्रमुख रक्षा भागीदार” (Major Defence Partner) मानता है, और यह नया समझौता इस रिश्ते को एक संगठित, दीर्घकालिक और भरोसेमंद साझेदारी में बदल देगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फ्रेमवर्क भारत को रूस पर रक्षा निर्भरता से धीरे-धीरे मुक्त करने में सहायक होगा, साथ ही चीन की बढ़ती सैन्य चुनौती के सामने एक कूटनीतिक और सामरिक जवाब भी बनेगा। यह समझौता QUAD जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भारत-अमेरिका सहयोग को भी मज़बूती देगा।

इस पूरी योजना की औपचारिक घोषणा और दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर इस वर्ष के अंत में होने वाली एक उच्च-स्तरीय द्विपक्षीय बैठक में किए जाएंगे। यह बैठक संभावित रूप से वाशिंगटन डी.सी. में या नई दिल्ली में आयोजित की जा सकती है, जिसकी तारीखों की घोषणा आने वाले हफ्तों में की जाएगी। फ़िलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने स्तर पर रूपरेखा को अंतिम रूप देने में जुटे हैं।

भारत और अमेरिका के बीच यह आगामी 10-वर्षीय रक्षा ढांचा न केवल दो लोकतांत्रिक शक्तियों के बीच सामरिक रिश्तों की बुनियाद को मज़बूत करेगा, बल्कि यह रक्षा क्षेत्र में “मेक इन इंडिया” और “शेयर्ड टेक्नोलॉजी” की दिशा में एक ऐतिहासिक प्रगति भी मानी जा रही है। यह समझौता सिर्फ एक कागज़ी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि 21वीं सदी के वैश्विक संतुलन का एक निर्णायक अध्याय होगा।

 

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