पटना/ नई दिल्ली 9 नवंबर 2025
बिहार विधानसभा चुनाव का दूसरा चरण राज्य की राजनीति को एक नए मोड़ पर ले आया है। पहले चरण में 18 जिलों की 121 सीटों पर रिकॉर्ड 64.66 प्रतिशत मतदान ने यह साबित कर दिया कि जनता अब बदलाव के मूड में है। अब 11 नवंबर को शेष 122 सीटों पर मतदान होना है, जिनमें सीमांचल, मिथिलांचल और कोसी क्षेत्र की मुस्लिम बाहुल्य सीटें सियासी फोकस में हैं। किशनगंज, कटिहार, अररिया, पूर्णिया, मधेपुरा, दरभंगा और सुपौल जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाताओं की निर्णायक भूमिका को देखते हुए अब विकास, शिक्षा और वक्फ सुधार नए चुनावी एजेंडे बन चुके हैं। यह बदलाव न सिर्फ राजनीतिक है बल्कि सामाजिक चेतना का भी प्रतीक है — जहाँ मुस्लिम समाज पहली बार भावनाओं से ऊपर उठकर आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण की राह पर सोच रहा है।
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (MRM) ने इस नई सोच को जमीनी आंदोलन का रूप दे दिया है। मंच ने बिहार में अपने जनजागरण अभियान को चरम पर पहुंचा दिया है। इस अभियान की कमान प्रदेश संयोजक अल्तमश खान बिहारी के हाथ में है, जबकि राष्ट्रीय संयोजक मोहम्मद अफजाल और अबू बकर नक़वी इसकी निगरानी कर रहे हैं। मंच की टीमें सीमांचल के गांव-गांव, कस्बों और चौपालों में जाकर अल्पसंख्यक मतदाताओं से संवाद कर रही हैं। उनका संदेश साफ है — “विकास की राजनीति ही असली राजनीति है।” यह जनजागरण अब केवल चुनावी बहस नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन का रूप ले चुका है, जो मोदी–नीतीश की नीतियों को ज़मीन पर उतारने का प्रयास कर रहा है।
मंच के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहिद सईद ने कहा कि “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नीतियों ने बिहार में अल्पसंख्यकों के जीवन में वास्तविक सुधार लाया है। मुसलमान समाज को पहली बार बिना तुष्टिकरण, सीधे विकास का लाभ मिला है। वक्फ संपत्तियों को लेकर जो दशकों से बंदरबांट चल रही थी, वह मोदी सरकार के वक्फ संशोधन कानून से खत्म हो रही है। यह कानून गरीबों, यतीमों और बेवाओं के हित में है। जिन्होंने वक्फ की ज़मीनों को अपनी निजी मिल्कियत बना लिया था, उनकी अब जवाबदेही तय होगी।”
उन्होंने आगे कहा, “जो लोग इस कानून का विरोध कर रहे हैं, वे वही हैं जिन्होंने मुसलमानों की संपत्तियों पर कब्ज़ा जमाया। नया कानून मुसलमानों के लिए अवसर का दरवाज़ा खोलता है। अगर वक्फ संपत्तियों का पारदर्शी उपयोग हो, तो मुसलमान समाज शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकता है। यह कानून किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि एक नई आर्थिक क्रांति की शुरुआत है — जो मुसलमानों को ‘भीख नहीं, भविष्य’ की दिशा देता है।”
देशभर में नौ लाख एकड़ से अधिक वक्फ संपत्तियाँ हैं, लेकिन उनका उपयोग दशकों तक बंद दरवाज़ों में कैद रहा। अब वही संपत्तियाँ मुसलमान समाज की तरक्की का साधन बन सकती हैं। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने इसे एक “आर्थिक आज़ादी का आंदोलन” बताया है। शाहिद सईद कहते हैं, “अगर मुसलमान वक्फ संपत्तियों को सही दिशा में उपयोग करें, तो उन्हें न किसी पर निर्भर रहना होगा, न किसी के झूठे वादों पर भरोसा करना पड़ेगा। अब वक्त है आत्मनिर्भर मुसलमान का — जो अपने बच्चों को तालीम दे, अपने समाज को रोज़गार दे, और अपने देश को ताकत दे।”
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का यह अभियान पूरी तरह मोदी–नीतीश सरकार की नीतियों के अनुरूप है। मंच की टीमें प्रधानमंत्री के 15 सूत्रीय कार्यक्रमों को अल्पसंख्यक समाज के बीच सरल भाषा में समझा रही हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना, पोषण मिशन, पीएम स्वनिधि, स्किल इंडिया और मुद्रा योजना जैसी योजनाओं से लाखों मुसलमानों को फायदा हुआ है। अब मंच यह संदेश दे रहा है कि “तरक्की का रास्ता दिल्ली से नहीं, हर घर से निकलेगा।”
अल्तमश खान बिहारी का कहना है, “हम किसी पार्टी के प्रचारक नहीं, समाज के सिपाही हैं। मोदी और नीतीश की नीतियों ने हमें सिखाया है कि विकास सबका अधिकार है, और अब मुसलमान समाज भी इस अधिकार के साथ आगे बढ़ रहा है।”
दूसरे चरण की मुस्लिम-बहुल सीटों जैसे किशनगंज, अररिया, सिकटी, जोकीहाट, कटिहार, बरसोई, अमौर, बायसी, कोचाधामन, दरभंगा ग्रामीण और सुपौल में इस बार एक नई हवा है — जहाँ वोट देने से पहले लोग धर्म नहीं, काम पूछ रहे हैं। गांवों में अब यह सवाल गूंज रहा है — “हमारे बच्चों की तालीम कौन देगा?”, “हमारे वक्फ की ज़मीन का हक़दार कौन?”, “हमारे समाज को रोज़गार कब मिलेगा?” ये सवाल दिखाते हैं कि मतदाता अब जाग चुका है।
मंच का नारा है — “वोट से बदलाव, समाज से उत्थान।” राष्ट्रीय संयोजक और महिला विंग की प्रमुख डॉ शालिनी अली ने कहा, “बिहार के मुसलमान अब यह समझ चुके हैं कि वोट केवल सरकार बदलने के लिए नहीं, समाज को बेहतर करने के लिए होता है। और उन्हें मोदी और नीतीश का नीतियों पर पूरा भरोसा है कि डबल इंजन आत्मनिर्भर भारत बना रहे हैं और मुसलमान समाज भी अपनी जिम्मेदारी निभाने को तैयार है। यही असली जिहाद है — तालीम, तरक्की और तजवीज का।”
बिहार का यह चुनाव मुस्लिम समाज में चेतना के जागरण का प्रतीक बन गया है। मोदी–नीतीश की नीतियों ने वह भरोसा जगाया है, जो जंगलराज में कभी नहीं बन सका। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने इस भरोसे को आंदोलन की शक्ल दी है। अब सीमांचल से लेकर मधेपुरा तक एक ही आवाज़ सुनाई दे रही है —“भ्रम नहीं, भरोसा चाहिए… राजनीति नहीं, प्रगति चाहिए।” और इसी भरोसे से बिहार अब आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है।




