भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाषा दिनोंदिन गिरती जा रही है। कभी “संस्कारी” और “विकास पुरुष” की छवि गढ़ने वाले मोदी अब हर चुनावी मंच पर उस भाषा का इस्तेमाल करने लगे हैं जो किसी गली के दबंग या रंगदार की लगती है। “कनपटी पर कट्टा”, “बच्चों को रंगदार बनाना”, “गुंडों का राज” जैसे शब्द अब प्रधानमंत्री के शब्दकोश में शामिल हो चुके हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद इतनी हल्की और बाजारू भाषा का हकदार है? क्या प्रधानमंत्री पद का अर्थ अब गाली, तंज और धमकी की राजनीति बन गया है? मोदी ने बिहार के सीतामढ़ी से दिए अपने भाषण में एक बार फिर राजनीतिक शुचिता की सारी सीमाएं पार कर दीं — और इस बार पूरा देश हैरान नहीं, बल्कि शर्मिंदा है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी रैली में कहा कि “RJD बच्चों को रंगदार बना रही है।” अपराध, भय और अराजकता की बातें करते हुए उन्होंने बिहार के राजनीतिक विमर्श को फिर उसी “गुंडागर्दी” की खाई में धकेल दिया जिससे बिहार सालों पहले निकल चुका था। विडंबना यह है कि वही मोदी, जो कभी भाषणों में “विकास” की बात करते थे, अब “वोट के लिए गाली” को अपनी रणनीति बना चुके हैं। उनकी भाषा का यह पतन उनकी राजनीति के भीतर बैठे भय और असुरक्षा का प्रमाण है। जब कोई नेता मुद्दों से खाली हो जाता है, तो वह शब्दों की तलवारें चलाने लगता है — और मोदी अब उसी मोड़ पर हैं।
यह कोई नई बात नहीं है। मोदी की भाषा गिरने का सिलसिला पुराना है। 2014 में उन्होंने मनमोहन सिंह पर कटाक्ष करते हुए कहा था, “मनमोहन जी, आप तो बाथरूम में भी रेनकोट पहनकर नहाते हैं।” 2017 में उन्होंने विपक्ष को “परजीवी” कहा। 2020 में शाहीन बाग़ के विरोधियों को “देशद्रोही” कहा। 2021 में किसानों को “परजीवी तत्वों के हाथ का खिलौना” कहा। और अब 2025 में बिहार में आकर जनता को “कट्टा संस्कृति” की धमकी दी। 2024 चुनाव में उन्होंने कहा कि ये विपक्ष वाले आपकी बिजली काट देंगे, तार काट के ले जायेंगे, पोल उखाड़ के ले जायेंगे, नल का पानी बंद कर देंगे, नल की टोटी खोल ले जायेंगे, आपका मंगलसूत्र खोल लेंगे। एक बार उन्होंने हिन्दू मुसलमान के चक्कर में नफरत की राजनीति के तहत कहा था कि दंगाई कपड़े से पहचाने जा सकते हैं।
राजनीतिक मर्यादा क्या होती है, यह शायद मोदी अब भूल चुके हैं। प्रधानमंत्री का पद केवल सत्ता का प्रतीक नहीं होता — यह संविधान की गरिमा और जनता के विश्वास का प्रतीक होता है। लेकिन जब वही प्रधानमंत्री कट्टा, रंगदार और अपराधी जैसे शब्दों से जनता को डराने की कोशिश करता है, तो यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि भयतंत्र बन जाता है। नरेंद्र मोदी के भाषण अब विकास की भाषा नहीं बोलते, बल्कि घृणा और अभद्रता की राजनीति का नमूना बन चुके हैं। बिहार के मतदाताओं को अब यह समझना होगा कि जो व्यक्ति “विकास” की बात कर के आया था, वही अब “वोट की गाली” की राजनीति कर रहा है।
एक प्रधानमंत्री जो हर बार अपने शब्दों से मर्यादा की सीमाएं तोड़ता है, वह देश के लिए प्रेरणा नहीं, राजनीतिक प्रदूषण का स्रोत बन चुका है। मोदी का हर भाषण अब लोकतंत्र के मूल आदर्शों का अपमान है — और यह अपमान अब बार-बार दोहराया जा रहा है।
कांग्रेस और विपक्षी दलों ने मोदी की इस भाषा की कड़ी निंदा की है। कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि “प्रधानमंत्री अब हताशा के दौर में हैं। उनके पास दिखाने को उपलब्धियाँ नहीं हैं, इसलिए अब भाषा की तलवार चला रहे हैं।” आरजेडी ने कहा कि “मोदी की ज़ुबान गिर रही है क्योंकि जनता अब उठ खड़ी हुई है।” पवन खेड़ा ने तीखा वार करते हुए कहा कि “मोदी ने बिहार की जनता का अपमान किया है। वो धरती जो बुद्ध, महावीर, जेपी और कर्पूरी ठाकुर की है, उस पर प्रधानमंत्री ने अपराध और रंगदारी की भाषा बोलकर अपनी मानसिकता उजागर कर दी।”
यह वही मोदी हैं जो कभी “सबका साथ, सबका विकास” की बात करते थे। लेकिन अब न “साथ” बचा है, न “विकास” — सिर्फ़ सत्ता की हवस और शब्दों की हिंसा रह गई है। उनका “गुजरात मॉडल” भी इसी शैली का प्रतीक है — जहाँ डर और दंभ को सफलता समझ लिया गया है। पहले “चायवाला” की विनम्रता थी, अब “राजा” की अहंकार है। पहले गरीबों की भाषा थी, अब पूंजीपतियों की राजनीति है। मोदी की यह गिरती भाषा दरअसल उस नैतिक दिवालियापन की पहचान है जो सत्ता के नशे में व्यक्ति को इंसान से “आवाज़ मशीन” बना देता है।
प्रधानमंत्री ने जिस “कट्टा” और फिर अब “रंगदार” की बात की, वह अब उनके ही शब्दों में झलक रहा है। उनके भाषण अब तर्क नहीं, धमकी हैं। यह वही दौर है जहाँ सवाल पूछने वाला पत्रकार देशद्रोही कहलाता है, विपक्षी नेता भ्रष्ट कहा जाता है, और जनता को “भ्रमित” बताकर ठगा जाता है। मोदी की राजनीति अब सत्ता की रंगदारी बन चुकी है, जहाँ भाषा सिर्फ़ डराने और नीचा दिखाने का साधन है।




