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समस्तीपुर कांड: सड़क पर बिखरी वोट की लाश, चोर आयोग की पोल खुली

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बिहार की धरती से इस बार जो तस्वीरें निकली हैं, उन्होंने देश के लोकतंत्र की आत्मा को हिला कर रख दिया है। समस्तीपुर जिले के सरायरंजन विधानसभा क्षेत्र में सड़क किनारे हजारों वीवीपैट पर्चियां कूड़े के ढेर में बिखरी मिलीं, जैसे किसी ने लोकतंत्र को उठाकर फेंक दिया हो। वो पर्चियां जो मतदाता के विश्वास की सबसे बड़ी निशानी होती हैं, जो हर वोट की गवाही देती हैं, आज सड़क पर पड़ी हुई थीं — मरी हुई, कुचली हुई, और बेइज़्ज़ती की तरह बिखरी हुई। इस दृश्य ने बिहार से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। यह कोई तकनीकी भूल नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पारदर्शिता पर लगा सबसे बड़ा दाग है।

जैसे ही यह खबर फैली कि समस्तीपुर के गुड़मा गांव में हजारों की संख्या में वीवीपैट की पर्चियां कूड़े में पड़ी मिली हैं, वैसे ही इलाके में अफरा-तफरी मच गई। स्थानीय लोगों ने वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया और कुछ ही घंटों में यह मामला पूरे देश में फैल गया। यह खबर जब राजधानी पटना पहुँची तो प्रशासन के हाथ-पाँव फूल गए। जिलाधिकारी रौशन कुशवाहा, पुलिस अधीक्षक और निर्वाचन अधिकारी तुरंत मौके पर पहुँचे, प्रत्याशियों को बुलाया गया, और आनन-फानन में सभी पर्चियां कब्जे में ले ली गईं। पर सवाल वही रह गया — यह सब हुआ कैसे? किसके आदेश पर हुआ? और आखिर इन पर्चियों को किसने फेंका? क्या यह सब केवल एक ‘तकनीकी गलती’ का परिणाम है या फिर यह लोकतंत्र की लाश को ढकने की कोशिश है?

प्रशासन ने सफाई दी कि यह “तकनीकी मामला” है और मॉक पोल के दौरान जो पर्चियां निकली थीं, वे गलती से फेंक दी गईं। पर क्या हजारों पर्चियां गलती से सड़क पर गिर सकती हैं? क्या इतनी बड़ी लापरवाही बिना किसी आदेश या दबाव के हो सकती है? जिलाधिकारी ने दो अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया, एफआईआर दर्ज की गई, लेकिन यह कार्रवाई जनता के क्रोध को शांत नहीं कर सकी। लोग कह रहे हैं कि यह कोई गलती नहीं, बल्कि एक साजिश है — ऐसी साजिश जो हर वोट को बेकार बना दे, हर मतदाता को मज़ाक में बदल दे।

राजनीतिक दलों ने इस मामले को हाथों-हाथ लिया और पूरे देश में बहस छिड़ गई कि क्या भारत का चुनाव आयोग अब भी निष्पक्ष है या फिर सत्ता के इशारे पर काम कर रहा है। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने सबसे पहले हमला बोला। पार्टी ने अपने आधिकारिक ‘एक्स’ (पूर्व ट्विटर) अकाउंट पर लिखा — “समस्तीपुर के सरायरंजन में भारी संख्या में वीवीपैट पर्चियां मिलीं। कब, कैसे, क्यों और किसके इशारे पर फेंकी गईं? क्या चोर आयोग इसका जवाब देगा? क्या यह सब बाहर से आकर बिहार में डेरा डाले लोकतंत्र के डकैत के निर्देश पर हो रहा है?” इस बयान ने सियासी तापमान को अचानक कई डिग्री ऊपर पहुँचा दिया। आरजेडी के इस तेवर में सिर्फ गुस्सा नहीं, बल्कि एक डर भी झलकता है — डर कि अब वोट की पवित्रता खत्म हो चुकी है, और लोकतंत्र “डाटा और डिवाइस” के हवाले हो गया है।

जैसे-जैसे वीडियो और तस्वीरें वायरल हुईं, लोगों के दिलों में यह सवाल गूंजने लगा कि अगर वीवीपैट जैसी सुरक्षा प्रणाली भी सड़क पर फेंकी जा सकती है, तो क्या वाकई हमारा वोट किसी मायने रखता है? क्या यह जनता का वोट था या पहले से तय स्क्रिप्ट का हिस्सा? क्या अब चुनाव सिर्फ एक इवेंट है, जहाँ परिणाम पहले लिखे जाते हैं और जनता को बस तमाशा दिखाया जाता है? यह सवाल बिहार की जनता का ही नहीं, बल्कि पूरे भारत का है।

समस्तीपुर के प्रशासन ने दावा किया कि ये पर्चियां मॉक पोल से संबंधित थीं, जो कमीशनिंग प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं। लेकिन सवाल यह नहीं कि पर्चियां कहां से आईं — सवाल यह है कि वे बाहर कैसे आईं, सड़क तक कैसे पहुँचीं, और सुरक्षा की परतें किसने तोड़ीं? अगर मॉक पोल की पर्चियां भी ऐसे सड़क पर फेंकी जा सकती हैं, तो चुनाव के बाद असली वोट की सुरक्षा की क्या गारंटी है? अगर यह “तकनीकी गलती” है, तो क्या लोकतंत्र अब तकनीक के हवाले होकर मरा पड़ा है?

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह मामला केवल समस्तीपुर तक सीमित नहीं रहेगा। यह उस सोच की पोल खोलता है जहाँ सत्ता और आयोग के बीच की रेखा धुंधली हो चुकी है। अब यह केवल चुनावी प्रक्रिया की त्रुटि नहीं, बल्कि मतदाता की आस्था की हत्या है। सोशल मीडिया पर #VoteChorCommission और #VVPATScandal ट्रेंड कर रहे हैं, लोग खुलेआम कह रहे हैं — “यह चुनाव नहीं, यह प्रबंधन है।” लोकतंत्र को अब “कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम” पर चला दिया गया है जहाँ मतदाता का काम केवल लाइन में लगकर बटन दबाना है, बाकी सब ‘ऊपर’ से तय होता है।

इस घटना ने बिहार विधानसभा चुनाव की साख को गहरा झटका दिया है। यह मामला अब केवल दो अफसरों के निलंबन से शांत नहीं होगा, क्योंकि इसने देशभर में उस विश्वास को तोड़ दिया है जिस पर लोकतंत्र टिका था। अगर वोट की गिनती पर भी भरोसा खत्म हो गया, तो जनता का शासन किस चीज़ पर टिका है? क्या यह चुनाव आयोग अब जनता का आयोग है या सत्ता का प्रहरी बन चुका है?

समस्तीपुर की ये फेंकी हुई वीवीपैट पर्चियां अब सिर्फ कूड़े में पड़ी पर्चियां नहीं हैं — ये भारत के लोकतंत्र का पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट हैं। ये बता रही हैं कि कैसे जनादेश का शव अब कागज़ के टुकड़ों में बिखर गया है। सवाल अब सीधा है: क्या चुनाव आयोग चुप रहेगा या लोकतंत्र की यह लाश उठाने की हिम्मत दिखाएगा?

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