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भारत में लोकतंत्र की थकान — जब जनता बोलती नहीं, सत्ता बेलगाम हो जाती है

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भारत का लोकतंत्र अब किसी जीवंत प्राणवान विचार की तरह नहीं, बल्कि एक थके हुए अनुष्ठान की तरह दिखाई देता है। संविधान आज भी हमारे पास है, मगर उसकी आत्मा जैसे धुंधलाती जा रही है। हर पाँच साल पर चुनाव होते हैं, भाषणों की गूंज सुनाई देती है, मंच सजते हैं, नारों की बारिश होती है — पर क्या इन नारों के पीछे किसी भूखे पेट की आवाज़ सुनाई देती है? क्या किसी माँ की चिंता या किसी बेरोज़गार युवक की बेचैनी इन सभाओं में जगह पाती है? आज सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह नहीं रही, वह केवल प्रचार के प्रति समर्पित हो चुकी है। सत्ताधारी वर्ग अब यह नहीं देखता कि जनता के घर में रोटी है या नहीं — वह बस यह देखता है कि टीवी स्क्रीन पर उसकी छवि कितनी ‘देशभक्तिपूर्ण’ दिख रही है। लोकतंत्र अब जनभागीदारी का मंच नहीं, बल्कि सत्तानिर्माण का तमाशा बन गया है। और जब जनता सवाल पूछना छोड़ देती है, तब लोकतंत्र सत्ता के हाथों का खिलौना बन जाता है — और भारत इसी खतरनाक मोड़ पर खड़ा है।

महंगाई: जनता की थाली से गायब हो चुका लोकतंत्र

महंगाई अब केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं रही, यह नैतिकता की परीक्षा बन चुकी है। एक मजदूर की जेब हर महीने हल्की होती जा रही है, किसान का पसीना मिट्टी में मिल जाता है लेकिन उसका फल किसी कॉर्पोरेट गोदाम में बंद हो जाता है। सरकारें कहती हैं, “विकास हो रहा है,” पर सवाल यह है — किसका विकास, किसके लिए?

अमीर और अमीर होते जा रहे हैं, गरीब और गरीब। वॉल स्ट्रीट और दलाल स्ट्रीट के चार्ट चमकते हैं, पर सब्जी मंडी में खड़े आदमी की आंखों में अंधेरा है। यही असमानता लोकतंत्र की सबसे बड़ी विफलता है। जब तक जनता की थाली में रोटी नहीं लौटती, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा।

न्यूयॉर्क ने दिखाया कि जनता जब अपनी तकलीफ को पहचानती है, तो वही गुस्सा लोकतांत्रिक क्रांति बन सकता है। भारत में भी यही गुस्सा पल रहा है, पर वह अब तक मौन है — एक ऐसा मौन जो धीरे-धीरे आत्मसमर्पण में बदलता जा रहा है।

बेरोज़गारी: युवा की हताशा और राजनीति की विफलता

भारत का युवा आज अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर में है। उसके पास डिग्रियाँ हैं, लेकिन नौकरियाँ नहीं; उसके पास ऊर्जा है, लेकिन दिशा नहीं। सरकारी नौकरियों पर ताले हैं, निजी कंपनियाँ शोषण को ‘संस्कृति’ बना चुकी हैं।

राजनीति में बेरोज़गारी कोई मुद्दा नहीं रह गया, बल्कि धर्म और जाति ने असली समस्याओं को ढक लिया है। जब युवा अपने भविष्य के लिए सड़कों पर उतरने की बजाय सोशल मीडिया पर व्यंग्य लिखने में सुकून पाता है, तो यह स्पष्ट है कि व्यवस्था ने उसकी उम्मीदों को लील लिया है।

न्यूयॉर्क में युवा वर्ग ने दिखाया कि जब उम्मीद मरती है, तो प्रतिरोध जन्म लेता है। भारत में भी वही चिंगारी फूट सकती है — अगर यह पीढ़ी अपने मौन को तोड़ने की हिम्मत करे। लोकतंत्र तभी बचेगा जब युवा केवल ‘नौकरी मांगने वाला’ नहीं, बल्कि ‘उत्तरदायित्व मांगने वाला’ नागरिक बने।

