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नोटबंदी के 9 साल बाद भी देश संभल नहीं पाया — यही है मोदी सरकार की उपलब्धि : कांग्रेस

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नई दिल्ली 9 नवंबर 2025

देश की आर्थिक रीढ़ पर 8 नवंबर 2016 की रात जो प्रहार हुआ था, उसकी गूंज आज भी लाखों घरों में सुनाई देती है। 500 और 1000 रुपये के नोटों पर लगे प्रतिबंध को आज 9 साल पूरे हो चुके हैं, और इस मौके पर कांग्रेस पार्टी ने पूरे देशभर में ‘काला दिवस’ (Black Day) मनाते हुए मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस का कहना है कि “नोटबंदी आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा आर्थिक अपराध था”, जिसने न केवल देश की अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया, बल्कि करोड़ों छोटे व्यापारियों, किसानों, मजदूरों और मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी।

कांग्रेस ने कहा कि नोटबंदी का असली उद्देश्य भ्रष्टाचार खत्म करना नहीं था, बल्कि देश की मेहनतकश जनता की जमा-पूंजी को बैंकिंग सिस्टम में फँसाकर पूंजीपतियों और सरकार समर्थित कॉर्पोरेट घरानों के लिए रास्ता खोलना था। पार्टी नेताओं ने कहा कि 9 साल बीतने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को यह नहीं बता पाए कि नोटबंदी से क्या लाभ हुआ, कितनी काली कमाई पकड़ी गई, और कितने आतंकियों की फंडिंग बंद हुई? बल्कि हुआ यह कि काला धन वापस नहीं आया, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था काली पड़ गई।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा, “मोदी सरकार की नोटबंदी एक ‘आर्थिक आपदा’ थी जिसे जानबूझकर रचा गया था। इस एक फैसले ने 13 करोड़ नौकरियां खत्म कर दीं, लघु उद्योगों को मिटा दिया, और ग्रामीण भारत को बर्बादी की कगार पर पहुंचा दिया।” उन्होंने कहा कि आज भारत की जो बेरोजगारी दर 45 साल के उच्चतम स्तर पर है, उसका बीज उसी रात बोया गया था जब प्रधानमंत्री ने 8 नवंबर को टी.वी. पर आकर कहा था — “आज रात 12 बजे से 500 और 1000 रुपये के नोट बंद।”

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री मोदी को सीधे निशाने पर लिया। उन्होंने लिखा  “नोटबंदी इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला था। गरीबों से पैसा लेकर अमीरों की जेब में डाल दिया गया। मोदी ने ‘कैशलेस’ की बात की थी, लेकिन असल में भारत को ‘जॉबलेस’ बना दिया।

राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि “क्या नोटबंदी से आतंकवाद खत्म हुआ? क्या भ्रष्टाचार घटा? क्या नकली नोट रुक गए? नहीं! बल्कि इन नौ सालों में भारत की असमानता चरम पर पहुँच गई है। अमीर और अमीर हो गया, गरीब और गरीब होता गया।” कांग्रेस नेताओं ने कहा कि यह सरकार ‘नोटबंदी से विकास नहीं, नोटबंदी से विनाश’ की पहचान बन चुकी है।

पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा ने मोदी सरकार को “आर्थिक विनाश का सूत्रधार” बताते हुए कहा कि “नोटबंदी के समय प्रधानमंत्री ने कहा था कि 50 दिन दे दो, अगर गलती हो गई तो सज़ा भुगतने को तैयार हूँ। अब 9 साल हो गए, और देश भुगत रहा है। किसे सज़ा मिली? बैंक की लाइन में जो मरे वो गरीब थे, जिन्होंने पैसा बनाया वो अमीर।” खेड़ा ने कहा कि यह ‘डिजिटल इंडिया’ का नहीं, बल्कि ‘डिजिटल लूट इंडिया’ का दौर है — जहाँ हर योजना, हर सुधार का असली लाभ सिर्फ़ कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों तक सीमित है।

कांग्रेस ने यह भी कहा कि नोटबंदी ने महिलाओं की बचत पर सबसे बड़ा प्रहार किया। करोड़ों गृहिणियों ने वर्षों से जो नकद धन संजोकर रखा था, वह एक रात में बेकार हो गया। उस रात देश की हर रसोई में आंसू थे, हर गली में भय था और हर बैंक के बाहर मौत की कतारें थीं। पार्टी ने कहा कि “यह केवल नोट बंदी नहीं थी, यह जनता की उम्मीदों की बंदी थी, अर्थव्यवस्था की हत्या थी।”

कांग्रेस ने 9वीं बरसी पर देशभर में पोस्टर अभियान चलाया, जिन पर लिखा था —”8 नवंबर: जब देश ठहर गया था, नोटबंदी नहीं, मोदीबंदी थी”, और “काला धन नहीं मिला, काला भविष्य मिल गया।” दिल्ली, मुंबई, पटना, भोपाल, जयपुर, कोलकाता और लखनऊ में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने काली पट्टियां बांधकर प्रदर्शन किया और बैंकों के बाहर मोदी सरकार के खिलाफ नारे लगाए — “नोटबंदी के नाम पर ठगी नहीं चलेगी, गरीबों की कमाई लूटना बंद करो!”

आर्थिक विशेषज्ञों ने भी कांग्रेस के आरोपों को बल दिया। रिजर्व बैंक की रिपोर्टों के अनुसार, नोटबंदी के बाद लगभग 99.3% बंद नोट वापस बैंकों में लौट आए, यानी काला धन लगभग शून्य निकला। वहीं, लाखों छोटे व्यापार बंद हो गए, जीडीपी में ऐतिहासिक गिरावट आई और बेरोजगारी दर 6.1% तक पहुँच गई — जो उस वक्त आज़ादी के बाद का सबसे ऊंचा स्तर था। अर्थशास्त्रियों ने कहा कि यह फैसला “आर्थिक सर्जरी नहीं, आर्थिक आत्महत्या” थी।

कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी से पूछा कि “अगर नोटबंदी इतनी सफल थी, तो आज देश की अर्थव्यवस्था डगमगा क्यों रही है? महंगाई बेलगाम क्यों है? युवाओं को रोजगार क्यों नहीं?” पार्टी का दावा है कि 2016 की वह रात सिर्फ़ एक “घोषणा” नहीं थी, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की कब्रगाह की नींव थी।

कांग्रेस नेताओं ने कहा कि आने वाले चुनावों में जनता इस ‘काला दिवस’ को याद रखेगी। क्योंकि 8 नवंबर सिर्फ़ एक तारीख नहीं, बल्कि वह दिन है जब भारत की अर्थव्यवस्था को झूठे नारे के नीचे दफनाया गया था।

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