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राजस्थान की जोजरी नदी में प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त — कहा, “राज्य में कोई संस्था सफाई को गंभीरता से नहीं ले रही”

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नई दिल्ली 8 नवंबर 2025

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राजस्थान की जोजरी नदी में लगातार बढ़ रहे प्रदूषण को लेकर गहरी नाराज़गी जताई। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार और उससे जुड़ी संस्थाओं में इस समस्या को हल करने की कोई वास्तविक गंभीरता दिखाई नहीं देती। अदालत ने इस स्थिति को बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा कि नदी का प्रदूषण अब लगभग दो मिलियन यानी करीब 20 लाख लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरा बन चुका है।

यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की उस स्वतः संज्ञान (suo motu) कार्रवाई के दौरान आई, जिसमें अदालत ने खुद पहल करते हुए जोजरी नदी की हालत पर रिपोर्ट मांगी थी। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की खंडपीठ कर रही है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि “राजस्थान की कोई भी स्वायत्त संस्था वास्तव में नदी से प्रदूषण हटाने को लेकर गंभीर नहीं दिखती।”

जोजरी नदी का प्रदूषण लंबे समय से राजस्थान के जोधपुर, पाली, बालोतरा और नागौर जैसे इलाकों में एक बड़ा पर्यावरणीय संकट बन चुका है। यह नदी मूल रूप से नागौर की पहाड़ियों से निकलती है और जोधपुर तथा बाड़मेर होते हुए लूणी नदी में मिलती है। लेकिन बीते कई वर्षों से इस नदी में बड़ी मात्रा में औद्योगिक कचरा, रासायनिक अपशिष्ट और घरेलू सीवेज गिराए जा रहे हैं। परिणामस्वरूप, यह नदी अब “जहरीली” हो चुकी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस पानी का उपयोग खेती या पशुओं के लिए करना अब लगभग असंभव हो गया है।

अदालत ने सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार से पूछा कि राज्य की राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम (RIICO) और स्थानीय निकायों ने अभी तक राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आदेशों का पालन क्यों नहीं किया। 2022 में NGT ने इन संस्थाओं पर ₹2 करोड़ का जुर्माना लगाया था और कहा था कि नदी की सफाई में इनकी लापरवाही साफ़ झलकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह जुर्माना उचित था और यदि राज्य ने सुधारात्मक कदम नहीं उठाए, तो अदालत और सख्त कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगी। अदालत ने कहा, “हम देख रहे हैं कि ये अपीलें केवल समय खींचने के लिए दायर की गई हैं, ताकि जिम्मेदारी से बचा जा सके। अगर ये संस्थाएँ सच में नदी की सफाई चाहती हैं, तो दस दिनों में ठोस रिपोर्ट पेश करें।”

राजस्थान की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार इस मुद्दे पर विशेषज्ञ संस्थाओं की मदद ले रही है और जो कदम उठाए जा रहे हैं, वे स्थिति रिपोर्ट (Status Report) में शामिल किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए तकनीकी सलाहकार समितियाँ बनाई गई हैं, जो औद्योगिक अपशिष्ट को फिल्टर करने और नदी के पुनर्जीवन की दिशा में काम करेंगी।

हालांकि, अदालत ने यह दलील सुनने के बाद कहा कि “यह बातें हम कई सालों से सुन रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि नदी अब मृतप्राय हो चुकी है — न उसमें मछलियाँ बची हैं, न जैविक जीवन। यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि इंसानों की ज़िंदगी से जुड़ा सवाल है।”

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि “जोजरी नदी अब केवल एक नाले में तब्दील हो गई है। उद्योगों और नगर निकायों द्वारा छोड़ा गया गंदा पानी लगातार इसे जहरीला बना रहा है। यह न केवल कृषि के लिए हानिकारक है बल्कि यह ज़मीन के नीचे के जल स्रोतों को भी प्रदूषित कर रहा है।” अदालत ने यह भी कहा कि नदी का दूषित पानी अब जोधपुर और बाड़मेर के गाँवों तक पहुँच चुका है, जिससे पशुओं की मौतें और लोगों में बीमारियाँ बढ़ रही हैं।

2022 में NGT ने आदेश दिया था कि नदी के किनारे स्थित सभी प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग तुरंत बंद किए जाएँ और शोधन संयंत्र (Treatment Plants) की स्थापना की जाए। इसके अलावा, नदी के जल की गुणवत्ता का मासिक परीक्षण भी अनिवार्य किया गया था। लेकिन रिपोर्टों के अनुसार, न तो उद्योगों ने अपने अपशिष्ट निस्तारण सिस्टम में सुधार किया और न ही स्थानीय प्रशासन ने शोधन संयंत्रों को चालू रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “राज्य की निष्क्रियता ने इस नदी को मार डाला है।” अदालत ने राज्य सरकार को 10 दिनों के भीतर यह स्पष्ट करने का आदेश दिया कि क्या RIICO और अन्य नगर निकाय अपनी अपीलों को जारी रखना चाहते हैं या फिर अदालत के निर्देशों का पालन करने को तैयार हैं।

अदालत की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी। अदालत ने राज्य सरकार से कहा है कि वह अपनी स्थिति रिपोर्ट तब तक जमा करे, जिसमें यह बताया जाए कि अब तक प्रदूषण रोकने के लिए कौन-कौन से व्यावहारिक कदम उठाए गए हैं।

नदी से जुड़ा मानवीय संकट:

स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि जोजरी नदी की यह हालत केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि मानवीय संकट भी है। कई गाँवों में अब लोग पेयजल के लिए टैंकरों पर निर्भर हैं। खेती का उत्पादन घट गया है और भूमिगत पानी में रासायनिक तत्वों की मात्रा खतरनाक स्तर पर पहुँच चुकी है।

पाली और बालोतरा क्षेत्र के किसानों ने बताया कि “नदी का पानी इतना जहरीला है कि खेतों की मिट्टी सख्त हो गई है और फसलें सूखने लगी हैं।” कई परिवारों ने बताया कि पशुओं में त्वचा संबंधी बीमारियाँ और लोगों में पेट की बीमारियाँ आम हो गई हैं।

सुप्रीम कोर्ट की यह फटकार केवल राजस्थान सरकार के लिए नहीं, बल्कि उन सभी प्रशासनिक निकायों के लिए चेतावनी है जो पर्यावरणीय संकटों को गंभीरता से नहीं लेते। जोजरी नदी की कहानी उस उदासीनता की प्रतीक है जो उद्योगों और अधिकारियों की लापरवाही से एक जीवंत नदी को “मृत” बना देती है।

अब अदालत की निगाहें इस बात पर होंगी कि क्या राजस्थान सरकार इस नदी को बचाने के लिए वास्तविक कदम उठाती है, या यह मामला भी अन्य पर्यावरणीय वादों की तरह “रिपोर्टों” में ही दबकर रह जाएगा।

राजस्थान की जोजरी नदी की त्रासदी अब सिर्फ़ पर्यावरण का नहीं, जनस्वास्थ्य, जीवन और प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल बन चुकी है — और सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब समय “बहाने” नहीं, बल्कि “कार्रवाई” का है।

 

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