जनता बनाम बाजार: असली संघर्ष की दिशा

आज भारत में लोकतंत्र का सबसे बड़ा टकराव जनता और बाजार के बीच है। बाजार ने जीवन के हर पहलू को उत्पाद बना दिया है — शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, मकान, दवा — सब कुछ बिकाऊ हो गया है। नागरिक अब उपभोक्ता है, अधिकार अब विकल्प बन चुके हैं। सरकारें नीति नहीं बनातीं, पैकेज घोषित करती हैं। योजनाओं का उद्देश्य जनता का जीवन सरल बनाना नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट निवेशकों का “Ease of Doing Business” बढ़ाना बन गया है। न्यूयॉर्क के चुनावों ने यह सिखाया कि “Ease of Living” पहले होना चाहिए, “Ease of Doing Business” बाद में। भारत में अभी तक यह आवाज़ नहीं उठी क्योंकि जनता को धर्म और पहचान की राजनीति में इतना उलझा दिया गया है कि उसकी आर्थिक चेतना लगभग लकवाग्रस्त हो गई है। जब तक जनता अपने जीवन की प्राथमिकताओं को वापस नहीं परिभाषित करेगी, तब तक लोकतंत्र बाजार की गोद में ही पलता रहेगा।

मीडिया की भूमिका: जनसंदेश से जनप्रचार तक का पतन

कभी मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया था — आज वह सत्ता के शोरूम में सजा हुआ शोपीस बन चुका है। जहां सवाल होना चाहिए, वहां मनोरंजन है; जहां सच्चाई दिखनी चाहिए, वहां विज्ञापन की चमक है। मीडिया अब जनता का दर्पण नहीं, सत्ता का प्रवक्ता बन चुका है। “जनसंदेश” की जगह “जनप्रचार” ने ले ली है। मुद्दों पर बहस खत्म, तथ्यों की जांच खत्म — अब सिर्फ भावनाओं का सौदा बाकी है। न्यूयॉर्क में ममदानी जैसे नेताओं ने वैकल्पिक मीडिया और जनता के अपने नेटवर्क से जनमत को संगठित किया। भारत में भी बदलाव की शुरुआत तभी होगी जब पत्रकार सत्ता से नहीं, जनता से जुड़ेंगे। जब रिपोर्टिंग फिर से ‘सवाल’ पूछेगी, तब लोकतंत्र की सांस लौटेगी।

क्या भारत में उठेगी कोई चिंगारी?

भारत की जनता ने गुलामी से लेकर असमानता तक, हर अत्याचार के खिलाफ संघर्ष किया है। लेकिन आज वही जनता अपने अधिकारों के लिए थकी, टूटी और भ्रमित नजर आती है। हर चुनाव के बाद वह उम्मीद करती है कि शायद इस बार कुछ बदलेगा, पर पांच साल बाद फिर वही हकीकत सामने आती है — वही महंगाई, वही भ्रष्टाचार, वही झूठे वादे। यह थकान सबसे खतरनाक है, क्योंकि यह परिवर्तन की ऊर्जा को समाप्त कर देती है। मगर इतिहास साक्षी है कि जब अन्याय अपनी सीमा पार करता है, तब एक चिंगारी पूरे समाज को जला सकती है — और शायद भारत फिर एक ऐसी चिंगारी की प्रतीक्षा में है। वह चिंगारी राजनीति में नहीं, जनता के भीतर जन्म लेगी — जब आदमी यह कहेगा कि “हमें विकास नहीं, गरिमा चाहिए। हमें प्रचार नहीं, परिवर्तन चाहिए।” तभी असली लोकतंत्र का सूर्योदय होगा।

क्या भारत जागेगा या सोता रहेगा?

न्यूयॉर्क ने यह साबित किया कि लोकतंत्र तब बचता है जब जनता जागती है। भारत को अब यह तय करना है कि वह जागेगा या सोता रहेगा। क्या वह वोट देकर चैन की नींद सोएगा, या वोट के अर्थ को जिएगा? क्या वह सत्ता की भाषा सुनेगा, या अपने जीवन की आवाज़ को पहचानने की कोशिश करेगा? लोकतंत्र कोई उपहार नहीं — यह एक सतत जिम्मेदारी है, जो हर नागरिक को हर दिन निभानी पड़ती है। और जब जनता अपनी जिम्मेदारी निभाना शुरू करती है, तब “बाजार से ऊपर जनता” केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक व्यवस्था बन जाती है। भारत के लोकतंत्र को फिर से आत्मा चाहिए — और वह आत्मा तभी लौटेगी जब जनता अपनी नींद से जागकर यह कहेगी:

“हम अब डरेंगे नहीं, हम अब पूछेंगे — और जब जनता पूछती है, तो लोकतंत्र सचमुच जिंदा होता है।”

 

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