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जब दो मतदाताओं ने हिला दी थी सरकार — जर्मनी ने EVM पर लगाई थी रोक

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जर्मनी का लोकतंत्र यह सिखाता है कि एक सच्चे लोकतांत्रिक राष्ट्र में जनता सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि प्रहरी होती है। वर्ष 2005 में जर्मनी ने अपने संघीय चुनावों में पहली बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का इस्तेमाल शुरू किया। सरकार और चुनाव आयोग ने इसे आधुनिक, तेज़ और त्रुटिरहित मतदान प्रणाली के रूप में प्रस्तुत किया। तकनीक के सहारे पारदर्शिता और सुविधा का तर्क दिया गया, लेकिन लोकतंत्र का सार केवल तकनीक से नहीं, बल्कि जनविश्वास से तय होता है — और यही वह बिंदु था, जहाँ सवाल उठे।

चौंकाने वाली बात यह है कि जर्मनी में सिर्फ दो नागरिकों ने, जी हाँ — केवल दो मतदाताओं ने, इस प्रणाली पर आपत्ति दर्ज की। उन्होंने देश की सर्वोच्च संवैधानिक अदालत — फेडरल कॉन्स्टीट्यूशनल कोर्ट — में याचिका दाखिल की। उनका तर्क था कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से होने वाला मतदान आम जनता के लिए पारदर्शी नहीं है। कोई सामान्य नागरिक, बिना तकनीकी ज्ञान के, यह नहीं समझ सकता कि उसका वोट वास्तव में उसी उम्मीदवार को गया है या नहीं। यानी, लोकतंत्र का मूल सिद्धांत — “जन-निगरानी का अधिकार” — खतरे में था।

इन दो नागरिकों की याचिका पर अदालत ने करीब चार साल तक विचार किया। और मार्च 2009 में जर्मनी की संविधानिक अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया — अदालत ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का प्रयोग लोकतंत्र में जन-परीक्षण के सिद्धांत का उल्लंघन करता है, क्योंकि आम जनता मतदान प्रक्रिया की स्वतंत्र और प्रत्यक्ष पुष्टि नहीं कर सकती। मशीनें तकनीकी रूप से सही हों या नहीं, सवाल यह नहीं था — असली सवाल था कि क्या जनता उस प्रक्रिया पर भरोसा कर सकती है जिसे वह समझ ही न सके?

इस फैसले के बाद जर्मनी ने तुरंत कदम उठाया — और तब से अब तक, यानी 2009 के बाद से जर्मनी ने किसी भी राष्ट्रीय चुनाव में EVM का प्रयोग पूरी तरह बंद कर दिया। वहाँ आज भी मतदान पेपर बैलेट प्रणाली से होता है, जहाँ हर नागरिक अपने वोट को अपनी आंखों से देख और गिन सकती है। यह वही लोकतंत्र है जो जनता के विश्वास को तकनीक से ऊपर रखता है।

जर्मनी का यह उदाहरण बताता है कि सच्चा लोकतंत्र तब जीवित रहता है जब दो नागरिक भी आवाज़ उठाते हैं और प्रणाली झुकने पर मजबूर हो जाती है। वहाँ अदालतें और संस्थान जनता के सवालों को “देश विरोध” नहीं मानते, बल्कि “देश की सेवा” समझते हैं। केवल दो लोगों की याचिका ने पूरे चुनावी तंत्र को झकझोर दिया — क्योंकि सवाल सही था, और लोकतंत्र ने उसे सुना।

इसके उलट, भारत में चुनाव आयोग बार-बार EVM की विश्वसनीयता का बचाव करता है, पर सवाल यह है कि जब एक वोटर के मन में भी संदेह बाकी हो, तो क्या चुनाव पूर्णतः पारदर्शी कहा जा सकता है? मशीनें चाहे कितनी भी सुरक्षित हों, लोकतंत्र की सच्ची सुरक्षा तो जनता के भरोसे में होती है। जब आम नागरिक को यह भरोसा ही न हो कि उसका वोट किसे गया, तब यह प्रक्रिया सिर्फ ‘मतदान’ रह जाती है, ‘लोकतंत्र’ नहीं।

इसलिए जर्मनी का फैसला केवल तकनीकी निर्णय नहीं था — यह लोकतंत्र के आत्म-सम्मान की रक्षा थी। उन्होंने यह दिखा दिया कि लोकतंत्र की ताकत संसद में नहीं, सवाल पूछने वाले नागरिकों में होती है। और यही कारण है कि दुनिया के सबसे विकसित राष्ट्रों में से एक होने के बावजूद, जर्मनी आज भी पेपर बैलेट पर गर्व करता है।

भारत को भी इस उदाहरण से सीखने की जरूरत है — EVM चाहे कितनी भी सुविधाजनक क्यों न हों, लोकतंत्र की पारदर्शिता का विकल्प नहीं बन सकतीं। अगर जर्मनी जैसे उन्नत देश में केवल दो नागरिकों की आवाज़ चुनावी प्रक्रिया बदल सकती है, तो 140 करोड़ की जनता वाले भारत में सवाल उठाने वालों को खामोश क्यों किया जाता है? लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब जनता को “विश्वास करने” नहीं, बल्कि “जाँचने” का अधिकार मिलता है।

सच्चा लोकतंत्र वही है जहाँ जनता के दो सवाल सत्ता की हज़ार दीवारें हिला सकें — और जर्मनी ने यह साबित कर दिखाया।

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